
डिजिटल लेन-देन के प्रमुख माध्यम यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर किसी भी प्रकार के संभावित शुल्क या कर को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच देश का सियासी पारा गरमा गया है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आम जनता, छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और मध्यम वर्ग पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का हवाला देते हुए मायावती ने सरकार की नीतियों पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट साझा करते हुए बसपा प्रमुख ने दो टूक शब्दों में कहा कि पहले से ही कमरतोड़ महंगाई और विकराल बेरोजगारी की मार झेल रही देश की गरीब व मेहनतकश जनता की जेब पर नया डाका डालना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं है।
‘कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना दिखाकर जनता पर नया बोझ’, मायावती का हमला
मायावती ने अपने बयान में कहा कि केंद्र सरकार ने बड़े-बड़े दावों के साथ देश को डिजिटल इंडिया और कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर धकेला था। गरीब से गरीब मजदूर, छोटा व्यापारी और ग्रामीण इलाकों के लोग भी अब अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए यूपीआई का सहारा लेने लगे हैं। जब जनता ने इस व्यवस्था को पूरी तरह अपना लिया है, तब अचानक यूपीआई लेन-देन पर किसी भी तरह के टैक्स, सेस या अतिरिक्त चार्ज लगाने का विचार सामने आना सीधे तौर पर जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ है। उन्होंने कहा कि तकनीक को बढ़ावा देने के नाम पर अगर हर छोटे लेन-देन से वसूली का रास्ता तलाशा जाएगा, तो यह देश के कमजोर तबके के मुंह से निवाला छीनने जैसा होगा। सरकार को जनविरोधी फैसले लेने के बजाय जनता को वास्तविक राहत देने के उपाय सोचने चाहिए।
महंगाई और बेरोजगारी के दलदल में धंसता आम इंसान
बसपा सुप्रीमो ने केवल यूपीआई के मुद्दे तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने देश में लगातार पैर पसार रही महंगाई और युवाओं के सामने खड़ी बेरोजगारी की समस्या को लेकर भी सरकार को आड़े हाथों लिया। मायावती ने कहा कि आज देश का युवा रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। सरकारी नौकरियों के अवसर सिमटते जा रहे हैं और प्राइवेट सेक्टर में भी युवाओं का भविष्य असुरक्षित नजर आ रहा है। वहीं दूसरी तरफ, दाल, तेल, रसोई गैस, दूध और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के दाम आसमान छू रहे हैं। ऐसे संकट के दौर में जब सरकारों को जनता के हाथों में अतिरिक्त पैसे और क्रय शक्ति देनी चाहिए, तब उनकी बची-खुची बचत पर भी टैक्स की कैंची चलाने का प्रयास अत्यंत निंदनीय और क्रूर है।
छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों का क्या होगा?
मायावती ने विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र, खोमचे-ठेले लगाने वालों और छोटे दुकानदारों की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने रेखांकित किया कि नोटबंदी के बाद इन छोटे व्यवसायियों ने नकद की कमी से जूझते हुए डिजिटल क्यूआर कोड को अपनाया था। यदि यूपीआई पर टैक्स या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) जैसी वसूली का बोझ इन पर डाला गया, तो इनका छोटा-मोटा कारोबार पूरी तरह तबाह हो जाएगा या फिर वे वापस नकदी की ओर लौटने को विवश होंगे। मायावती ने आगाह किया कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इस छोटे तबके को दंडित करने की किसी भी नीति का नतीजा पूरे बाजार में मंदी के रूप में सामने आएगा।
सरकार तुरंत स्थिति स्पष्ट करे और जनता को राहत दे – बसपा प्रमुख की मांग
मायावती ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह यूपीआई लेन-देन पर किसी भी प्रकार के कर या अधिभार की संभावनाओं को पूरी तरह और स्पष्ट रूप से खारिज करे, ताकि आम जनता और व्यापारियों के भीतर फैला असमंजस और डर समाप्त हो सके। उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण पहले ही देश की बहुसंख्यक आबादी त्रस्त है, ऐसे में केवल कॉरपोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाने और राजस्व का घाटा गरीबों की जेब काटकर पूरा करने की प्रवृत्ति बंद होनी चाहिए। मायावती का यह कड़ा रुख ऐसे समय में सामने आया है जब विपक्षी दल भी डिजिटल लेन-देन पर किसी भी तरह के अतिरिक्त वित्तीय बोझ का लगातार विरोध कर रहे हैं।
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