
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति और मीडिया की सुर्खियों के केंद्र में आ गए हैं। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक खोजी रिपोर्ट के बाद निर्वाचन सदन के भीतर नीतिगत फैसलों को लेकर गहरी दरार उजागर हुई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और अन्य प्रशासनिक मामलों में साथी चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा दर्ज कराई गई औपचारिक व लिखित आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कई महत्वपूर्ण फैसले एकतरफा ढंग से लागू किए। इस खुलासे के सामने आते ही विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर निष्पक्षता और संस्थागत स्वायत्तता से समझौता करने का सीधा आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया है।
खरगे और राहुल गांधी के नेतृत्व में सांसदों का संसद से सड़क तक मार्च
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ने सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अगुवाई में मंगलवार को संसद परिसर से निर्वाचन सदन की ओर एक विशाल विरोध मार्च निकाला गया। इस प्रदर्शन में विपक्षी दलों के दर्जनों सांसदों ने हिस्सा लिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से तुरंत हटाने की मांग उठाई। सुरक्षा बलों द्वारा रोके जाने के बाद सांसदों ने सड़क पर ही धरना शुरू कर दिया। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता संकट में है और यदि शीर्ष स्तर पर आयुक्तों की असहमति को दबाकर फैसले लिए जा रहे हैं, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए गंभीर चेतावनी है। इस देशव्यापी सियासी उबाल के बीच आम जनता में यह जानने की भारी उत्सुकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का पद कितना ताकतवर होता है, उन्हें क्या वित्तीय सुविधाएं मिलती हैं और उनका प्रशासनिक इतिहास क्या रहा है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की सैलरी और मासिक भत्तों का पूरा गणित
संवैधानिक प्रावधानों और नए कानूनी ढांचे के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम 2023 के तहत सीईसी का वेतनमान भारत सरकार के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी यानी कैबिनेट सचिव (Cabinet Secretary) के वेतन के बराबर तय किया गया है। इसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को प्रतिमाह ₹2,50,000 (दो लाख पचास हजार रुपये) का बेसिक वेतन प्राप्त होता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 में हुए संशोधन से पहले 1991 के मूल कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त का वेतन और सेवा शर्तें सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज के बराबर रखी गई थीं, जिसे बाद में संशोधित कर कैबिनेट सेक्रेटरी के समकक्ष किया गया।
मूल वेतन के अतिरिक्त मुख्य चुनाव आयुक्त को हर महीने ₹34,000 का सत्कार भत्ता (Sumptuary Allowance) भी प्रदान किया जाता है। एक अनुकरणीय पहल के रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों ने इस सत्कार भत्ते पर मिलने वाली आयकर छूट को स्वेच्छा से छोड़ रखा है, यानी वे इस भत्ते पर नियमानुसार पूरा टैक्स अदा करते हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर संशोधित होने वाला महंगाई भत्ता (DA) भी वेतन के साथ जुड़ता है।
सरकारी बंगला, जेड सुरक्षा और सेवानिवृत्ति तक मिलने वाली शाही सुविधाएं
देश के शीर्ष संवैधानिक पदों में शामिल होने के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त को कई विशिष्ट प्रोटोकॉल और सरकारी सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। ज्ञानेश कुमार को लुटियंस दिल्ली में टाइप-8 श्रेणी का भव्य सरकारी आवास आवंटित है, जिसके रखरखाव, बिजली, पानी और ब्रॉडबैंड-टेलीफोन का खर्च सरकार वहन करती है। आधिकारिक आवागमन के लिए उन्हें चौबीसों घंटे ड्राइवर के साथ आधुनिक लग्जरी बुलेटप्रूफ या प्रशासनिक सरकारी वाहन उपलब्ध कराया जाता है। उनकी सुरक्षा के लिए विशेष सुरक्षा कमांडो और पुलिस का कड़ा सुरक्षा घेरा तैनात रहता है।
इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त, उनकी पत्नी और आश्रित पारिवारिक सदस्यों को वर्ष में तय नियमों के अनुसार लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC) के तहत मुफ्त हवाई और रेल यात्रा की सुविधा मिलती है। केंद्रीय स्वास्थ्य योजना (CGHS) के तहत परिवार को देश के किसी भी शीर्ष अस्पताल में असीमित और निःशुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त होती है। पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी जीवन भर पेंशन, पारिवारिक पेंशन, आजीवन ड्राइवर, घरेलू सहायक भत्ता और नियमित चिकित्सा सुरक्षा का कानूनी अधिकार मिलता है।
IIT कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग, हार्वर्ड से पढ़ाई और 1988 बैच के IAS
ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर बेहद शानदार और बहुआयामी रहा है। वे मूल रूप से 1988 बैच के केरल कैडर के वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी अत्यंत विशिष्ट रही है; उन्होंने देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की विश्वप्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र (Economics) में स्नातकोत्तर की उच्च शिक्षा पूरी की।
चार दशकों तक भारतीय नौकरशाही के शीर्ष पदों पर काम करने वाले ज्ञानेश कुमार ने केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घटनाओं में सीधी भूमिका निभाई है। यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2007 से 2012 के बीच वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव (रक्षा उत्पादन) के महत्वपूर्ण पद पर तैनात रहे, जहां उन्होंने कई प्रमुख रक्षा सौदों और स्वदेशीकरण परियोजनाओं की निगरानी की थी।
अनुच्छेद 370 और अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट निर्माण में निभाई थी केंद्रीय भूमिका
नरेंद्र मोदी सरकार के दोनों कार्यकालों में ज्ञानेश कुमार केंद्रीय गृह मंत्रालय के सबसे भरोसेमंद और कद्दावर अधिकारियों में गिने जाते रहे। अगस्त 2019 में जब केंद्र सरकार ने संसद में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था, तब ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय में कश्मीर डिवीजन के संयुक्त सचिव के पद पर तैनात थे। इस संवेदनशील और जटिल संवैधानिक प्रक्रिया के ड्राफ्टिंग और सुरक्षा समन्वय में उनकी केंद्रीय भूमिका रही थी।
इसके ठीक बाद वर्ष 2020 में गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव (Additional Secretary) के रूप में पदोन्नत होने पर उन्हें अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के क्रियान्वयन का जिम्मा सौंपा गया। अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के गठन की कानूनी रूपरेखा और दस्तावेजों को अंतिम रूप देने वाले विभाग का नेतृत्व उन्होंने ही किया था। इसके बाद वे सहकारिता मंत्रालय के पहले सचिव और संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव के पद पर रहे। सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचने पर मार्च 2024 में उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया और फरवरी 2025 में राजीव कुमार के सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला।
परिवार में स्वतंत्रता सेनानी की विरासत और IAS-IRS अफसरों की नई पीढ़ी
ज्ञानेश कुमार की पारिवारिक पृष्ठभूमि देशसेवा और उच्च प्रशासनिक उपलब्धियों से भरी रही है। उनके दादा देश के स्वतंत्रता सेनानी और एक प्रख्यात कॉलेज प्रिंसिपल थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में योगदान दिया था, जबकि उनके पिता एक सम्मानित चिकित्सक थे। प्रशासनिक सेवा की यह परंपरा ज्ञानेश कुमार की नई पीढ़ी में और अधिक मजबूती से आगे बढ़ी है।
उनकी बड़ी बेटी मेधा रूपम उत्तर प्रदेश कैडर की 2014 बैच की चर्चित आईएएस अधिकारी हैं और कई जिलों में जिलाधिकारी (DM) के रूप में सेवाएं दे चुकी हैं। मेधा रूपम के पति मनीष बंसल भी 2014 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। वहीं ज्ञानेश कुमार की छोटी बेटी अभिश्री भारतीय राजस्व सेवा (IRS) की अधिकारी हैं, जबकि उनके दामाद अक्षय लबरू 2017 बैच के आईएएस अधिकारी हैं, जो वर्तमान में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर सेवाएं दे रहे हैं। इस प्रकार उनका पूरा परिवार भारतीय नौकरशाही और नीति-निर्माण के केंद्र में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
क्या सांसदों-विधायकों की तरह CEC को भी अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी होती है?
राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर भी कानूनी बहस छिड़ी हुई है कि जिस तरह देश के हर सांसद, विधायक और चुनावी उम्मीदवार को नामांकन पत्र भरते समय अपनी पाई-पाई का हिसाब जनता के सामने सार्वजनिक करना पड़ता है, क्या वही नियम मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी लागू होता है? इसका सीधा और स्पष्ट जवाब है—नहीं।
जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 और सुप्रीम कोर्ट के एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) मामले में दिए गए फैसलों के तहत जनता के वोटों से चुने जाने वाले नेताओं को फॉर्म-26 एफिडेविट के जरिए अपनी, पत्नी और बच्चों की चल-अचल संपत्ति, बैंक बैलेंस, शेयर निवेश और कर्जों का ब्योरा चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सार्वजनिक करना अनिवार्य होता है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संस्था के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। वर्तमान भारतीय कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्तों के लिए अपनी नेटवर्थ को पब्लिक डोमेन में जारी करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
आरटीआई में संपत्ति मांगने पर DoPT ने निजी जानकारी बताकर किया इनकार
ज्ञानेश कुमार की कुल संपत्ति या निजी नेटवर्थ का कोई भी सार्वजनिक दस्तावेज इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है। हालांकि, अखिल भारतीय सेवा नियमों (AIS Conduct Rules) के तहत हर आईएएस अधिकारी को हर साल अपनी अचल संपत्ति का वार्षिक विवरण (Immovable Property Return – IPR) गोपनीय रूप से सरकार के पास जमा करना होता है।
इसी आधार पर इस साल अप्रैल महीने में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के तत्कालीन राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) में एक औपचारिक आरटीआई (RTI) आवेदन दाखिल किया था। इस अर्जी में उन्होंने ज्ञानेश कुमार द्वारा साल 2015 से 2023 तक दाखिल किए गए अचल संपत्ति रिटर्न की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। हालांकि, केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग ने इस जानकारी को सार्वजनिक करने से साफ इनकार कर दिया। विभाग ने अपने जवाब में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) का हवाला दिया, जिसके तहत किसी भी लोकसेवक की व्यक्तिगत जानकारी (Personal Information) को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें कोई बड़ा व्यापक जनहित साबित न होता हो।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर और भविष्य के राजनीतिक समीकरण
वर्तमान में ज्ञानेश कुमार पर केवल विपक्षी सांसदों के धरने और चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेद का ही दबाव नहीं है, बल्कि कई पुराने मामलों की फाइलें भी दोबारा खुल रही हैं। केरल सरकार ने वर्ष 2006 के विश्व बैंक वित्तपोषित सड़क परियोजना (KSTP) में मलेशियन इंजीनियर की आत्महत्या और कथित वित्तीय गड़बड़ियों के पुराने मामले में विजिलेंस जांच के आदेश दिए हैं। वहीं, मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर भी अदालत ने तीखी टिप्पणियां करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है और चेताया है कि यदि प्रक्रिया में अनियमितता पाई गई तो लिए गए फैसलों को पलटा भी जा सकता है। आम आदमी पार्टी सहित कई विपक्षी नेताओं के दावों और अफवाहों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त के अगले कदम और आयोग की आगामी निष्पक्षता पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
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