रमा एकादशी व्रत 4 या 5 नवंबर कब रखना शास्त्रसम्मत? 4 नवंबर को सुबह 11:03 बजे से लगेगी तिथि

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अधिष्ठात्री रमा एकादशी का सनातन धर्म में असाधारण आध्यात्मिक महत्व है। इस वर्ष कार्तिक कृष्ण एकादशी की तिथि के आरंभ समय को लेकर श्रद्धालुओं और व्रतियों के बीच असमंजस की स्थिति बन गई है। पंचांगीय गणना के अनुसार एकादशी तिथि का आरंभ 4 नवंबर को पूर्वाह्न 11 बजकर 03 मिनट पर हो रहा है, जो अगले दिन यानी 5 नवंबर को दोपहर 01 बजकर 18 मिनट तक प्रभावी रहेगी। ऐसे में कई साधकों के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठ रहा है कि व्रत का संकल्प 4 नवंबर (बुधवार) को लिया जाए अथवा 5 नवंबर (गुरुवार) को। धर्मशास्त्रों, स्मृति ग्रंथों और पंचांग परंपरा के अनुसार तिथियों के निर्णय का एक सुनिश्चित विधान है, जिसके आधार पर उदयातिथि और तिथि के वेध का सूक्ष्म विश्लेषण कर व्रत का दिन निर्धारित किया जाता है।

धर्मशास्त्रों की व्यवस्था: 4 नवंबर को दशमी-विद्धा दोष, क्यों वर्जित है व्रत?

नारद पुराण, स्कंद पुराण और हेमाद्रि जैसे प्रामाणिक धर्मग्रंथों में एकादशी के दो मुख्य भेद बताए गए हैं—विद्धा एकादशी और शुद्धा एकादशी। जब सूर्योदय के समय दशमी तिथि मौजूद हो और उसके बाद सूर्योदय के दो मुहूर्त (लगभग चार घटी या 1 घंटा 36 मिनट) बीतने के पश्चात एकादशी तिथि लगे, तो उसे ‘दशमी-विद्धा एकादशी’ कहा जाता है। पद्म पुराण में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि दशमी युक्त एकादशी का उपवास करने से पुण्य फल नष्ट हो जाता है और साधक को दोष लगता है। चूंकि 4 नवंबर को सूर्योदय प्रातः कालीन दशमी तिथि में होगा और एकादशी दोपहर पूर्व 11:03 बजे शुरू होगी, इसलिए 4 नवंबर की एकादशी पूर्णतः दशमी-विद्धा मानी जाएगी। शास्त्रों में गृहस्थ और सन्यासी दोनों के लिए ही दशमी-विद्धा एकादशी का उपवास सर्वथा त्याज्य बताया गया है।

5 नवंबर को उदयातिथि और द्वादशी का पावन संयोग: व्रत रखना क्यों है सर्वोत्तम?

सनातन धर्म का सर्वमान्य नियम है कि किसी भी व्रत-उत्सव में सूर्योदयव्यापिनी यानी ‘उदयातिथि’ को ही प्रधानता दी जाती है। 5 नवंबर को जब भगवान भास्कर का उदय होगा, उस समय आकाश मंडल में एकादशी तिथि पूर्ण रूप से विद्यमान रहेगी। भले ही एकादशी तिथि दोपहर 01:18 बजे समाप्त होकर द्वादशी तिथि में प्रवेश कर जाए, किंतु सूर्योदय कालीन तिथि होने के कारण 5 नवंबर को ही ‘शुद्धा एकादशी’ का महासंयोग बनेगा। इसे ज्योतिष शास्त्र में ‘द्वादशी-युक्ता एकादशी’ भी कहा जाता है। पद्म पुराण और गरुड़ पुराण के अनुसार द्वादशी से युक्त एकादशी का व्रत कोटि-कोटि यज्ञों का फल प्रदान करने वाला माना गया है। इसके अतिरिक्त 5 नवंबर को गुरुवार का दिन होने के कारण एकादशी के अधिपति श्रीहरि विष्णु का दिन स्वयं इस तिथि से जुड़ रहा है, जिससे इस व्रत का माहात्म्य और फल कई गुना बढ़ जाता है।

स्मार्त और वैष्णव परंपरा के अनुसार निर्णय का आधार

व्रत व्यवस्था में स्मार्त (सामान्य गृहस्थ परिवार) और वैष्णव (दीक्षित साधु-संत) संप्रदायों के नियमों में कई बार सूक्ष्म भेद होता है, किंतु रमा एकादशी के इस संयोग में दोनों ही परंपराएं 5 नवंबर को ही व्रत रखने की संस्तुति करती हैं। जहां गृहस्थ जन उदयातिथि की शुद्धता और दशमी के वेध से मुक्ति को प्राथमिकता देते हैं, वहीं वैष्णव परंपरा सदैव ‘अरुणोदय वेध’ से रहित द्वादशी-युक्ता तिथि को ही अंगीकार करती है। 4 नवंबर को उपवास रखने पर एकादशी का आधा भाग दशमी के संसर्ग में चला जाएगा, जो धर्मशास्त्रीय दृष्टि से अशुद्ध माना जाता है। अतः स्मार्त मतानुयायी हों या वैष्णव साधक, सभी के लिए 5 नवंबर (गुरुवार) को उपवास रखना ही पूर्ण फलदायी, शास्त्रसम्मत और निर्विवाद रूप से श्रेयस्कर है।

रमा एकादशी व्रत की संपूर्ण पूजा विधि और संकल्प नियम

रमा एकादशी का व्रत रखने वाले साधकों को दशमी तिथि की संध्या से ही नियमों का पालन करना होता है। 4 नवंबर की शाम को सूर्यास्त के बाद सात्विक और अल्पाहार लेना चाहिए तथा चावल, मसूर की दाल और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए। 5 नवंबर को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात तांबे के पात्र में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य दें। पूजा स्थान पर भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें पंचामृत से स्नान कराएं। तत्पश्चात पीले चंदन, अक्षत, पीले गेंदे के पुष्प, तुलसी दल और मौसमी फल अर्पित करें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र का 108 बार जप करें तथा विष्णु सहस्रनाम और श्रीमद्भगवद्गीता के एकादश अध्याय का पाठ करें। सायंकाल तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर परिक्रमा करें।

व्रत पारण का शुभ समय: 6 नवंबर को कब खोलें व्रत?

एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण नियत समय और शास्त्रसम्मत मुहूर्त में किया जाए। एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व और ‘हरि वासर’ बीत जाने के बाद ही पारण का विधान है। 5 नवंबर को उपवास रखने के उपरांत व्रत का पारण 6 नवंबर (शुक्रवार) को प्रातःकाल किया जाएगा। 6 नवंबर को द्वादशी तिथि दोपहर तक रहेगी, अतः प्रातः 06 बजकर 38 मिनट से लेकर प्रातः 08 बजकर 50 मिनट के मध्य पारण करना अत्यंत श्रेष्ठ रहेगा। पारण के समय सर्वप्रथम किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र, ऋतुफल और सामर्थ्यानुसार दक्षिणा का दान करें। इसके पश्चात स्वयं भगवान विष्णु के चरणामृत और तुलसी दल को मुख में रखकर सात्विक भोजन ग्रहण करते हुए व्रत का समापन करें। नियमानुसार किया गया यह पारण साधक के समस्त पापों का शमन कर जीवन में ऐश्वर्य और शांति की प्रतिष्ठा करता है।

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