नेपाल में ‘हिमालयी सुनामी’ का कहर: 1250 से ज्यादा मौतें, 5000 से अधिक लोग लापता; अपनों के न मिलने पर अब हो रहे हैं प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार

प्रकृति का विकराल रूप और भयंकर तबाही किसे कहते हैं, इसकी बानगी इन दिनों पड़ोसी देश नेपाल में साफ तौर पर देखी जा सकती है। नेपाल में आई अचानक विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने जो तबाही मचाई है, उसके आंकड़े किसी को भी सिहरा देने के लिए काफी हैं। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) द्वारा जारी ताजा और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस भीषण आपदा में मरने वालों की कुल संख्या बढ़कर 1,259 तक पहुंच चुकी है, जबकि 5,000 से अधिक लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। दिन-ब-दिन बढ़ती इस संख्या ने पूरे देश को शोक और गहरे सदमे में डुबो दिया है। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि हफ्तों बीत जाने के बाद भी जब अपनों का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है, तो हताश और बेबस परिवार पारंपरिक विधि-विधान से उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने को मजबूर हो गए हैं। यह मानवीय त्रासदी आधुनिक इतिहास के सबसे डरावने अध्यायों में दर्ज होती जा रही है, जहां जीवित बचने की उम्मीदें अब पूरी तरह दम तोड़ चुकी हैं।

‘हिमालयी सुनामी’ और नेपाल में तबाही के खौफनाक आंकड़े

इस तबाही की शुरुआत नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के खिसकने (आइस-रॉक एवांच) की एक घातक घटना से हुई थी, जिसने देखते ही देखते उत्तर और मध्य नेपाल के कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में आए उफान ने निचले इलाकों में बस्तियों के अस्तित्व को ही मिटा दिया। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने देश में मचे इस अभूतपूर्व विध्वंस को ‘हिमालयी सुनामी’ की संज्ञा दी है। नेपाल पुलिस और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, चितवन जिले से सबसे अधिक 355 शव बरामद किए गए हैं। इसके अलावा नवलपरासी पूर्व से 218, नवलपरासी पश्चिम से 212 (जिनमें भारत से मिले 18 शव भी शामिल हैं), और नुवाकोट से 177 शव निकाले जा चुके हैं। इसके साथ ही रसुवा जिले से 127, गोरखा से 72, धादिंग से 60 और तनहूं से 38 शवों को बरामद किया जा चुका है। सीमा पार तिब्बत के ग्यारोंग काउंटी में भी इस आपदा के कारण 21 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और 500 से अधिक लोग वहां भी लापता हैं। तबाही का यह दायरा इतना बड़ा है कि देश के कई हिस्सों में बुनियादी ढांचे पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं और संपर्क मार्ग कट गए हैं।

उम्मीद टूटी तो कुशा घास के पुतलों से शुरू हुआ प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार

जब आपदा के कई दिन बीत जाने के बाद भी अपनों के जीवित मिलने की सारी उम्मीदें धुंधली पड़ जाती हैं, तब इंसान का दिल किस हद तक टूट जाता है, इसकी बानगी रसुवा जिले के पहरेबेसी गांव और अन्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में देखने को मिल रही है। ‘द काठमांडू पोस्ट’ और ‘ऑनलाइनखबर’ जैसी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आठ से नौ दिनों तक लगातार तलाश करने के बावजूद जब लापता परिजनों का कोई अता-पता नहीं चला, तो परिवारों ने धार्मिक परंपराओं का सहारा लेते हुए उनका अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया है। चूंकि कई मामलों में शव बरामद नहीं हो सके हैं या उनकी पहचान करना असंभव हो गया है, ऐसे में लोग हिंदू संस्कारों में पवित्र मानी जाने वाली ‘कुशा घास’ से विशेष पुतले तैयार कर रहे हैं। इन कुशा घास के पुतलों को ही अपने लापता परिजनों का शरीर मानकर वे पूरे विधि-विधान और भारी मन से अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कर रहे हैं। दृश्य बेहद मर्माहत करने वाला है, जहां पूरा गांव अपने बिछड़े हुए प्रियजनों की याद में आंसू बहा रहा है और पारंपरिक रूप से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहा है।

सुरंगों में जिंदगी की तलाश और कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन

आपदा के इतने दिन बीत जाने के बाद भी नेपाल सेना के नेतृत्व में संयुक्त बचाव दल दिन-रात राहत और खोज अभियान में जुटे हुए हैं। सबसे चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की भारी-भरकम सुरंगों के भीतर चलाया जा रहा है। रसुवा के ‘अपर त्रिशूली-1’ प्रोजेक्ट और नुवाकोट के ‘अपर त्रिशूली-3 ए’ प्रोजेक्ट की सुरंगों में मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश के लिए विशेष अभियानों को अंजाम दिया जा रहा है। इस कठिन घड़ी में भारतीय सुरंग बचाव दल और विशेषज्ञ भी नेपाली सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चिलिमे पावर हाउस और अन्य दुर्गम क्षेत्रों में डटे हुए हैं। भारतीय और नेपाली टीमों ने उन्नत उपकरणों की मदद से सुरंगों के भीतर कई मीटर तक का दायरा खंगाल डाला है। हालांकि, बाढ़ के कारण रसुवा और नुवाकोट घाटियों का पूरा भूगोल और प्राकृतिक दृश्य ही बदल चुका है, जिसके चलते हेलीकॉप्टर के पायलटों और ग्राउंड टीमों को उड़ान भरने तथा आगे बढ़ने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद सुरक्षा बलों का हौसला कम नहीं हुआ है और वे जान जोखिम में डालकर जिंदगियों को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं।

मौसम का लगातार खतरा और जन-सहयोग की मिसाल

जमीनी स्तर पर राहत और बचाव कार्य अभी पूरी तरह थमे भी नहीं हैं कि मौसम विभाग ने एक बार फिर चेतावनी जारी कर दी है। जल एवं मौसम विज्ञान विभाग के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग ने बताया है कि भोटेकोशी नदी के ऊपरी इलाकों में लगातार बारिश का दौर जारी है। इस निरंतर बारिश के कारण भोटेकोशी, त्रिशूली और रसुवा-नुवाकोट की छोटी नदियों तथा जलधाराओं का जलस्तर एक बार फिर तेजी से बढ़ने की आशंका है। प्रशासन ने नदी के आसपास और निचले हिस्सों में रहने वाले लोगों को पूरी तरह सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। इस राष्ट्रीय संकट के समय जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पड़ोसी देश नेपाल की मदद के लिए आगे आए हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर से भी मानवीय एकता की अनूठी मिसालें देखने को मिल रही हैं। नेपाल के विभिन्न स्कूलों के छोटे-छोटे बच्चे अपनी जेब खर्च और नाश्ते के पैसे बचाकर प्रधानमंत्री राहत कोष में स्वेच्छा से दान कर रहे हैं। बच्चों का यह मासूम योगदान इस बात का प्रतीक है कि पूरा राष्ट्र एकजुट होकर इस भीषण आपदा का सामना कर रहा है और पीड़ित परिवारों को इस गहरे जख्म से उबारने के लिए हरसंभव प्रयास जारी हैं।

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