नौकरी गई तो तुरंत निकलो; ट्रंप प्रशासन का नया फरमान, 60 दिन का ग्रेस पीरियड खत्म करने की तैयारी, भारतीयों पर सबसे बड़ा असर

अमेरिका में काम कर रहे विदेशी कुशल कामगारों, विशेषकर भारतीय आईटी पेशेवरों को ट्रंप प्रशासन ने एक और बड़ा झटका दिया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security – DHS) ने फेडरल रजिस्टर में एक नया प्रस्ताव पेश किया है, जिसके तहत नौकरी छूटने या छंटनी होने के बाद मिलने वाले 60 दिनों के ग्रेस पीरियड (Grace Period) को पूरी तरह खत्म करने की तैयारी की जा रही है।

यदि यह प्रस्तावित नियम अंतिम रूप से लागू हो जाता है, तो H-1B सहित कई श्रेणियों के नॉन-इमिग्रेंट वीजा धारकों को नौकरी जाने के बाद अमेरिका में रुकने का कोई अतिरिक्त समय नहीं मिलेगा। विदेशी कर्मचारियों को अपना रोजगार समाप्त होते ही तत्काल प्रभाव से अमेरिका छोड़ना होगा। इस कड़े कदम से सिलिकॉन वैली से लेकर तमाम अमेरिकी कंपनियों में कार्यरत लाखों भारतीय इंजीनियरों, विश्लेषकों और उनके परिवारों के सामने गंभीर अनिश्चितता का संकट खड़ा हो गया है।

2016 में मिला था 60 दिनों का सुरक्षा कवच, अब छीनने की तैयारी

ओबामा प्रशासन के दौरान वर्ष 2016-17 में विदेशी कामगारों को नौकरी जाने की स्थिति में 60 दिन का ग्रेस पीरियड देने का प्रावधान शुरू किया गया था। इस 60 दिनों की अवधि का मुख्य उद्देश्य यह था कि अचानक छंटनी (Layoff) का शिकार होने वाले प्रोफेशनल्स को अमेरिका के भीतर ही दूसरी नौकरी ढूंढने, नया वीजा स्पॉन्सर तलाशने या अपने घर, बच्चों की पढ़ाई और निजी सामान समेटने का मानवीय समय मिल सके।

हालांकि, ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि इस ग्रेस पीरियड को खत्म करने से विदेशी कामगारों के वीजा स्टेटस और उनके रोजगार के बीच सीधा संबंध दोबारा बहाल होगा तथा प्रशासनिक बोझ में कमी आएगी। डीएचएस का मानना है कि रिक्त होने वाले इन पदों पर कंपनियों को अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि किसी विदेशी कर्मचारी को बाद में कोई नई कंपनी काम पर रखना चाहती है, तो उसे पहले अपने देश लौटना होगा और वहां अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास के जरिए नए सिरे से वीजा प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी: भारतीयों पर क्यों पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका द्वारा जारी किए जाने वाले कुल H-1B वीजा में से 70 से 72 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों की होती है। इंफोसिस, टीसीएस, एचसीएल टेक, विप्रो जैसी भारतीय आईटी दिग्गज कंपनियों के अलावा गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, डेलॉइट और ईवाई जैसी वैश्विक कंपनियां बड़ी संख्या में भारतीय प्रोफेशनल्स को इस वीजा के जरिए नियुक्त करती हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और वैश्विक आर्थिक सुस्ती के चलते टेक सेक्टर में लगातार छंटनी का दौर जारी है। ऐसे नाजुक समय में अगर किसी कर्मचारी की नौकरी अचानक जाती है, तो उसके पास दूसरा विकल्प तलाशने का कोई वक्त नहीं बचेगा। इमिग्रेशन कानूनी विशेषज्ञों (Immigration Law Firms) का कहना है कि नियम लागू होने पर छंटनी होते ही कर्मचारियों को निर्वासन (Deportation) से जुड़े ‘नोटिस टू अपीयर’ (Notice to Appear – NTA) जारी होने का जोखिम बढ़ जाएगा।

केवल H-1B ही नहीं, इन सभी वीजा धारकों पर गिरेगी गाज

गृह सुरक्षा विभाग द्वारा जारी मसौदे के अनुसार, यह नियम केवल H-1B तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसके दायरे में कई अन्य महत्वपूर्ण गैर-आप्रवासी वीजा श्रेणियां भी शामिल की गई हैं:

  • L-1 Visa: बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले प्रबंधकों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए।

  • O-1 Visa: विज्ञान, कला, शिक्षा, खेल या व्यवसाय में असाधारण योग्यता (Extraordinary Ability) रखने वाले प्रोफेशनल्स।

  • E-1 और E-2: अंतरराष्ट्रीय व्यापारी और निवेशक श्रेणी के कर्मी।

  • TN Visa: यूएसएमसीएस (NAFTA) के तहत आने वाले कनाडाई और मैक्सिकन प्रोफेशनल्स।

  • E-3 और H-1B1: ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और चिली के कुशल कामगार।

60 दिनों का मिला है समय: क्या है आगे की प्रक्रिया?

फिलहाल यह नियम तत्काल प्रभाव से लागू नहीं हुआ है। विभाग ने इस प्रस्ताव को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित कर सार्वजनिक टिप्पणियों और आपत्तियों के लिए 60 दिनों का समय दिया है। इस दौरान अमेरिकी टेक कंपनियां, व्यापारिक संगठन, प्रवासी समुदाय और कानूनी संस्थाएं अपना पक्ष और आपत्तियां दर्ज करा सकेंगी।

सार्वजनिक समीक्षा के बाद ही प्रशासन यह तय करेगा कि नियम को मूल रूप में लागू किया जाए, इसमें कोई संशोधन किया जाए या इसे वापस लिया जाए। भारतीय तकनीकी समुदाय और कॉरपोरेट जगत ने इस प्रस्ताव पर गहरी चिंता जताते हुए बाइडन प्रशासन के दौरान दिए गए सुझावों (जिसमें ग्रेस पीरियड को 60 से बढ़ाकर 180 दिन करने की मांग थी) के विपरीत इसे एक कठोर और दंडात्मक कदम बताया है।

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