
सनातन धर्म की परंपराओं में विजयादशमी यानी दशहरा केवल असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, ऊर्जा और ग्रहों के संतुलन का एक पावन संगम भी माना जाता है। हर साल आश्विन शुक्ल दशमी के दिन देश भर में रावण दहन और शस्त्र पूजन के साथ-साथ शमी के वृक्ष की पूजा करने का एक विशेष विधान सदियों से चला आ रहा है। उत्तर भारत के अवध, काशी, बुंदेलखंड से लेकर मध्य भारत और महाराष्ट्र तक इस दिन शमी के पत्ते बांटने और अपने बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लेने की समृद्ध परंपरा जीवंत रूप में देखी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शमी के वृक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का ऐसा प्रबल प्रवाह होता है जो किसी भी घर के नकारात्मक दोषों को जड़ से समाप्त करने की क्षमता रखता है। महाभारत काल की प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला था, तब गांडीवधारी अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र इसी पवित्र शमी के वृक्ष की शाखाओं के बीच सुरक्षित छुपाए थे। अज्ञातवास की अवधि समाप्त होने के बाद विजयदशमी के दिन ही उन्होंने शमी वृक्ष की विधि-विधान से पूजा करके अपने शस्त्र वापस प्राप्त किए थे और कौरव सेना पर प्रचंड विजय हासिल की थी। इसी प्रकार, प्रभु श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने और रावण का संहार करने से पूर्व शमी वृक्ष की विधिवत वंदना की थी, जिससे उन्हें विजयश्री का वरदान प्राप्त हुआ था। तभी से विजयदशमी के शुभ अवसर पर अपराजिता देवी की पूजा के साथ शमी के दर्शन और अर्चन को सर्वसिद्धिदायक और अभय प्रदान करने वाला माना गया है।
शमी के पत्तों को सोने के समान क्यों माना जाता है और इसका ज्योतिषी महत्व
दशहरा के पावन अवसर पर शमी के पत्तों का आदान-प्रदान करने की अनूठी परंपरा हर भारतीय परिवार में हर्षोल्लास के साथ निभाई जाती है। इस दिन शमी के कोमल पत्तों को स्वर्ण यानी ‘सोना’ मानकर एक-दूसरे को भेंट किया जाता है और लोग एक-दूसरे को ‘सोना लो और सोने जैसे रहो’ कहकर शुभकामनाएं देते हैं। इसके पीछे राजा रघु और महर्षि कौत्स की एक प्राचीन कथा प्रचलित है, जिसमें कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण वर्षा की थी, जिसके बाद अयोध्यावासियों ने उस सोने को आपस में बांट लिया था। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी शमी के वृक्ष का प्रभाव अत्यंत विलक्षण और शक्तिशाली माना गया है। नवग्रहों में सबसे धीमी गति से चलने वाले और कर्मफल प्रदाता माने जाने वाले शनिदेव का सीधा संबंध शमी के वृक्ष से है। यदि किसी जातक की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या कोई प्रतिकूल महादशा चल रही हो, तो विजयदशमी के पावन मुहूर्त में शमी वृक्ष की आराधना करने से शनि के सभी अनिष्टकारी प्रभावों में आश्चर्यजनक रूप से कमी आती है। शमी के पत्र भगवान भोलेनाथ और प्रथम पूज्य भगवान गणेश को भी अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इस दिन शमी के पत्तों का समर्पण व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के अमंगल और विघ्नों को हर लेता है।
विजयादशमी के दिन घर में सुख-समृद्धि और धन वृद्धि के लिए अचूक उपाय
आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों और व्यापार में लगातार रुकावटें झेल रहे जातकों के लिए दशहरा का दिन एक अबूझ और सिद्ध मुहूर्त के समान फलदायी सिद्ध होता है। इस दिन प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के ठीक बाद शमी वृक्ष के नीचे शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करना दरिद्रता को समाप्त करने का सबसे सरल और अचूक उपाय माना गया है। धन वृद्धि के लिए एक विशेष प्रयोग यह है कि विजयादशमी की शाम को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शमी के वृक्ष के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। इसके पश्चात वृक्ष से क्षमा मांगते हुए आदरपूर्वक नौ अथवा ग्यारह शमी के पत्ते तोड़ लें। इन पत्तों को गंगाजल से शुद्ध करें और अपने घर के पूजा स्थान में लाल रंग के रेशमी कपड़े पर रख दें। इसके बाद मां लक्ष्मी और कुबेर देव का ध्यान करते हुए इन पत्तों पर अष्टगंध या शुद्ध रोली से तिलक लगाएं। अगले दिन प्रातःकाल इन पत्तों को एक चांदी के सिक्के या एक तांबे के सिक्के के साथ उसी लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी, लॉकर या उस स्थान पर रख दें जहां आप अपनी जमा पूंजी रखते हैं। यह उपाय धन के अनावश्यक व्यय को रोकता है और घर में निरंतर बरकत बनाए रखता है।
राहु-केतु दोष और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति के लिए शमी का विशेष तांत्रिक व वैदिक विधान
वास्तु शास्त्र में शमी के पौधे को घर की नकारात्मक तरंगों को सोखने वाला एक प्राकृतिक ढाल माना गया है। जिन घरों में हमेशा कलह का वातावरण रहता हो, पारिवारिक सदस्यों के बीच मतभेद रहते हों या फिर अकारण ही धन की बर्बादी होती हो, वहां मुख्य द्वार के पास शमी का पौधा स्थापित करना बेहद शुभ परिणाम देता है। घर से बाहर निकलते समय शमी का पौधा दाहिनी ओर होना वास्तु सम्मत माना जाता है। दशहरा के दिन शमी की जड़ को एक छोटे से नीले या काले धागे में लपेटकर घर के मुख्य द्वार पर तोरण की भांति बांधने से किसी भी प्रकार की बुरी नजर, तंत्र दोष या नकारात्मक दृष्टि का घर में प्रवेश नहीं होता है। इसके साथ ही, व्यापारिक स्थल या दुकान पर घाटे का सामना कर रहे लोग यदि विजयदशमी के दिन शमी के ग्यारह पत्तों को कच्चे दूध और हल्दी से धोकर अपनी गल्ले या कैश बॉक्स में रखते हैं, तो ग्राहकों की आवक में तेजी आती है और व्यापार में नई गति मिलती है।
शमी पूजन की सही वैदिक विधि और मंत्र जाप से कैसे प्राप्त करें संपूर्ण फल
दशहरा के पावन दिन शमी पूजन का पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसे सही समय और श्रद्धा के साथ किया जाए। विजयदशमी के दिन विजय मुहूर्त या अपराह्न काल में घर के ईशान कोण में या पूर्व दिशा में शमी के पौधे के सामने उत्तर मुखी होकर बैठें। पौधे की जड़ में कच्चा दूध मिश्रित जल अर्पित करें, रोली, अक्षत, धूप और सुगंधित पीले पुष्प चढ़ाएं। इसके उपरांत शमी वृक्ष की प्रदक्षिणा करते हुए ‘शमी शमयते पापम् शमी लोहितकण्टका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी॥’ मंत्र का कम से कम 11 या 21 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जाप करें। इस मंत्र का अर्थ है कि शमी पापों का शमन करती है, इसके कांटे लालिमा लिए होते हैं, इसने अर्जुन के तीरों को धारण किया था और यह भगवान श्रीराम को अत्यंत प्रिय है। मंत्र जाप के पश्चात अपनी समस्त मनोकामनाएं मन ही मन शमी के समक्ष व्यक्त करें और अंत में वृक्ष की जड़ की थोड़ी सी मिट्टी लेकर अपने माथे पर तिलक लगाएं तथा उसका एक चुटकी भाग अपने पर्स में रख लें। यह प्रयोग आत्मविश्वास में अप्रत्याशित वृद्धि करता है, न्यायालयीन मामलों में सफलता दिलाता है और वर्ष भर आर्थिक रूप से सुरक्षा प्रदान करता है।
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