रावण के दरबार में पहुंचते ही क्यों दंग रह गए थे पवनपुत्र हनुमान? सोने की लंका में दिखा था ऐसा हैरतअंगेज नजारा

रामायण के सुंदरकांड का प्रसंग जब भी सामने आता है, तो पवनपुत्र हनुमान की वीरता, वाकपटुता और पराक्रम की गाथाएं रोंगटे खड़े कर देती हैं। माता सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका को तहस-नहस किया और अक्षय कुमार का वध कर दिया, तब मेघनाद ने उन्हें ब्रह्मपाश में बांधकर लंकाधिपति रावण के दरबार में पेश किया। ब्रह्मदेव के अस्त्र का मान रखने के लिए स्वयं बंदी बनकर रावण की राजसभा में पहुंचे हनुमान जी जब पहली बार दशानन के आमने-सामने आए, तो वहां का अलौकिक नजारा और रावण का रूप देखकर एक पल के लिए हक्के-बक्के रह गए थे। एक वानर दूत के रूप में पहुंचे हनुमान जी कोई साधारण दृष्टा नहीं थे, वे स्वयं परम ज्ञानी और अष्ट सिद्धियों के ज्ञाता थे, फिर भी रावण के राजदरबार में उन्होंने जो देखा, उसने उन्हें भीतर तक चौंका दिया था।

रावण का अद्वितीय तेज और राजदरबार का अकल्पनीय वैभव

हनुमान जी के आश्चर्यचकित होने का पहला और सबसे प्रमुख कारण रावण का अप्रतिम शारीरिक तेज और राजसभा का अलौकिक ऐश्वर्य था। महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास दोनों ने ही इस क्षण का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। रावण केवल एक क्रूर असुर नहीं था, बल्कि वह चारों वेदों का प्रकांड ज्ञाता, परम तपस्वी और अद्वितीय शिवभक्त भी था। उसके मुखमंडल पर कठोर तपस्या से अर्जित दिव्य कांति और सूर्य जैसा प्रचंड तेज धधक रहा था। उसके दस सिर, बीस भुजाएं, मणियों से जड़े स्वर्ण मुकुट और रत्नों से सुसज्जित सिंहासन की चमक इतनी तीव्र थी कि किसी भी साधारण व्यक्ति की आंखें चौंधिया जाएं। रावण के दरबार में साक्षात दिशाओं के स्वामी, दिग्गज और नवग्रह भय से हाथ जोड़े खड़े रहते थे। रावण के व्यक्तित्व में क्रूरता के साथ-साथ जो राजसी गरिमा और शक्ति का अपार संकेंद्रण था, उसे देखकर हनुमान जी मन ही मन उसकी सामर्थ्य की प्रशंसा किए बिना न रह सके।

‘अहो रूपमहो धैर्यम…’ रावण को देखकर क्या सोचा था पवनपुत्र ने?

वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में उल्लेख आता है कि रावण को देखकर हनुमान जी ने मन ही मन विचार किया था—’अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः। अहो सर्वगुणसम्पन्नो रक्षोराजो महाबलः॥’ अर्थात् कितना अद्भुत रूप है, कैसा अगाध धैर्य है, कैसी अपार शक्ति है और कैसा दिव्य तेज है। इस राक्षसराज में चक्रवर्ती सम्राट बनने के समस्त उत्तम गुण विद्यमान हैं। हनुमान जी रावण की विद्वता, शासन व्यवस्था और कला-पारंगतता से भली-भांति परिचित थे, लेकिन आमने-सामने उसकी आभा देखकर वे दंग थे। उन्हें इस बात पर गहरा विस्मय हुआ कि जिस व्यक्ति को ईश्वर ने ज्ञान, रूप, बल और असीमित ऐश्वर्य का ऐसा दुर्लभ वरदान दिया था, वह अपने अहं और अधर्म के कारण विनाश के दलदल में उतर चुका था।

ज्ञान और तेज के बावजूद धर्महीनता पर हनुमान जी को हुआ था गहरा अफसोस

हनुमान जी के आश्चर्य के पीछे केवल चकाचौंध नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक दुख भी छिपा था। रावण को देखते हुए हनुमान जी ने अगला विचार यह किया कि यदि इस राजा के भीतर अधर्म, परस्त्री हरण और अहंकार का घोर पाप न होता, तो यह तीनों लोकों का रक्षक और देवराज इंद्र से भी श्रेष्ठ सिद्ध हो सकता था। जिस लंका की सुरक्षा को परिंदा भी नहीं भेद सकता था, वहां का अधिपति नीति और मर्यादा को त्यागकर केवल अपने सर्वनाश को आमंत्रित कर रहा था। हनुमान जी को इस बात का आश्चर्य था कि जो व्यक्ति शिव तांडव स्तोत्र जैसी कालजयी रचना कर सकता था, वेदों की ऋचाओं का व्याख्याता था, उसकी मति पर एक ही अवगुण ने ऐसा पर्दा डाल दिया था कि उसे अपने कुल और स्वर्णनगरी का महाविनाश साक्षात सामने खड़ा भी नजर नहीं आ रहा था।

सभासदों का भय और रावण का वह दंभी अहंकार

दरबार का वातावरण भी हनुमान जी को हैरान कर देने वाला था। रावण के दरबार में मंत्री, सेनापति और नीतिवान दरबारी मौजूद थे, लेकिन रावण के क्रोध के आगे किसी का सत्य बोलने का साहस नहीं था। विभीषण को छोड़कर पूरी राजसभा मौन और भयभीत नजर आ रही थी। रावण के अहंकार का यह आलम था कि उसने एक दूत के साथ मर्यादापूर्वक संवाद करने के बजाय उसे तुच्छ वानर समझकर अपमानित करने का प्रयास किया। हनुमान जी ने उसी क्षण भांप लिया था कि इस अगाध संपत्ति, दिव्य तेज और अपार सैन्य बल का पतन अब निश्चित है, क्योंकि जहां अधर्म की नींव हो और सत्य कहने वाले सलाहकार भय के कारण मौन हो जाएं, उस साम्राज्य को नष्ट होने से साक्षात विधाता भी नहीं बचा सकते। यही वह दृश्य और आत्मचिंतन था, जिसने हनुमान जी को रावण के सम्मुख एक क्षण के लिए स्तब्ध कर दिया था।

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