भारत के किस राज्य में हैं कैंसर पीड़ित बच्चों की संख्या सबसे अधिक? जानिए टॉप 5 राज्यों का पूरा डेटा

नई दिल्ली: भारत में हर साल अनुमानित तौर पर 45 हजार से 50 हजार बच्चे कैंसर जैसी घातक और जटिल बीमारी की चपेट में आते हैं, जो दुनिया भर में सामने आने वाले कुल बाल कैंसर मामलों का लगभग पांचवां हिस्सा है। हालांकि, सबसे बड़ा और विचारणीय सवाल यह है कि हमारे देश के किस भौगोलिक क्षेत्र और राज्य में मासूम बच्चे इस गंभीर बीमारी से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं? प्रमुख चिकित्सा संस्थानों—विशेषकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS New Delhi) और प्रतिष्ठित ‘जर्नल ऑफ कैंसर पॉलिसी’ द्वारा 22 हजार से अधिक बाल कैंसर मरीजों के आंकड़ों पर किए गए विस्तृत अध्ययन के अनुसार, देश में सर्वाधिक कैंसर पीड़ित बच्चे उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं। देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल शीर्ष पांच राज्यों की सूची में शामिल हैं। यह रिपोर्ट न केवल बीमारियों के आंकड़ों को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि देश के किन हिस्सों में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत हैं और किन क्षेत्रों में मासूमों को इलाज पाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की थकाऊ यात्राएं करनी पड़ रही हैं।

उत्तर प्रदेश: देश में सर्वाधिक बाल कैंसर का बोझ और बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे की चुनौतियां

जनसंख्या के दृष्टिकोण से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज किए गए बाल कैंसर मामलों का लगभग 22.6 प्रतिशत हिस्सा आता है, जो अध्ययन में शामिल सभी राज्यों में सबसे अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक, अकेले उत्तर प्रदेश से 5,000 से अधिक पंजीकृत बच्चे विभिन्न प्रकार के कैंसर—विशेषकर एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर), न्यूरोब्लास्टोमा और लिम्फोमा से पीड़ित पाए गए हैं। राज्य में इस भारी संख्या के पीछे प्राथमिक कारण विशाल जनसंख्या और पर्यावरणीय कारक तो हैं ही, लेकिन उससे भी बड़ा कारण जमीनी स्तर पर समर्पित पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी (बाल कैंसर चिकित्सा) केंद्रों का अत्यधिक अभाव है। राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), संजय गांधी पीजीआई (SGPGIMS) और वाराणसी के महामना पंडित मदन मोहन मालवीय कैंसर केंद्र जैसे कुछ चुनिंदा संस्थानों को छोड़ दें, तो राज्य के अधिकांश जिलों में बच्चों के कैंसर की समय पर जांच और सटीक बायोप्सी की समुचित व्यवस्था नहीं है। इस बुनियादी कमी के कारण पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के सुदूर ग्रामीण अंचल से परिजनों को अपने बीमार बच्चों को लेकर दिल्ली, मुंबई या चंडीगढ़ का रुख करना पड़ता है, जिससे शुरुआती जांच में ही महीनों का कीमती समय बर्बाद हो जाता है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली: स्थानीय मरीजों के साथ देश का सबसे बड़ा रेफरल मेडिकल कॉरिडोर

सूची में दूसरे स्थान पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) दिल्ली है, जहां कुल मामलों का करीब 19.2 प्रतिशत यानी 4,200 से अधिक बाल कैंसर के मरीज दर्ज किए गए हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि दिल्ली के इस ऊंचे आंकड़े का अर्थ यह कतई नहीं है कि राजधानी की स्थानीय आबोहवा में बच्चे ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं। वास्तव में दिल्ली पूरे उत्तर और मध्य भारत का सबसे बड़ा मेडिकल हब है, जहां एम्स (AIIMS), सफदरजंग, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और राजीव गांधी कैंसर संस्थान जैसे विश्वस्तरीय केंद्र मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों से गंभीर रूप से बीमार बच्चों को तुरंत दिल्ली रेफर कर दिया जाता है। जब इन बच्चों की प्राथमिक जांच और इलाज दिल्ली के बड़े अस्पतालों में शुरू होता है, तो अस्पताल के आधिकारिक रजिस्टरों में उनका पंजीकरण दिल्ली केंद्र के तहत दर्ज हो जाता है। दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बाहरी मरीजों का यह भारी दबाव न केवल बेड और आईसीयू की कमी पैदा करता है, बल्कि अस्पतालों के बाहर फुटपाथों और धर्मशालाओं में डेरा डाले बेबस परिवारों की मार्मिक तस्वीरें भी व्यवस्था की लाचारी बयान करती हैं।

तमिलनाडु: दक्षिण भारत में बेहतर स्क्रीनिंग नेटवर्क और उच्च डिटेक्शन रेट का मॉडल

लगभग 18 प्रतिशत (4,000 से अधिक दर्ज मामले) की हिस्सेदारी के साथ तमिलनाडु देश में तीसरे स्थान पर है, लेकिन इस राज्य की पृष्ठभूमि उत्तर भारत के राज्यों से काफी भिन्न है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु में मामलों की उच्च संख्या वहां के मजबूत जनस्वास्थ्य ढांचे और सक्रिय कैंसर रजिस्ट्री प्रणाली का सीधा परिणाम है। चेन्नई स्थित ऐतिहासिक कैंसर इंस्टीट्यूट (अड्यार) और वेल्लोर का क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC) दशकों से बाल कैंसर के इलाज में अग्रणी रहे हैं। तमिलनाडु के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/CHC) में डॉक्टरों और आशा कार्यकर्ताओं को बच्चों में लगातार रहने वाले बुखार, शरीर पर नीले निशान, हड्डियों में दर्द या असामान्य गिल्टियों जैसे लक्षणों को जल्दी पहचानने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। बेहतर और समय पर स्क्रीनिंग होने के कारण राज्य में छिपे हुए मामले भी रिकॉर्ड में आ जाते हैं, जबकि कई अन्य पिछड़े राज्यों में सही पहचान न होने के कारण बच्चे बिना इलाज के ही दम तोड़ देते हैं और उनका नाम किसी आंकड़े में दर्ज नहीं हो पाता।

आंध्र प्रदेश: दक्षिण-मध्य भारत में बढ़ता दायरा और क्षेत्रीय चिकित्सा केंद्रों का उभार

अध्ययन में चौथे पायदान पर आंध्र प्रदेश का नाम आता है, जहां कुल मामलों का लगभग 6.1 प्रतिशत (1,350 से अधिक बच्चे) दर्ज किया गया है। विशाखापट्टनम, विजयवाड़ा और तिरुपति जैसे प्रमुख शहरों में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर आधुनिक कैंसर केंद्रों की स्थापना के बाद से राज्य में बाल कैंसर रोगियों के पंजीकरण में तेजी देखी गई है। आंध्र प्रदेश में बच्चों के भीतर ब्लड कैंसर के साथ-साथ ब्रेन ट्यूमर और रेटिनोब्लास्टोमा (आंखों का कैंसर) के मामलों की संख्या में हाल के वर्षों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं और क्षेत्रीय मेडिकल कॉलेजों में सुपर-स्पेशियलिटी विभागों के विस्तार के चलते अब ग्रामीण इलाकों के बच्चों को भी हैदराबाद या बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों में भागे बिना अपने ही राज्य में शुरुआती कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की सुविधा मिलने लगी है, हालांकि जटिल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) के लिए आज भी सीमित संसाधन एक बड़ी बाधा बने हुए हैं।

पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत: कोलकाता पर निर्भरता और डायग्नोसिस में देरी का संकट

शीर्ष पांच राज्यों में पश्चिम बंगाल एक अत्यंत संवेदनशील पायदान पर स्थित है, जिसके साथ मध्य प्रदेश और बिहार भी उच्च प्रसार वाले क्षेत्रों में आते हैं। पश्चिम बंगाल में बच्चों के कैंसर का भारी दबाव मुख्य रूप से कोलकाता के कुछ बड़े मेडिकल संस्थानों जैसे चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (CNCI), मेडिकल कॉलेज कोलकाता और टाटा मेडिकल सेंटर पर केंद्रित है। पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए कोलकाता एकमात्र सबसे बड़ा चिकित्सा केंद्र है, जिसके चलते न केवल पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और सुंदरबन जैसे दूरदराज के इलाकों से, बल्कि सीमावर्ती राज्य बिहार, झारखंड, ओडिशा और पड़ोसी देश बांग्लादेश तक से हजारों बच्चे यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या डायग्नोस्टिक डिले (रोग की पहचान में अत्यधिक देरी) है। जब तक बच्चे कोलकाता के बड़े अस्पतालों तक पहुंचते हैं, तब तक अक्सर उनका कैंसर दूसरी या तीसरी स्टेज में पहुंच चुका होता है, जिससे इलाज की जटिलता और वित्तीय लागत दोनों कई गुना बढ़ जाती हैं।

बच्चों में कैंसर के मुख्य प्रकार और इलाज छोड़ने (Treatment Abandonment) की कड़वी सच्चाई

वयस्कों और बच्चों के कैंसर में बुनियादी जैविक अंतर होता है। जहां वयस्कों में कैंसर का कारण अक्सर तंबाकू, शराब, प्रदूषण और जीवनशैली से जुड़ा होता है, वहीं बच्चों में यह मुख्यतः जेनेटिक म्यूटेशन (कोशिकाओं के डीएनए में अचानक होने वाले बदलाव) के कारण होता है। बच्चों में सबसे सामान्य रूप से एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL) देखा जाता है, जो समय पर इलाज मिलने पर 80 से 90 प्रतिशत मामलों में पूरी तरह ठीक हो सकता है। इसके अलावा हॉजकिन और नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा, विल्म्स ट्यूमर (गुर्दे का कैंसर), न्यूरोब्लास्टोमा और बोन कैंसर (ओस्टियोसारकोमा) बच्चों में प्रमुखता से पाए जाते हैं। हालांकि, भारतीय परिप्रेक्ष्य में सबसे दर्दनाक पहलू ‘ट्रीटमेंट अबेंडनमेंट’ यानी इलाज को बीच में ही छोड़ देना है। एक राष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, आर्थिक तंगी, अस्पताल तक बार-बार आने-जाने का भारी खर्च, रहने की जगह का न होना और लंबी कीमोथेरेपी प्रक्रिया से घबराकर लगभग 20 से 30 प्रतिशत गरीब परिवार अपने बच्चों का इलाज बीच में ही बंद कर देते हैं, जो उनकी असमय मृत्यु का प्रमुख कारण बनता है।

नीतिगत सुधार, आयुष्मान भारत और जिला स्तर पर ऑन्कोलॉजी सुविधाओं का विस्तार

विकसित देशों में बाल कैंसर से बचने की दर (Survival Rate) 85 प्रतिशत से भी अधिक है, जबकि भारत में यह औसत वर्तमान में लगभग 40 से 50 प्रतिशत के आसपास ही सिमट कर रह गया है। इस खाई को पाटने के लिए केंद्र सरकार की ‘आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ (AB-PMJAY) और राष्ट्रीय आरोग्य निधि (RAN) ने गरीब परिवारों को पांच लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज देकर एक बड़ी जीवनरेखा प्रदान की है। कई राज्य सरकारें भी अपनी विशेष स्वास्थ्य योजनाओं के जरिए कीमोथेरेपी की दवाएं मुफ्त उपलब्ध करा रही हैं। फिर भी, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का एक स्वर में कहना है कि जब तक देश के हर जिला अस्पताल में प्रशिक्षित पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट और बुनियादी कीमोथेरेपी डे-केयर सेंटर स्थापित नहीं किए जाएंगे, तब तक एम्स दिल्ली या कोलकाता जैसे महानगरों के अस्पतालों से भीड़ कम नहीं होगी और न ही उत्तर प्रदेश व बिहार के दूरदराज के गांवों में रहने वाले गरीब बच्चों को समय पर नया जीवन मिल सकेगा। बाल कैंसर लाइलाज नहीं है, बशर्ते सही समय पर सही जांच और निरंतर उपचार की सुविधा हर बच्चे की चौखट तक पहुंचाई जा सके।

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