
उत्तर प्रदेश में वित्तीय वर्ष के शुरुआती छह महीने और बजट पास हुए पांच महीने बीत जाने के बावजूद सरकारी विभागों द्वारा विकास कार्यों पर रकम खर्च करने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। राज्य के वित्तीय पोर्टल ‘कोषवाणी’ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026-27 के प्रस्तावित कुल 9.99 लाख करोड़ रुपये के बजट (मूल व अनुपूरक बजट मिलाकर) के सापेक्ष सितंबर तक महज 2.27 लाख करोड़ रुपये (22.78 प्रतिशत) ही खर्च हो पाए हैं। यह स्थिति तब सामने आई है जब अगले साल की शुरुआत में ही यूपी विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और जनवरी में चुनावी आचार संहिता लगने की पूरी संभावना है।
चुनाव से पहले परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की चुनौती
योगी सरकार ने फरवरी 2026 में 9.12 लाख करोड़ रुपये का मूल बजट पेश किया था, जिसके बाद अनुपूरक बजट लाकर कुल बजट का आकार 9.99 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया था। मुख्यमंत्री ने बजट पारित होने के बाद सभी मंत्रियों और विभागाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आगामी चुनावों के चलते योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कम समय मिलेगा, इसलिए नवंबर तक अधिकतम वित्तीय स्वीकृतियां जारी कर काम जमीन पर उतारे जाएं।
शुरुआती महीनों में विभागों ने तत्परता दिखाई, लेकिन जमीनी स्तर पर खर्च की रफ्तार बाद में धीमी पड़ गई। कोषवाणी के आंकड़ों के अनुसार, अब तक कुल बजट के सापेक्ष 4.46 लाख करोड़ रुपये (44.64%) की वित्तीय स्वीकृतियां जारी हो चुकी हैं। इन स्वीकृतियों के आधार पर विभागों को 3.40 लाख करोड़ रुपये आवंटित भी किए गए, लेकिन वास्तविक खर्च का आंकड़ा 2.27 लाख करोड़ रुपये पर ही अटका हुआ है।
कई विभागों का वास्तविक खर्च 10% से भी कम
बजट खर्च के आंकड़ों में सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति उन विभागों की है जिनका सीधा असर आम जनता और बुनियादी विकास से जुड़ा है। कई प्रमुख विभागों का वास्तविक खर्च 10 प्रतिशत के आंकड़े को भी पार नहीं कर सका है:
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नागरिक उड्डयन: 2.14%
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पर्यटन विभाग: 2.82%
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आपदा राहत: 3.03%
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जनजाति कल्याण: 4.48%
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नियोजन (Planning): 5.34%
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मत्स्य एवं राष्ट्रीय एकीकरण: 5.62%
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सामूहिक बीमा (वित्त विभाग): 6.59%
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स्टांप एवं पंजीकरण: 7.61%
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लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्साहन (वास्तविक कुल खर्च): 8.54%
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लोक निर्माण (भवन निर्माण मद): 9.18%
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विकलांग एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण: 9.38%
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पंचायतीराज विभाग: 9.76%
प्रमुख विभागों में बजट खर्च की स्थिति (प्रतिशत में)
प्रदेश के कुछ प्रमुख विभागों द्वारा सितंबर तक किए गए कुल बजट खर्च की स्थिति इस प्रकार है:
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बेसिक शिक्षा: 38.78%
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सहकारिता: 36.60%
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गृह (पुलिस): 33.12%
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ऊर्जा: 32.74%
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माध्यमिक शिक्षा: 32.14%
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खनन: 28.27%
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आवास: 27.86%
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आबकारी: 27.73%
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कृषि: 24.87%
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परिवहन: 20.40%
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खाद्य तथा रसद: 18.07%
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खेल: 17.67%
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चिकित्सा (सार्वजनिक स्वास्थ्य): 16.98%
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महिला एवं बाल कल्याण: 16.24%
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लोक निर्माण (सड़कें): 15.97%
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ग्राम्य विकास: 13.99%
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नगर विकास: 11.94%
आवंटित बजट के उपयोग में कुछ विभागों ने दिखाई तेजी
कुल बजट के सापेक्ष भले ही आंकड़ा सुस्त नजर आ रहा हो, लेकिन जिन विभागों को वित्तीय स्वीकृति के बाद रकम आवंटित की जा चुकी है, उनमें से कुछ का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। मसलन, हथकरघा उद्योग विभाग ने अपने आवंटित बजट का रिकॉर्ड 99.25% इस्तेमाल कर लिया है। इसी तरह आवास विभाग ने आवंटित राशि का 95% और लघु उद्योग एवं निर्यात प्रोत्साहन विभाग ने आवंटित फंड का 65.40% खर्च किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विभागों ने अक्टूबर और नवंबर में तेजी नहीं दिखाई, तो दिसंबर में आचार संहिता की आहट के बीच कई महत्वपूर्ण विकास योजनाएं और निर्माण कार्य अधर में लटक सकते हैं।
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