बुखार में जब शरीर आग की तरह तपता है, तो फिर कंपकंपी और भीषण ठंड क्यों लगती है?

मौसम बदलते ही या किसी वायरल-बैक्टीरियल संक्रमण के संपर्क में आते ही शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाना एक बेहद आम शारीरिक प्रतिक्रिया है। थर्मामीटर लगाने पर रीडिंग 100, 102 या कभी-कभी 104 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच जाती है, त्वचा छूने पर अंगारे की तरह गर्म महसूस होती है, लेकिन मरीज की स्थिति बिल्कुल इसके विपरीत होती है। वह मोटे-मोटे कंबल ओढ़ने के बाद भी ठंड से थर-थर कांप रहा होता है और पंखा या एसी बंद करने की गुहार लगाता है। यह विरोधाभास देखने में जितना अजीब लगता है, शरीर विज्ञान और ह्यूमन एनाटॉमी के लिहाज से उतना ही सटीक और सुव्यवस्थित तंत्र है। अक्सर लोग इसे बीमारी की गंभीरता या कमजोरी मान लेते हैं, लेकिन हकीकत में यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) द्वारा बाहरी कीटाणुओं के खिलाफ छेड़े गए एक संगठित युद्ध का सीधा संकेत होता है। जब तक हम यह नहीं समझ लेते कि शरीर का तापमान नियंत्रित करने वाला केंद्रीय कक्ष कैसे काम करता है, तब तक यह समझना मुश्किल रहता है कि आग जैसे तपते शरीर को बर्फ जैसी ठंडक का अहसास क्यों और कैसे होने लगता है।

दिमाग का मास्टर थर्मोस्टेट ‘हाइपोथैलेमस’ और सेट-पॉइंट का जादुई बदलाव

मानव शरीर का सामान्य तापमान लगभग 98.6 डिग्री फारेनहाइट (या 37 डिग्री सेल्सियस) होता है। इस तापमान को 24 घंटे एक समान बनाए रखने का जिम्मा हमारे मस्तिष्क के एक बहुत छोटे लेकिन अत्यंत शक्तिशाली हिस्से के पास होता है, जिसे हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) कहा जाता है। हाइपोथैलेमस को आप शरीर का ‘मास्टर थर्मोस्टेट’ समझ सकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे घरों में एयर कंडीशनर या हीटर के तापमान को 24 डिग्री पर सेट कर दिया जाता है। जब तक सब कुछ सामान्य रहता है, यह थर्मोस्टेट हमारे शरीर के अंगों को संतुलित तापमान पर संचालित करता रहता है। लेकिन जैसे ही कोई फ्लू वायरस, डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड या बैक्टीरिया हमारे खून में घुसपैठ करता है, हमारी श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBCs) तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। इन बाहरी हमलावरों को खत्म करने के लिए इम्यून सेल्स कुछ खास बायोकेमिकल रिलीज करती हैं, जिन्हें ‘पाइरोजेन्स’ (Pyrogens) और प्रोस्टाग्लैंडीन (Prostaglandin E2) कहा जाता है। ये रसायन खून के बहाव के साथ सीधे मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस तक पहुंचते हैं और वहां चेतावनी का अलार्म बजा देते हैं। अलार्म बजते ही हाइपोथैलेमस शरीर के मानक तापमान के सेट-पॉइंट को 98.6 डिग्री से बढ़ाकर तुरंत 102 या 103 डिग्री फारेनहाइट पर लॉक कर देता है।

तापमान का तुलनात्मक अंतर: यहीं से शुरू होता है ठंड और कंपकंपी का असली खेल

यही वह मोड़ है जहां ठंड लगने का असली भ्रम पैदा होता है। जब हाइपोथैलेमस ने नया लक्ष्य (Set-Point) 103 डिग्री तय कर दिया, उस समय शरीर का वास्तविक तापमान अभी 98.6 या 99 डिग्री ही होता है। अब दिमाग की गणना के अनुसार, शरीर अपने नए तय लक्ष्य की तुलना में काफी ठंडा है। दिमाग को लगता है कि शरीर भयानक ठंड के खतरे में है और उसे तुरंत गर्म करने की सख्त जरूरत है। इस स्थिति को ठीक करने के लिए दिमाग शरीर के सभी अंगों को आपातकालीन निर्देश जारी करता है कि वे जितनी जल्दी हो सके गर्मी पैदा करें और गर्मी का बाहर निकलना रोकें। सबसे पहले त्वचा के पास मौजूद रक्त नलिकाएं तेजी से सिकुड़ जाती हैं (Vasoconstriction), ताकि त्वचा की सतह से ऊष्मा बाहर के वातावरण में न उड़ सके। चूंकि खून अंदरूनी अंगों की ओर खिंच जाता है, इसलिए मरीज के हाथ, पैर और त्वचा ऊपर से ठंडी और पीली महसूस होने लगती है। जब त्वचा के ठंडे सेंसर्स दिमाग को सिग्नल भेजते हैं, तो व्यक्ति को अंदर से तीखी कंपकंपी और ठंड का अहसास होने लगता है।

कंपकंपी (Shivering) कोई कमजोरी नहीं, शरीर की आंतरिक हीटर प्रणाली है

बुखार चढ़ते समय जब मरीज के दांत किटकटाते हैं और पूरा बदन कांपने लगता है, तो मेडिकल भाषा में इसे शिवरिंग (Shivering) कहा जाता है। यह कोई अनैच्छिक बीमारी नहीं, बल्कि दिमाग द्वारा गर्मी पैदा करने का एक सक्रिय प्रयास है। मांसपेशियां बहुत तेजी से सिकुड़ती और फैलती हैं। मांसपेशियों के इस तीव्र घर्षण और रासायनिक क्रिया से भारी मात्रा में थर्मल एनर्जी यानी गर्मी पैदा होती है, जिससे शरीर का आंतरिक तापमान तेजी से ऊपर चढ़ने लगता है। इसके साथ ही शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं जिसे ‘गूज बम्प्स’ कहते हैं। यह शरीर की एक प्राचीन रक्षा प्रणाली है जो त्वचा के ऊपर हवा की एक इंसुलेटिंग परत बनाने की कोशिश करती है ताकि गर्मी सुरक्षित रहे। जब तक शरीर का वास्तविक तापमान हाइपोथैलेमस द्वारा तय किए गए नए उच्च स्तर (जैसे 102 या 103 डिग्री) तक नहीं पहुंच जाता, तब तक मरीज को भीषण ठंड लगती रहती है और वह कांपता रहता है। जैसे ही पारा उस स्तर को छू लेता है, कंपकंपी बंद हो जाती है और मरीज को अत्यधिक तपन व बेचैनी महसूस होने लगती है।

तापमान बढ़ाना क्यों है जरूरी: वायरस को जिंदा जलाने की कुदरती रणनीति

कई लोग सोचते हैं कि बुखार एक दुश्मन है जिसे तुरंत किसी भी हाल में दबा देना चाहिए, जबकि असलियत में बुखार शरीर का सबसे बड़ा रक्षात्मक हथियार है। शरीर में प्रवेश करने वाले अधिकांश वायरस और बैक्टीरिया 98.6 डिग्री फारेनहाइट के तापमान पर ही तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं और पनपते हैं। जैसे ही शरीर का तापमान 101 या 103 डिग्री तक जाता है, यह गर्म वातावरण उनके प्रजनन और जीवित रहने के लिए अत्यंत प्रतिकूल हो जाता है। बढ़ा हुआ तापमान संक्रमणकारी रोगाणुओं के प्रोटीन को नष्ट करने लगता है और उनकी वृद्धि की गति को थाम देता है। इसके साथ ही उच्च तापमान पर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता (T-cells, एंटीबॉडीज और एंजाइम्स) दोगुनी गति और आक्रामकता से काम करने लगती हैं। इसलिए बुखार आना इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण है कि आपका इम्यून सिस्टम जीवित है, पूरी तरह सतर्क है और वायरस से मुकाबला कर रहा है।

बुखार उतरते समय अचानक पसीना-पसीना क्यों हो जाता है शरीर?

जब दवा (जैसे पैरासिटामोल) के असर से या बीमारी से लड़कर शरीर संक्रमण पर काबू पा लेता है, तो रक्त में पाइरोजेन्स का स्तर तेजी से घटने लगता है। इसके बाद हाइपोथैलेमस को यह संकेत मिल जाता है कि खतरा टल चुका है। दिमाग तुरंत अपने सेट-पॉइंट को वापस सामान्य 98.6 डिग्री पर रीसेट कर देता है। अब पासा पूरी तरह पलट जाता है। दिमाग का थर्मोस्टेट 98.6 डिग्री पर आ चुका है, लेकिन शरीर का तापमान अभी भी 102 डिग्री पर तप रहा होता है। दिमाग तुरंत फैसला करता है कि शरीर अत्यधिक गर्म है और इसे ठंडा किया जाना चाहिए। इसके बाद सिकुड़ी हुई नसें अचानक चौड़ी हो जाती हैं (Vasodilation), खून त्वचा की सतह पर तेजी से दौड़ने लगता है, जिससे चेहरा लाल हो जाता है और पसीने की ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं। जब पसीना त्वचा से वाष्पीकृत (Evaporate) होता है, तो शरीर को ठंडक मिलती है और कुछ ही समय में बुखार टूटकर तापमान सामान्य स्तर पर लौट आता है।

बुखार में क्या करें, क्या न करें और कब भागना चाहिए डॉक्टर के पास

बुखार के समय सही देखभाल बेहद आवश्यक है। मरीज को जब कंपकंपी छूट रही हो, तो उसे एक हल्का कंबल ओढ़ाएं, लेकिन उस पर भारी रजाइयों का अंबार न लगाएं, क्योंकि इससे शरीर का तापमान खतरनाक स्तर (105 डिग्री या उससे अधिक) तक पहुंच सकता है, जिससे दिमाग पर असर पड़ने (Febrile Seizure) का जोखिम पैदा हो जाता है। माथे, हथेलियों और पैरों के तलवों पर सामान्य नल के पानी की पट्टियां रखनी चाहिए, कभी भी बर्फ या बहुत ठंडे पानी का इस्तेमाल न करें क्योंकि इससे नसें और अधिक सिकुड़ जाएंगी। बुखार के दौरान शरीर में पानी की भारी कमी (Dehydration) हो जाती है, इसलिए ओआरएस का घोल, नारियल पानी, हल्का सूप और गुनगुना पानी लगातार घूंट-घूंट करके पीते रहें। यदि बुखार 102 डिग्री से अधिक लगातार बना रहे, तीन दिन से अधिक समय तक न उतरे, सांस लेने में तकलीफ हो, सीने में दर्द हो, उल्टी के कारण पानी भी न पच रहा हो या मरीज में अत्यधिक सुस्ती व बेहोशी के लक्षण दिखें, तो बिना किसी देरी के तुरंत योग्य चिकित्सक से संपर्क कर रक्त जांच करानी चाहिए ताकि सही समय पर सटीक इलाज शुरू किया जा सके।

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