दीपके भी आंबेडकरवादी हैं, साथ आएं तो स्वागत है!’ कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने फिर दिया NDA में आने का खुला न्योता

महाराष्ट्र की राजनीति में युवा चेहरों, सामाजिक आंदोलनों और चुनावी गणित को लेकर चल रही हलचल के बीच एक बेहद अप्रत्याशित सियासी घटनाक्रम सामने आया है। केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के प्रमुख रामदास आठवले ने सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक युवाओं की मुखर आवाज बन चुके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके को एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में शामिल होने का खुला न्योता दे दिया है। नागपुर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आठवले ने साफ शब्दों में कहा कि अभिजीत दीपके एक आंबेडकरवादी सोच वाले युवा हैं और अगर वे बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनके साथ आते हैं, तो वे खुले दिल से उनका स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। बीते कुछ महीनों में यह दूसरा मौका है जब मोदी सरकार के किसी वरिष्ठ सहयोगी मंत्री ने दीपके को अपनी पार्टी और सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होने का औपचारिक प्रस्ताव सार्वजनिक मंच से पेश किया है। इस बयान के सामने आते ही महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर पारंपरिक दलित राजनीति के दिग्गज नेता एक व्यंग्यात्मक और व्यवस्था-विरोधी युवा आंदोलन के अगुआ को अपने पाले में लाने के लिए इतने उत्सुक क्यों नजर आ रहे हैं।

नागपुर में केंद्रीय मंत्री आठवले का बड़ा बयान: ‘बाबासाहेब की पार्टी को युवाओं की जरूरत’

नागपुर में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने दलित राजनीति के वर्तमान परिदृश्य और नई पीढ़ी की भागीदारी पर विस्तार से अपनी राय रखी। आठवले ने कहा कि बाबासाहेब आंबेडकर ने शोषितों, वंचितों और युवाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए रिपब्लिकन पार्टी का सपना देखा था, लेकिन उस सपने को पूरी तरह साकार करने के लिए आज की तारीख में ऊर्जावान, पढ़े-लिखे और आधुनिक तकनीक को समझने वाले युवाओं (Gen-Z) की सख्त दरकार है। आठवले ने अभिजीत दीपके का जिक्र करते हुए कहा, “दीपके भी हमारे अपने समाज से आते हैं और वे एक प्रतिबद्ध आंबेडकरवादी हैं। मैंने पहले भी उनसे कहा था और आज फिर दोहरा रहा हूं कि बाबासाहेब की राजनीतिक पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए युवाओं को आगे आना होगा। अगर वे हमारे साथ जुड़ते हैं, तो यह न केवल हमारे संगठन बल्कि पूरे समाज के लिए बहुत अच्छा होगा। अगर वे आने का फैसला करते हैं, तो मैं व्यक्तिगत रूप से उनका स्वागत करूंगा।”

गौरतलब है कि रामदास आठवले ने इससे पहले अगस्त 2026 में भी अभिजीत दीपके को अपनी पार्टी RPI(A) में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया था। उस दौरान आठवले ने कहा था कि सड़कों पर सिर्फ नारेबाजी करने या डिजिटल विरोध दर्ज कराने के बजाय मुख्यधारा की राजनीति में आकर संवैधानिक व्यवस्था के भीतर काम करना ज्यादा असरदार होता है। हालांकि, इस खुले न्योते के साथ-साथ आठवले अतीत में दीपके और उनकी कॉकरोच जनता पार्टी की तीखी शैली पर नाराजगी भी जता चुके हैं। अक्टूबर महीने की शुरुआत में ही आठवले ने सार्वजनिक रूप से नसीहत दी थी कि अभिजीत दीपके और उनके समर्थकों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अमर्यादित और कटु भाषा का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। इसके बावजूद नागपुर में दोबारा दिया गया यह खुला ऑफर साबित करता है कि आठवले दीपके के प्रभाव और उनके युवा जनाधार को नजरअंदाज करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।

कौन हैं अभिजीत दीपके और क्या है कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)?

अभिजीत दीपके का राजनीतिक और सामाजिक सफर किसी पारंपरिक नेता जैसा नहीं रहा है। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे दीपके जाति से महार समुदाय से आते हैं और बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से गहरे रूप से प्रभावित हैं। पुणे से पत्रकारिता व जनसंचार की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित बोस्टन यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ कम्युनिकेशन से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर ऑफ साइंस (MSc) की डिग्री हासिल की। भारत लौटने के बाद उन्होंने मुख्यधारा की चुनावी राजनीति के पर्दे के पीछे एक पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में काम करना शुरू किया। वे वर्ष 2020 से 2023 के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) की डिजिटल और सोशल मीडिया टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे और दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में संचार सलाहकार के तौर पर भी सेवाएं दीं।

मई 2026 में देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं और सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को लेकर की गई एक कथित टिप्पणी के बाद दीपके ने व्यंग्य के रूप में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की डिजिटल नींव रखी। दीपके ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया था कि ‘अगर सभी कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो क्या होगा?’ देखते ही देखते यह व्यंग्यात्मक सवाल एक विशाल डिजिटल आंदोलन में बदल गया। देश के लाखों बेरोजगार युवाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों और व्यवस्था से असंतुष्ट नौजवानों ने खुद को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ लिया। CJP ने बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई, सरकारी जवाबदेही और शिक्षा सुधारों को अपना मुख्य मुद्दा बनाया और इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब जैसे मंचों पर लाखों फॉलोअर्स जुटा लिए। दीपके का यह संगठन पारंपरिक पार्टी न होकर खुद को युवाओं का एक स्वतंत्र ‘प्रेशर ग्रुप’ बताता है।

पहले देशद्रोही का ठप्पा, अब एनडीए में स्वागत? दीपके का पुराना रुख और सीजेपी की रणनीति

केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के इस ताजा बयान पर अभिजीत दीपके की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है, लेकिन अतीत में दिए गए ऐसे ही प्रस्तावों पर दीपके का रुख बेहद आक्रामक और कटाक्ष भरा रहा है। जब अगस्त में उन्हें पहली बार एनडीए का हिस्सा बनने की पेशकश की गई थी, तब दीपके ने सत्तापक्ष के दोहरे रवैये पर सवाल खड़े किए थे। दीपके ने कहा था कि यह बेहद हास्यास्पद है कि भाजपा और सत्ता पक्ष के कुछ मंत्री व नेता चंद रोज पहले तक उनकी टीम और आंदोलनकारियों को ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े’ और ‘देशद्रोही’ करार दे रहे थे, लेकिन जब उन्हें जमीन पर युवाओं की ताकत का अहसास हुआ, तो अचानक उन्हें एनडीए में शामिल करने के प्रेम पत्र भेजे जाने लगे।

दीपके यह भी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि उनकी कॉकरोच जनता पार्टी का फिलहाल कोई प्रत्यक्ष चुनावी महत्वाकांक्षा पालने या चुनाव लड़ने का इरादा नहीं है। उनका मुख्य उद्देश्य सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उस पर युवाओं के बुनियादी सवालों को लेकर नीतिगत दबाव बनाना है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में अक्टूबर 2026 के मध्य में अभिजीत दीपके उस वक्त राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के विरोध में जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस पर प्रदर्शन करने के दौरान दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। इस दौरान शांति भंग की धाराओं के तहत उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हुई थी। ऐसे में जब एक तरफ वे केंद्र सरकार और उसकी प्रशासनिक मशीनरी के सीधे निशाने पर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री आठवले द्वारा उनका हाथ थामने की पेशकश ने पूरे मामले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।

आठवले की सियासी मजबूरी या दूरगामी चाल? दलित और युवा वोट बैंक पर नजर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रामदास आठवले द्वारा अभिजीत दीपके को बार-बार आमंत्रित करने के पीछे गहरी सियासी रणनीति छिपी है। महाराष्ट्र की राजनीति में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) लंबे समय से एनडीए का एक वफादार घटक दल रही है, लेकिन पार्टी का संगठनात्मक ढांचा काफी हद तक पुरानी पीढ़ी के नेताओं के इर्द-गिर्द सिमट चुका है। राज्य के युवाओं, खासकर शिक्षित दलित और बहुजन नौजवानों के बीच प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) या फिर कांग्रेस-शरद पवार गुट का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। दूसरी तरफ, अभिजीत दीपके जैसे युवा नेता ने बिना किसी स्थापित राजनीतिक घराने के अपने दम पर इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं के बीच एक जबरदस्त पकड़ बनाई है।

आठवले अच्छी तरह समझते हैं कि अगर वे दीपके जैसे तकनीकी रूप से दक्ष और आक्रामक युवा चेहरे को अपनी पार्टी RPI(A) में जोड़ने में कामयाब हो जाते हैं, तो इससे न केवल उनकी पार्टी को नई उम्र का ऊर्जावान कैडर मिल जाएगा, बल्कि एनडीए के भीतर भी उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ जाएगी। इसके अलावा, सत्ताधारी गठबंधन पर अक्सर युवाओं और छात्रों के मुद्दों की अनदेखी करने के जो आरोप विपक्ष लगाता रहा है, उसकी काट के लिए भी दीपके जैसे आंदोलनकारी का एनडीए के मंच पर होना एक बड़ा प्रतीकात्मक लाभ साबित हो सकता है। यही कारण है कि तमाम तीखी आलोचनाओं के बावजूद आठवले दीपके के लिए अपने दरवाजे बंद करने को तैयार नहीं हैं।

क्या दबाव समूह से सीधे चुनावी राजनीति में कदम रखेंगे दीपके?

नागपुर से उठी इस सियासी पेशकश ने महाराष्ट्र और केंद्र की राजनीति में एक नया विमर्श छेड़ दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या अभिजीत दीपके व्यवस्था के खिलाफ खड़े एक ‘प्रेशर ग्रुप’ के नेता के रूप में अपनी छवि बनाए रखेंगे, या फिर वे सत्ता के गलियारों में हिस्सेदारी लेकर बाबासाहेब के मिशन को आगे बढ़ाने के आठवले के प्रस्ताव पर कभी गंभीरता से विचार करेंगे। दीपके के करीबी कार्यकर्ताओं का मानना है कि मुख्यधारा की पार्टियों में शामिल होने से आंदोलन की वह निष्पक्षता और धार कुंद हो सकती है जिसके दम पर लाखों नौजवान उनसे जुड़े हैं। वहीं दूसरी तरफ, राजनीति का यथार्थ यह भी है कि बिना विधायी और नीतिगत शक्ति के केवल सोशल मीडिया या धरने-प्रदर्शनों से बड़े व्यवस्थागत बदलाव लाना आसान नहीं होता। आठवले की इस नई पेशकश ने गेंद अब पूरी तरह अभिजीत दीपके के पाले में डाल दी है, और आने वाले दिनों में उनका जवाब यह तय करेगा कि महाराष्ट्र की युवा राजनीति किस दिशा में करवट लेती है।

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