बच्चों में गठिया का बढ़ता खतरा: सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं आर्थराइटिस, बचपन छीन रहे ये 5 खामोश लक्षण

जब भी गठिया या आर्थराइटिस का नाम आता है, तो अक्सर हमारे जेहन में लाठी के सहारे चलते बुजुर्गों की तस्वीर उभरती है, लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि घुटनों के बल रेंगने या गलियों में बेपरवाह दौड़ने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चे भी इस दर्दनाक बीमारी की गिरफ्त में आ सकते हैं। अस्पतालों की ओपीडी में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां चार से दस साल तक के मासूम सुबह उठकर चलने से रोने लगते हैं या अचानक खेलने-कूदने से कतराने लगते हैं। मेडिकल साइंस की दुनिया में बच्चों में होने वाले इस गठिया को जुवेनाइल इडियोपैथिक आर्थराइटिस या जेआईए (JIA) कहा जाता है। यह कोई आम मौसमी दर्द या सामान्य चोट की सूजन नहीं है, बल्कि शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक प्रणाली का ऐसा भटकाव है जो जोड़ों की नरम हड्डियों और ऊतकों पर हमला बोल देता है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़ और बेंगलुरु जैसे प्रमुख मेडिकल संस्थानों के पीडियाट्रिक विभागों में हर महीने सैकड़ों अभिभावक इस गलतफहमी के साथ पहुंचते हैं कि उनके बच्चे को खेलते समय कोई मोच आ गई होगी, जबकि असल में वह बाल गठिया की शुरुआती स्टेज से जूझ रहा होता है।

खेल-कूद से दूरी और सुबह का रोना: पहचानिए बाल गठिया के 5 सबसे बड़े चेतावनी संकेत

बच्चों के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे अपने दर्द को बड़ों की तरह शब्दों में बयां नहीं कर पाते, वे सिर्फ असहज होकर चिड़चिड़े हो जाते हैं या फिर अपनी पसंदीदा गतिविधियों से दूरी बना लेते हैं। इस बीमारी का पहला और सबसे प्रमुख लक्षण है सुबह के समय जोड़ों में होने वाली तेज जकड़न (Morning Stiffness)। सोकर उठने के बाद बच्चा अपने पैरों को सीधा करने या हाथ की मुट्ठी खोलने में भारी परेशानी महसूस करता है और करीब आधे से एक घंटे तक उसे सामान्य होने में वक्त लगता है। दूसरा लक्षण जोड़ों में दिखने वाली अकारण सूजन और गर्माहट है; घुटने, टखने या कलाई के जोड़ पर बिना किसी चोट के सूजन आ जाती है और उसे छूने पर वह बाकी त्वचा के मुकाबले हल्का गर्म महसूस होता है। तीसरा लक्षण बच्चे की चाल में बदलाव है, जहां बच्चा अचानक लंगड़ाकर चलने लगता है या बार-बार सीढ़ियां चढ़ने से बचता है। चौथा लक्षण सिस्टमिक जेआईए में दिखने वाला असामान्य बुखार और हल्के गुलाबी रंग के चकत्ते हैं, जिसमें रोजाना शाम को तेज बुखार चढ़ता है और कुछ ही घंटों में बिना किसी एंटीबायोटिक के सामान्य हो जाता है। पांचवां और सबसे खतरनाक लक्षण आंखों में होने वाली सूजन या यूवाइटिस (Uveitis) है, जो बिना किसी बाहरी दर्द के बच्चे की दृष्टि को धुंधला कर सकती है, इसलिए आंखों में लाली या प्रकाश से असहजता को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ग्रोइंग पेन या गंभीर गठिया: अभिभावक अक्सर कहां कर बैठते हैं सबसे बड़ी चूक

भारतीय परिवारों में अक्सर यह मान लिया जाता है कि अगर बच्चा रात में पैरों के दर्द की शिकायत कर रहा है, तो यह उसकी हड्डियों के विकास यानी ‘ग्रोइंग पेन’ (Growing Pain) का सामान्य हिस्सा है। इसी चक्कर में परिजन हफ्तों तक कभी तेल की मालिश तो कभी गर्म सिकाई करते रहते हैं और बीमारी अंदर ही अंदर जोड़ों के कार्टिलेज को नुकसान पहुँचाती रहती है। ग्रोइंग पेन में कभी भी जोड़ों पर सूजन, लाली या गर्माहट नहीं आती और यह दर्द ज्यादातर शाम या रात के समय होता है जो सुबह उठते ही गायब हो जाता है, जबकि गठिया का दर्द सुबह सोकर उठते ही सबसे ज्यादा विकराल रूप में सामने आता है। जब माता-पिता इस फर्क को समझने में देरी करते हैं, तो बीमारी बच्चे के अन्य जोड़ों को भी अपनी चपेट में ले लेती है। पीडियाट्रिक रुमेटोलॉजिस्ट्स का स्पष्ट कहना है कि यदि किसी बच्चे के जोड़ों में सूजन या लंगड़ाने की समस्या लगातार छह हफ्तों से अधिक समय तक बनी रहती है, तो इसे केवल सामान्य थकान या कमजोरी मानकर नजरअंदाज करना भविष्य में स्थायी शारीरिक विकृति का कारण बन सकता है।

इम्यून सिस्टम का यह भटकाव क्यों बनता है बच्चों के लिए शारीरिक मुसीबत

आमतौर पर हमारा इम्यून सिस्टम बाहर से आने वाले वायरस और बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा करने के लिए बना है, लेकिन जेआईए जैसी ऑटोइम्यून बीमारी में यही रक्षक तंत्र भ्रमित होकर अपने ही जोड़ों की लाइनिंग जिसे साइनोवियम (Synovium) कहते हैं, उसे बाहरी दुश्मन समझकर नष्ट करने लगता है। इसके पीछे आनुवंशिक संवेदनशीलता, पर्यावरणीय कारक या किसी वायरल संक्रमण के बाद शरीर में होने वाले असामान्य इम्यून रिस्पॉन्स को जिम्मेदार माना जाता है। उत्तर भारत के मौसमी बदलावों के दौरान ठंड के दिनों में बच्चों में यह जकड़न और ज्यादा बढ़ जाती है, जिससे अभिभावकों को लगता है कि यह ठंड लगने का असर है। अगर इसका सही समय पर निदान न किया जाए, तो यह सूजन धीरे-धीरे हड्डियों के विकास प्लेट्स (Growth Plates) को प्रभावित करने लगती है, जिससे एक पैर छोटा या बड़ा हो सकता है या जोड़ों की बनावट हमेशा के लिए मुड़ सकती है।

डिजिटल दौर में सही डायग्नोसिस और आधुनिक इलाज से पूरी तरह संभव है सामान्य जीवन

आज के दौर में एआई टूल्स और आधुनिक जांच तकनीकों ने बाल गठिया की पहचान को बेहद आसान और सटीक बना दिया है। यदि समय रहते पीडियाट्रिक रुमेटोलॉजिस्ट से संपर्क किया जाए, तो ब्लड टेस्ट जैसे ईएसआर (ESR), सीआरपी (CRP), एएनए (ANA) प्रोफाइल और जोड़ों के अल्ट्रासाउंड या एमआरआई के जरिए बीमारी के प्रकार का तुरंत पता लगाया जा सकता है। वर्तमान में चिकित्सा विज्ञान में ऐसी बायोलॉजिक दवाएं और टारगेटेड थेरेपी उपलब्ध हैं जो सीधे इम्यून सिस्टम के उस हिस्से को शांत कर देती हैं जो सूजन पैदा कर रहा होता है। इसके साथ ही नियमित फिजियोथेरेपी और सही पोषण बच्चों को एक बार फिर खेल के मैदान में दौड़ने के काबिल बना देते हैं। भारत भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों, जन औषधि केंद्रों और स्वास्थ्य योजनाओं के तहत अब इन महंगी दवाओं तक आम लोगों की पहुंच भी बेहतर हो रही है, जिससे किसी भी मासूम का भविष्य दर्द के साए में घुटने के बजाय सामान्य और सक्रिय बन सकता है।

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