
सनातन धर्म में कार्तिक मास को सभी महीनों में सर्वश्रेष्ठ और श्रीहरि विष्णु की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को ‘रमा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों और पद्म पुराण के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला और चिंतामणि रत्न व कामधेनु गाय के समान साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना गया है। ‘रमा’ माता लक्ष्मी का ही एक नाम है, इसलिए इस पावन तिथि पर जगत के पालनहार भगवान विष्णु के साथ धन, वैभव और समृद्धि की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी की संयुक्त उपासना का विशेष विधान है। चातुर्मास के अंतिम चरण में पड़ने वाली यह एकादशी दीपदान, दान-पुण्य और आत्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है।
पौराणिक मान्यता: बड़े से बड़े पापों से मुक्ति और बैकुंठ धाम की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को रमा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा था कि जो मनुष्य निष्काम या सकाम भाव से इस व्रत का पालन करता है, उसे वाजपेय और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि यदि जाने-अनजाने में कोई घोर पाप या ब्रह्महत्या जैसा दोष भी लगा हो, तो श्रद्धापूर्वक रमा एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण करने से वह पाप भस्म हो जाता है। इस दिन भगवान केशव के ‘मुरलीधर’ और चतुर्भुज स्वरूप का पंचामृत, गंगाजल, पीले चंदन, कमल पुष्प और पीले वस्त्रों से अभिषेक किया जाता है। भगवान को लगाए जाने वाले भोग में तुलसी दल का होना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि बिना तुलसी दल के श्रीहरि कोई भी नैवेद्य स्वीकार नहीं करते।
व्रत एवं पूजन के आवश्यक नियम
रमा एकादशी का व्रत रखने वाले साधकों के लिए शास्त्रों में कुछ विशिष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं:
-
दशमी से ही संयम: एकादशी व्रत के नियमों की शुरुआत दशमी तिथि की शाम से ही हो जाती है। दशमी की सूर्यास्त के बाद सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए और तामसिक भोजन व चावल के सेवन से पूरी तरह परहेज रखना होता है।
-
अखंड ज्योति व विष्णु सहस्रनाम: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। दिनभर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का मानसिक जप और सायंकाल भगवान विष्णु के समक्ष घी का अखंड दीपक प्रज्वलित कर विष्णु सहस्रनाम व श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना अत्यंत शुभकारी माना गया है।
-
द्वादशी को पारण: एकादशी का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व हरि वासर बीत जाने के बाद ही किया जाता है। ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा देकर ही व्रती भोजन ग्रहण करते हैं।
अगले दिन ‘गोवत्स द्वादशी’ (बछबारस): गाय और बछड़े के पूजन से शुरू होगा दीपोत्सव
रमा एकादशी के ठीक अगले दिन यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को ‘गोवत्स द्वादशी’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे कई अंचलों में ‘बछबारस’ भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इसी दिन से पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व की औपचारिक धार्मिक शुरुआत मानी जाती है। सनातन संस्कृति में गाय को 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास और साक्षात कामधेनु का स्वरूप माना गया है। इस दिन सवत्सा गाय (दूध पीते बछड़े वाली गाय) की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं अपने पुत्र और परिवार की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और वंश वृद्धि की कामना के साथ यह व्रत रखती हैं।
गोवत्स द्वादशी की पूजन परंपरा: इस दिन क्यों नहीं खाया जाता गाय का दूध और कटा हुआ अन्न?
गोवत्स द्वादशी के दिन पूजन और खान-पान को लेकर एक अत्यंत कठोर और अनूठी परंपरा का पालन किया जाता है:
-
गाय के दूध और दुग्ध उत्पादों का त्याग: इस दिन गाय के दूध पर केवल उसके बछड़े का पहला अधिकार माना जाता है। इसलिए व्रती और परिवार के सदस्य इस दिन गाय का दूध, दही, मक्खन या घी का सेवन नहीं करते। इसके स्थान पर भैंस के दूध या वनस्पति पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
-
चाकू से कटी चीजों पर पाबंदी: इस पर्व पर किसी भी सब्जी, फल या अनाज को चाकू अथवा धारदार वस्तु से काटने की मनाही होती है।
-
अंकुरित अन्न का सेवन: भोजन में मुख्य रूप से अंकुरित मोठ, मूंग, चना, मक्का और बाजरे से बने बिना कटे सात्विक व्यंजनों का उपयोग किया जाता है।
सवेरे स्नान के बाद गाय और बछड़े को हल्दी, कुमकुम का तिलक लगाकर, पुष्पमाला पहनाकर तथा उनके खुरों की पूजा कर उन्हें भीगे हुए मोठ, बाजरा और गुड़ की रोटियां प्रेमपूर्वक खिलाई जाती हैं। मान्यता है कि कामधेनु स्वरूप गोमाता के पूजन से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया
