
देश की सियासत का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अब सीधे दिल्ली दरबार से गति पकड़ने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 30 अक्टूबर को लखनऊ पहुंच सकते हैं। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ स्थित प्रदेश भाजपा मुख्यालय में राज्य कार्यसमिति और कोर ग्रुप की एक अति-महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित की गई है, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष, दोनों उपमुख्यमंत्री, प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह और पार्टी के वरिष्ठ रणनीतिकार शामिल होंगे।
लोकसभा चुनाव के बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह बैठक महज एक सामान्य संगठनात्मक चर्चा नहीं है, बल्कि इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा का पहला सबसे बड़ा रणनीतिक खाका माना जा रहा है। लखनऊ के सियासी गलियारों से लेकर काशी, गोरक्ष, अवध, ब्रज, पश्चिम और कानपुर-बुंदेलखंड के क्षेत्रीय कार्यालयों तक इस संभावित दौरे को लेकर हलचल तेज हो चुकी है।
2017 वाले फॉर्मूले की वापसी: बूथ अध्यक्षों और शक्ति केंद्र संयोजकों से सीधा संवाद
उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की चुनौती को भाजपा बेहद गंभीरता से ले रही है। रणनीतिकारों का मानना है कि चुनाव सिर्फ बड़े चेहरों या रैलियों के भरोसे नहीं, बल्कि मतदान केंद्र की आखिरी कतार यानी ‘पन्ना प्रमुख’ और ‘बूथ अध्यक्ष’ की मेहनत से जीता जाता है।
अमित शाह के आगामी दौरे का मुख्य एजेंडा 2017 के उस ऐतिहासिक बूथ प्रबंधन मॉडल को नए सिरे से जीवित करना है, जिसने विरोधी दलों के पारंपरिक किलों को ढहा दिया था:
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निचले स्तर से सीधा फीडबैक: बैठक में हाई-प्रोफाइल नेताओं की भाषणबाजी के बजाय प्रदेश के सभी 1918 मंडलों और शक्ति केंद्रों से आए जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को प्राथमिकता दी जाएगी।
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सत्तारोधी लहर और स्थानीय नाराजगी का आकलन: लगातार दो कार्यकालों के बाद कई मौजूदा विधायकों और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जनता में जो असंतोष पनप रहा है, उसकी खुफिया और संगठनात्मक रिपोर्ट गृह मंत्री की मेज पर रखी जाएगी।
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संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय: शासन की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने और कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान की चिंताओं को दूर करने के लिए मंत्रियों और संगठन प्रभारियों को स्पष्ट टास्क दिए जाएंगे।
टिकट वितरण के नए पैमाने: परफॉर्मेंस और सामाजिक समीकरण ही तय करेंगे उम्मीदवारी
भाजपा के शीर्ष रणनीतिकारों ने इस बार टिकटों के वितरण को लेकर अपनी नीति बिल्कुल सख्त कर ली है। कोर ग्रुप की बैठक में इस बात पर गहन मंथन होना तय है कि दो या उससे अधिक बार से जीत दर्ज कर रहे विधायकों की जमीनी पकड़ कैसी है। जिन क्षेत्रों में सत्ता विरोधी रुझान गहरा है, वहां नए और ऊर्जावान चेहरों को आगे लाने में पार्टी कोई हिचक नहीं दिखाएगी।
इसके अलावा, टिकट का आधार केवल सिफारिशें नहीं बल्कि सामाजिक और जातीय समीकरणों की वास्तविक स्वीकार्यता होगी। पार्टी का विशेष ध्यान उन 142 सीटों पर केंद्रित है जहां पिछले चुनावों में हार-जीत का अंतर बेहद मामूली रहा था या जहां विपक्ष का सामाजिक गठबंधन मजबूत नजर आया था। इन सीटों के लिए विशेष प्रभारियों और विस्तारकों की तैनाती की जा रही है, जो अगले एक साल तक केवल अपनी तय विधानसभा में रहकर मतदाताओं का मिजाज टटोलेंगे और हर पंद्रह दिन में केंद्रीय नेतृत्व को रिपोर्ट भेजेंगे।
सपा के ‘पीडीए’ चक्रव्यूह को भेदने के लिए भाजपा का ‘सर्व समाज’ काउंटर प्लान
समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी ‘पीडीए’ फॉर्मूले के सामने भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 43 अलग-अलग सामाजिक समुदायों तक सीधे पहुंचने के लिए ‘सर्व समाज’ महाअभियान का खाका खींचा है। लखनऊ की बैठक में अमित शाह इस सामाजिक संपर्क अभियान की रूपरेखा को अंतिम मंजूरी दे सकते हैं।
इस रणनीति के तहत गैर-यादव ओबीसी, अति-पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित समुदायों के बीच पार्टी अपनी पैठ को और मजबूत करेगी। केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं—जैसे मुफ्त राशन, पीएम आवास, किसान सम्मान निधि, आयुष्मान भारत और बुनियादी ढांचे के विकास—को घर-घर तक ले जाने के लिए हर जिले में सामाजिक चौपालों का आयोजन किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि लाभार्थियों का यह विशाल वर्ग जातिगत सीमाओं से परे जाकर भाजपा का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच साबित होगा।
नवंबर से शुरू होगा अमित शाह का सघन दौरा: पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक मथने की तैयारी
दीपावली और छठ महापर्व के बाद नवंबर के पहले हफ्ते से अमित शाह का उत्तर प्रदेश में सघन चुनावी दौरा शुरू होने की पूरी संभावना है। शुरुआत पूर्वांचल के केंद्र काशी और गोरक्ष क्षेत्र से होगी, जिसके बाद वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और बुंदेलखंड के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेत्रीय सम्मेलन करेंगे।
इन सम्मेलनों में हाई-प्रोफाइल नेताओं के बजाय शक्ति केंद्र संयोजकों, मंडल प्रभारियों और बूथ अध्यक्षों के साथ सीधे बंद कमरे में सत्र होंगे। शाह खुद हर क्षेत्र के जातीय समीकरण, विपक्ष के संभावित प्रत्याशियों की स्थिति और स्थानीय मुद्दों का ब्योरा लेंगे। दिल्ली और लखनऊ के बीच चुनावी समन्वय को पूरी तरह पटरी पर लाने के लिए यह बैठक उस लंबे चुनावी अभियान की शुरुआत होगी, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरों से पूरे प्रदेश का राजनीतिक तापमान एक नए मुकाम पर पहुंचना तय है।
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