
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों, जातियों के संतुलन और क्षेत्रीय गोलबंदी के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दशकों तक यह माना जाता रहा कि प्रदेश में सत्ता की दिशा तय करने में अगड़ी जातियां यानी सवर्ण वर्ग सबसे बड़ा प्रभाव डालता है। चुनावी पंडित अक्सर ब्राह्मण और क्षत्रिय गठजोड़ को जीत का प्रमुख फॉर्मूला मानते थे। जमीनी हकीकत और हालिया चुनावी आंकड़ों ने इस पारंपरिक सोच को पूरी तरह बदल दिया है। आज के राजनीतिक परिदृश्य में यह साफ नजर आ रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव सवर्ण मुद्दों पर नहीं, बल्कि दलितों के असल सवालों और उनकी राजनीतिक गोलबंदी पर लड़ा जाएगा। लखनऊ के सियासी गलियारों से लेकर बुंदेलखंड, पूर्वांचल, रुहेलखंड और पश्चिमी यूपी के गांवों तक दलित मतदाता इस समय चर्चा के केंद्र में हैं।
यूपी में दलित मतदाताओं की ताकत और 21 प्रतिशत का गणित
उत्तर प्रदेश में करीब 21 से 22 प्रतिशत दलित आबादी निवास करती है। यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से अधिकांश पर परिणाम पलटने की क्षमता रखती है। राज्य की 84 विधानसभा सीटें अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आरक्षित हैं। आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि जो भी दल आरक्षित सीटों पर बढ़त बनाता है, लखनऊ की गद्दी पर उसी का दावा सबसे मजबूत होता है। 2017 और 2022 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने इन आरक्षित सीटों पर भारी जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। 2024 के आम चुनावों के बाद जमीन पर जो बदलाव दिखे हैं, उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। दलित समाज केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य श्रेणी की 150 से अधिक सीटों पर 20 से 30 प्रतिशत की निर्णायक स्थिति में मौजूद है।
सवर्ण राजनीति की सीमाएं और दलित मुद्दों का उभार
दशकों तक मुख्यधारा का विमर्श यह रहा कि सवर्ण मतदाता जिस तरफ झुकता है, माहौल उसी के पक्ष में बनता है। अब चुनावी रणनीति के केंद्र में यह बात आ चुकी है कि सवर्ण वर्ग का वोट बैंक पहले से काफी हद तक वैचारिक रूप से बंधा हुआ है और संख्या बल के लिहाज से वह अकेले दम पर सत्ता नहीं दिला सकता। दूसरी तरफ, दलित समाज में पिछले कुछ वर्षों में जबरदस्त राजनीतिक चेतना आई है। आज दलित वोटर केवल प्रतीकों, मूर्तियों या नारों तक सीमित नहीं रहना चाहता। दलितों के बीच सबसे प्रमुख मुद्दे सामाजिक न्याय, संविधान और आरक्षण की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, भूमि पट्टे और सम्मानजनक जीवन के हैं। जब भी आरक्षण पर आंच आने या संविधान बदलने की बात उठती है, दलित वर्ग में एक तीखा ध्रुवीकरण देखने को मिलता है। इस वर्ग का यही तेवर राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा सबक साबित हो रहा है।
जाटव बनाम गैर-जाटव समीकरण का बदलता रूप
उत्तर प्रदेश के दलित समाज को रणनीतिक तौर पर दो बड़े हिस्सों में देखा जाता रहा है। एक तरफ जाटव समुदाय है, जो कुल दलित आबादी का आधे से अधिक हिस्सा है और पारंपरिक रूप से बहुजन समाज पार्टी का कोर वोटर माना जाता रहा है। दूसरी तरफ पासी, कोरी, धोबी, वाल्मीकि, खटीक और गोंड जैसी गैर-जाटव जातियां हैं। पिछले एक दशक में गैर-जाटव दलितों को अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी ने कल्याणकारी योजनाओं, मुफ्त राशन, पीएम आवास योजना और सामाजिक प्रतिनिधित्व का सहारा लिया। इसके दम पर बीजेपी ने गैर-जाटव मतों में बड़ी सेंध लगाई थी। वर्तमान समय में इस समीकरण में दरारें दिखने लगी हैं। पासी और कोरी समाज के बीच भी अपने स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई हलचल शुरू हो चुकी है। पूर्वांचल में पासी समाज का प्रभाव कई दर्जन सीटों पर नतीजों को एकतरफा मोड़ने की ताकत रखता है, जिससे राजनीतिक दलों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं।
मायावती, अखिलेश और बीजेपी की त्रिकोणीय जंग
बसपा सुप्रीमो मायावती का पारंपरिक कैडर आज भी प्रदेश के हर बूथ पर मौजूद है। भले ही चुनावी नतीजों में बसपा की सीटें घटी हों, लेकिन उसका 10 से 13 प्रतिशत का निष्ठावान वोट बैंक आज भी किसी का भी खेल बनाने या बिगाड़ने में सक्षम है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का जो दांव चला है, उसने दलितों के एक बड़े हिस्से को अपनी तरफ आकर्षित किया है। अखिलेश यादव लगातार दलित बस्तियों में पहुंच रहे हैं, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया के वैचारिक मिलन की बात कर रहे हैं। वहीं सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपने लाभार्थी वर्ग, संत रविदास और वाल्मीकि जैसे संतों के सम्मान और सरकारी योजनाओं के सीधे लाभ को आधार बनाकर दलितों को जोड़े रखने की भरसक कोशिश कर रही है। चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ जैसे युवा नेताओं के उभार ने पश्चिमी यूपी में युवाओं के बीच नए समीकरण खड़े कर दिए हैं, जो किसी भी स्थापित दल के लिए खतरे की घंटी है।
पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक क्षेत्रीय स्तर पर दलितों का प्रभाव
उत्तर प्रदेश का भौगोलिक विस्तार बहुत बड़ा है और हर क्षेत्र में दलित राजनीति का स्वरूप थोड़ा अलग दिखता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां जाटव और मुस्लिम समीकरण बेहद मजबूत स्थिति पैदा करते हैं, वहीं बुंदेलखंड में दलितों का झुकाव आर्थिक तंगी और जल संकट जैसे जमीनी मुद्दों से सीधे जुड़ा रहता है। अवध और मध्य यूपी के जिलों जैसे उन्नाव, रायबरेली, हरदोई और बाराबंकी में पासी समाज की आबादी चुनाव परिणामों को सीधे नियंत्रित करती है। पूर्वांचल के जिलों जैसे आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर और मऊ में दलित वोट बैंक का झुकाव जिस गठबंधन की ओर होता है, उसकी जीत का अंतर बहुत बड़ा हो जाता है। इस बार स्थानीय स्तर पर दलित मतदाता बेहद सतर्क हैं और किसी भी दल के परंपरागत प्रचार तंत्र के बहकावे में आने के बजाय स्थानीय उम्मीदवारों की छवि और उनके काम को प्राथमिकता दे रहे हैं।
क्या 2027 में दलित बनेंगे सबसे बड़े किंगमेकर?
आंकड़े और चुनावी जमीन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश का अगला सियासी संग्राम सवर्ण ध्रुवीकरण पर नहीं, बल्कि दलितों के समर्थन पर टिकेगा। सवर्णों के मुद्दे भावनात्मक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए जो ठोस संख्या बल चाहिए, वह दलितों के बिना संभव नहीं है। जिस तरह से संविधान, आरक्षण और रोजगार के मुद्दों ने दलित युवाओं को आंदोलित किया है, उसने यह साफ कर दिया है कि वे केवल मतदाता नहीं बल्कि चुनाव की दिशा तय करने वाले रणनीतिकार बन चुके हैं। जो भी पार्टी दलितों के मान-सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी को ठोस आश्वासन देगी, उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी उसी के हाथों में जाएगी।
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