ताइवान से लेकर AI तक, ट्रंप-जिनपिंग समिट में आमने-सामने होंगे दुनिया के दो सबसे बड़े नेता; चीन ने पहले ही खींच दी ‘रेड लाइन’

दुनिया की दो सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं और महाशक्तियों—अमेरिका और चीन—के बीच कूटनीतिक हलचल एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वाशिंगटन में होने जा रही हाई-प्रोफाइल शिखर बैठक पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। इस बहुचर्चित समिट से ठीक पहले बीजिंग ने अपने तेवर साफ कर दिए हैं और अमेरिका के लिए अपनी स्पष्ट सीमाएं यानी ‘रेड लाइन्स’ खींच दी हैं। दोनों देशों के बीच संबंधों को साधने के लिए हो रही इस वार्ता में मुख्य केंद्र ‘थ्री-टी’ (Trade, Tech और Taiwan) रहने वाला है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक सुरक्षा जोखिम सबसे आगे हैं।

चीन ने पहले ही खींच दी 4 ‘रेड लाइन्स’, ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दा

समिट से ठीक पहले अमेरिका में चीनी राजदूत शी फेंग और चीन के सरकारी मुखपत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने साफ शब्दों में वाशिंगटन को चेतावनी दी है कि दोनों देशों के रिश्तों में चार मुद्दों पर कोई समझौता नहीं हो सकता। इनमें सबसे पहली और गैर-परक्राम्य ‘रेड लाइन’ ताइवान का मुद्दा है। इसके अलावा मानवाधिकार व लोकतंत्र, चीन की राजनीतिक व्यवस्था (डेवलपमेंट पाथ) और उसके विकास के संप्रभु अधिकारों को चुनौती न देने की बात कही गई है।

चीन ने दो टूक कहा है कि ताइवान चीन और अमेरिका के संबंधों की रीढ़ और सबसे बड़ा सुरक्षा घेरा है। बीजिंग इस बैठक में ताइवान को अमेरिका द्वारा दिए जाने वाले हथियारों के भारी पैकेज का कड़ा विरोध करने की तैयारी में है। चीन का आरोप है कि अमेरिका ताइपे को सैन्य मदद देकर यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ, अमेरिकी कांग्रेस और रक्षा विशेषज्ञ ट्रंप पर दबाव बना रहे हैं कि वे ताइवान के प्रति अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं में कोई ढील न दें।

AI सुरक्षा और संकट प्रबंधन: क्या बनेगा ‘रेड फोन’ हॉटलाइन?

इस शिखर बैठक में तकनीक, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का मुद्दा सबसे नए और गंभीर आयाम के रूप में उभरकर सामने आया है। दोनों देश वैश्विक स्तर पर एआई के नेतृत्व की होड़ में हैं, लेकिन साथ ही अनियंत्रित और बेकाबू एआई से होने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को लेकर भी चिंतित हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों पक्ष शीत युद्ध (Cold War) के दौर के प्रसिद्ध ‘हॉटलाइन’ तंत्र की तर्ज पर एक AI “रेड फोन” (AI Crisis Hotline) स्थापित करने के प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि एआई से जुड़ा कोई साइबर हमला, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर) को नुकसान या अनियंत्रित तकनीकी संकट उत्पन्न हो, तो गलतफहमी के कारण दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति न बने और सीधे संवाद से संकट को टाला जा सके।

व्यापार, सेमीकंडक्टर और वैश्विक भू-राजनीति की चुनौतियां

ताइवान और एआई के अलावा व्यापार और टैरिफ का मुद्दा भी वार्ता की मेज पर भारी रहेगा। अमेरिकी पक्ष व्यापार असंतुलन, अमेरिकी कृषि उत्पादों व ऊर्जा (एलएनजी) की चीनी खरीद, और फेंटानिल केमिकल सप्लाई चेन पर सख्ती की मांग कर रहा है। दूसरी ओर, चीन अमेरिकी सेमीकंडक्टर चिप्स पर लगे कड़े निर्यात प्रतिबंधों और चीनी कंपनियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को हटाने की मांग कर रहा है। इसके साथ ही मध्य पूर्व संकट और रूस से कच्चे तेल की खरीद पर अमेरिकी रुख भी चर्चा का विषय बनने की संभावना है।

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई काफी गहरी है, इसलिए इस बैठक से किसी बड़े चमत्कारिक समझौते की उम्मीद कम है। हालांकि, दुनिया की दो शीर्ष महाशक्तियों के शीर्ष नेताओं का आमने-सामने बैठकर संवाद बनाए रखना वैश्विक स्थिरता और आर्थिक संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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