
पाकिस्तान की सियासत में जब भी सैन्य हुकूमत और राजनीतिक नेतृत्व के बीच टकराव का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का मौजूदा संघर्ष सबसे अलग नजर आएगा। रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) की ताकत, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का सख्त रुख और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के तमाम कानूनी व प्रशासनिक हथकंडों के बावजूद इमरान खान का हौसला टूटता नहीं दिख रहा है। तोशाखाना, सिफर, अल-कादिर ट्रस्ट और 9 मई की हिंसा से जुड़े दर्जनों गंभीर मामलों में सजा और मुकदमों का सामना करने के बावजूद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक अडियाला जेल में अडिग हैं।
सवाल उठता है कि आखिर पाकिस्तान की सर्वशक्तिमान मानी जाने वाली सेना और सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी इमरान खान के इस सब्र और आक्रामकता की असली वजह क्या है?
1. अभूतपूर्व जनसमर्थन और युवाओं (Gen-Z) की अटूट वफादारी
इमरान खान की सबसे बड़ी ताकत पाकिस्तान की वह अवाम है, जो पारंपरिक राजनीतिक परिवारों (शरीफ और भुट्टो-जरदारी) के कथित भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर एक विकल्प की तलाश में थी। पाकिस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं का है। यह युवा पीढ़ी इमरान खान को सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बदलाव का प्रतीक मानती है।
फरवरी 2024 के आम चुनावों में पार्टी का चुनाव चिन्ह (बल्ला) छीने जाने, शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी और मीडिया पर अघोषित पाबंदी के बावजूद पीटीआई समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों का सबसे अधिक सीटें जीतना इस बात का ठोस सबूत था कि जनता का मूड किसके साथ है। इमरान जानते हैं कि जेल के बाहर जनता का एक विशाल वर्ग उनके साथ खड़ा है।
2. ‘विक्टिम कार्ड’ और एंटी-एस्टेब्लिशमेंट नैरेटिव का असर
पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार किसी नेता ने सेना के शीर्ष नेतृत्व को सीधे जनता की अदालत में कठघरे में खड़ा किया है। इमरान खान ने अपने समर्थकों के बीच यह संदेश स्थापित कर दिया है कि उनकी सत्ता किसी लोकतांत्रिक विफलता के कारण नहीं, बल्कि सेना और विदेशी ताकतों की कथित साजिश के चलते छीनी गई।
जब सेना ने उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसा, तो इससे उनके पक्ष में सहानुभूति की लहर और तेज हो गई। वे खुद को उस नायक के तौर पर पेश करने में कामयाब रहे हैं, जो व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और ‘अदृश्य ताकतों’ के खिलाफ कुर्बानी दे रहा है।
3. सेना के भीतर दरार और पंजाब की राजनीति में बदलाव
पारंपरिक रूप से पाकिस्तानी सेना का मुख्य भर्ती केंद्र और शक्ति का गढ़ पंजाब प्रांत रहा है। इतिहास में कभी भी पंजाबी अवाम ने सेना के खिलाफ मुखर आवाज नहीं उठाई थी, लेकिन इमरान खान ने इस समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया। लाहौर के कॉर्प्स कमांडर हाउस (जिन्ना हाउस) पर हुआ हमला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण था। इसके अलावा, सेना के भीतर सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों के परिवारों में इमरान खान के प्रति एक गुप्त सहानुभूति मानी जाती रही है। इस आंतरिक संतुलन के कारण इमरान को विश्वास है कि सैन्य प्रतिष्ठान उन पर कोई चरम कदम उठाने से पहले कई बार सोचेगा।
4. विदेशी दबाव और अंतरराष्ट्रीय डायस्पोरा का समर्थन
ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और खाड़ी देशों में रहने वाले ओवरसीज पाकिस्तानी (प्रवासी) इमरान खान के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक हैं। यह वर्ग न केवल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा भेजकर अहम योगदान देता है, बल्कि पश्चिमी देशों के सांसदों और मानवाधिकार संगठनों के जरिए मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के मुद्दे पर पाकिस्तानी सत्ता तंत्र पर लगातार कूटनीतिक दबाव बनाए रखता है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इमरान के कारावास को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
5. आत्मसमर्पण का मतलब राजनीतिक अंत
इमरान खान के अड़े रहने की एक बेहद व्यावहारिक और रणनीतिक वजह यह भी है कि वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे नवाज शरीफ की तरह सेना से कोई ‘गुप्त समझौता’ (डील) करके देश छोड़ते हैं या झुकते हैं, तो उनकी वह पूरी राजनीतिक पूंजी एक झटके में खत्म हो जाएगी, जिसे उन्होंने पिछले तीन दशकों में खड़ा किया है। पाकिस्तानी राजनीति में उनकी साख ही उनके ‘न झुकने वाले’ अड़ियल और जुझारू तेवर पर टिकी है। जेल में रहकर वे सरकार और सेना दोनों के लिए निरंतर राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का सिरदर्द बने हुए हैं।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया