मुलायम सिंह यादव ने छीना था राम आसरे कुशवाहा का राष्ट्रीय महासचिव पद; 13 साल बाद BJP छोड़ सपा में हुई ‘घर वापसी’

उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी चुनावी सरगर्मियों के बीच दलबदल का बड़ा दौर शुरू हो गया है। प्रदेश में 6 बार के पूर्व मंत्री और दिग्गज पिछड़े वर्ग के नेता प्रोफेसर राम आसरे कुशवाहा ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा झटका देते हुए समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया है। लखनऊ स्थित पार्टी मुख्यालय में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की मौजूदगी में उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। कभी समाजवादी पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी सिपहसालार रहे राम आसरे कुशवाहा की लगभग 13 साल बाद सपा में ‘घर वापसी’ हुई है। इस दौरान उन्होंने भावुक होकर कहा कि जहां सम्मान नहीं होता, वहां कुछ नहीं बचता, और जब तक अखिलेश यादव को दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बनाएंगे, तब तक वे चैन से घर नहीं बैठेंगे।

साल 2013 में क्यों छीना गया था राष्ट्रीय महासचिव और मंत्री पद?

राम आसरे कुशवाहा का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है:

  • मुलायम सिंह के आदेश पर बर्खास्तगी: अक्टूबर 2013 में जब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी, तब राम आसरे कुशवाहा सपा के ताकतवर राष्ट्रीय महासचिव पद पर आसीन थे। उसी दौरान मुजफ्फरनगर दंगों और पार्टी लाइन से इतर मीडिया में आई उनकी बयानबाजी को लेकर तत्कालीन सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की थी।

  • प्रो. रामगोपाल यादव ने जारी किया था फरमान: मुलायम सिंह यादव के सीधे निर्देश पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव ने एक आधिकारिक आदेश जारी कर उन्हें राष्ट्रीय महासचिव पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया था।

  • कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी छिना: इसके तुरंत बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें ‘सुदूर संवेदन उपयोग केंद्र’ (रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर) के अध्यक्ष पद से भी हटा दिया था, जो कैबिनेट मंत्री के समकक्ष पद था।

  • पार्टी से दूरी और भाजपा में शामिल होना: इस कार्रवाई और उपेक्षा के बाद कुशवाहा ने सपा से दूरी बना ली थी और बाद में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे।

सपा में वापसी के बाद क्या बोले राम आसरे कुशवाहा?

सपा मुख्यालय पर सदस्यता लेने के बाद उन्होंने अपने पुराने दिनों और स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव को याद किया:

  • नेताजी का आशीर्वाद: उन्होंने कहा, “मुझे आज भी ऐसा महसूस होता है कि हमारे बीच नेताजी (मुलायम सिंह यादव) उपस्थित हैं। अखिलेश यादव जी को भी वही कद और सम्मान मिलना चाहिए जो नेताजी को मिलता था।”

  • सम्मान की लड़ाई: उन्होंने बीजेपी छोड़ने की वजह साफ करते हुए कहा, “चाहे राजनीति हो, रिश्तेदारी हो या व्यापार; जहां सम्मान होगा वहीं कुछ मिलेगा। जहां सम्मान नहीं होगा, वहां कुछ नहीं बचता।”

  • कार्यकर्ताओं से संकल्प का आह्वान: उन्होंने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं से संकल्प लेने को कहा कि 2027 में अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए वे दिन-रात एक कर देंगे।

राजनीतिक मायने: सपा के ‘PDA’ फॉर्मूले को मिलेगी कितनी मजबूती?

उत्तर प्रदेश के चुनावी गणित के लिहाज से राम आसरे कुशवाहा की वापसी को काफी अहम माना जा रहा है:

  • कुशवाहा/मौर्य वोट बैंक: पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में कुशवाहा, मौर्य और शाक्य बिरादरी गैर-यादव ओबीसी (Non-Yadav OBC) वर्ग का एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक है।

  • सपा का ‘PDA’ समीकरण: अखिलेश यादव लगातार ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ (PDA) के नारे पर काम कर रहे हैं। भाजपा से एक पुराने कद्दावर नेता को अपने पाले में लाकर सपा इस गैर-यादव ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने का सीधा संदेश दे रही है।

  • भाजपा के लिए नुकसान: पश्चिमी और पूर्वांचल के कई जिलों में संगठनात्मक अनुभव रखने वाले 6 बार के पूर्व मंत्री का जाना जमीनी स्तर पर भाजपा के लिए एक झटका साबित हो सकता है।

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