‘प्लीज! मदद कीजिए, उन पर हमले कीजिए’; ट्रंप के सामने दो बार गिड़गिड़ाए सऊदी प्रिंस MBS, लेकिन अमेरिका ने सीधे किया इनकार

यमन के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा (Al-Mokha) पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के कब्जे और बाब-अल मंडेब के मुहाने तक उनकी पहुंच बनने के बाद सऊदी अरब में भारी खलबली मच गई है। जमीनी मोर्चे पर अपने समर्थक यमनी बलों के पीछे हटने से परेशान सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सीधे सैन्य दखल की गुहार लगाई है।

अमेरिकी न्यूज पोर्टल ‘एक्सिओस’ (Axios) की रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी क्राउन प्रिंस ने गुरुवार को कुछ ही घंटों के अंतराल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दो बार फोन किया। इस दौरान सऊदी प्रिंस ने गिड़गिड़ाते हुए ट्रंप से साफ कहा—“प्लीज! मदद कीजिए, हूतियों पर सीधे अमेरिकी हमले कीजिए” हालांकि, सऊदी अरब के इस बेहद संवेदनशील और आपातकालीन अनुरोध के बावजूद ट्रंप प्रशासन ने हूतियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमलों का आदेश देने से दो टूक इनकार कर दिया।

फोन पर क्या हुआ: पहले हालात बताए, फिर घंटों बाद मांगी बमबारी की मंजूरी

अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से सामने आए विवरण के मुताबिक:

  • पहला फोन कॉल: गुरुवार को जब हूती लड़ाके तेजी से मोचा शहर के भीतर दाखिल हो रहे थे और सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बल अपनी चौकियां छोड़कर दक्षिण में धुबाब की ओर पीछे हट रहे थे, तब एमबीएस ने ट्रंप को फोन कर बिगड़ते जमीनी हालात की जानकारी दी।

  • दूसरा फोन कॉल: इसके कुछ ही घंटों बाद सऊदी प्रिंस ने दोबारा ट्रंप को फोन मिलाया और उनसे तुरंत अमेरिकी वायुसेना व नौसेना को हूतियों के नए ठिकानों पर भीषण स्ट्राइक करने का आदेश देने का अनुरोध किया।

लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मांग को खारिज कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन की फिलहाल यमन में सीधे तौर पर कोई नया युद्ध मोर्चा खोलने या सैन्य हस्तक्षेप करने की योजना नहीं है। हालांकि, अमेरिका ने सऊदी अरब को यह भरोसा जरूर दिया है कि वह हूतियों के मूवमेंट से जुड़ी हाई-लेवल खुफिया जानकारी (Intelligence) और टारगेटिंग डेटा रियाद के साथ साझा करता रहेगा।

‘खुद लड़ो अपनी लड़ाई’: क्यों पीछे हट गए डोनाल्ड ट्रंप?

ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अमेरिका की मुख्य प्राथमिकता केवल लाल सागर में नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) की रक्षा करना है, न कि यमन के जटिल गृहयुद्ध में सीधे दलदल का हिस्सा बनना। वाशिंगटन की नई नीति अपने क्षेत्रीय साझेदारों को खुद चुनौतियों से निपटने और नेतृत्व करने के लिए प्रेरित करने की है।

अमेरिका को इस बात की आशंका है कि यदि अमेरिकी युद्धपोतों या बमवर्षकों ने यमन में सीधे हमले किए, तो यह संघर्ष अनियंत्रित होकर पूरे मध्य पूर्व में फैल सकता है। इससे होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से आक्रामक तेहरान और उसके प्रॉक्सी संगठन खाड़ी के अन्य ठिकानों को भी बड़े पैमाने पर निशाना बनाना शुरू कर देंगे। इसी रणनीतिक तालमेल को संभालने के लिए अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर तुरंत रियाद पहुंचे हैं।

तेल बाजार में हड़कंप: 116 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचे दाम

सऊदी प्रिंस द्वारा ट्रंप से सैन्य मदद मांगने और मोचा के छिन जाने की खबर फैलते ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी घबराहट फैल गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछलकर करीब 116 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गईं।

ऊर्जा विशेषज्ञों को डर है कि बाब-अल मंडेब से महज 80 किलोमीटर की दूरी पर हूतियों के तोपखाने और मिसाइलें तैनात होने से सऊदी अरब का लाल सागर के जरिए होने वाला तेल निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है। चूंकि ईरान फारस की खाड़ी के होर्मुज रूट पर पहले से दबाव बनाए हुए है, ऐसे में लाल सागर का वैकल्पिक रूट भी बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा।

सऊदी अरब का यू-टर्न: ‘हम सक्षम हैं’ से लेकर ‘मदद की गुहार’ तक

इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब के बदलते रुख को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। कुछ महीने पहले तक रियाद का दावा था कि वह किसी भी हूती खतरे से अपने दम पर निपटने में पूरी तरह सक्षम है और उसे किसी विदेशी मदद की दरकार नहीं है। जुलाई में जब सऊदी अरब ने ईरानी विमान को सना में उतरने से रोका था, तब भी उसने स्वतंत्र कार्रवाई की बात कही थी।

लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हूतियों ने ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइलों और तटीय अभियानों के जरिए सऊदी की रक्षा पंक्ति में सेंध लगा दी है। जब पानी सिर से ऊपर गुजर गया, तो सऊदी क्राउन प्रिंस को ट्रंप के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा, मगर ट्रंप के ‘ना’ ने रियाद को गहरे संकट और अकेलेपन में धकेल दिया है।

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