
शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी जब ब्रज की पावन भूमि पर उतरती है, तो मथुरा-वृंदावन का कण-कण एक अनिर्वचनीय आनंद में डूब जाता है। आश्विन मास की यह पूर्णिमा केवल वर्ष की सबसे उजली रात ही नहीं है, बल्कि यह वह परम पावन तिथि है जब स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रेम, भक्ति और अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर ‘महारास’ की रचना की थी। मान्यता है कि इसी महारास की रात्रि में पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य बांसुरी की तान पर 16 हजार 108 गोपियों की सदियों पुरानी साधना को एक साथ फलित किया था। ब्रज के वनों में, विशेष रूप से यमुना तट पर वंशीवट और निधिवन की कुंज गलियों में, उस रात समय की गति थम गई थी और चारों लोकों के देवी-देवता इस अद्भुत दृश्य को अपलक निहारने के लिए आकाश मार्ग में ठहर गए थे।
महारास का आध्यात्मिक रहस्य और 16 हजार 108 गोपियों का दिव्य मिलन
साधारण लौकिक दृष्टि से देखने वालों को महारास एक सांसारिक नृत्य प्रतीत हो सकता है, परंतु श्रीमद्भागवत महापुराण और गर्ग संहिता के गूढ़ रहस्यों के अनुसार यह जीवात्मा का परमात्मा से परमोच्च आध्यात्मिक मिलन है। वेदों की ऋचाएं, जो युगों-युगों से परब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए तपस्यारत थीं, द्वापर युग में गोपियों के रूप में अवतरित हुईं। जब कान्हा ने यमुना तट पर अपनी वंशी का पंचम सुर छेड़ा, तो संपूर्ण ब्रजमंडल उस दिव्य सम्मोहन में खिंचा चला आया। उस रात श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से एक साथ 16 हजार 108 रूप धारण किए। हर गोपी को यही अनुभव हुआ कि घनश्याम केवल उसी के साथ नृत्य कर रहे हैं, उसी के हाथों में हाथ डाले दिव्य प्रेम की रसगंगा बहा रहे हैं। यह एक ऐसा आध्यात्मिक ऐक्य था जहां अहं का पूर्ण विसर्जन हो चुका था और केवल शुद्ध भक्ति का प्रवाह शेष था।
जब त्रिलोकीनाथ शिव को धारण करना पड़ा गोपी रूप
इस महारास का आकर्षण इतना प्रचंड और दिव्य था कि कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ देवाधिदेव महादेव की समाधि भी वंशी की मधुर तान से टूट गई। भगवान शिव इस अलौकिक आनंद का साक्षी बनने के लिए तुरंत कैलाश से वृंदावन की ओर चल पड़े। परंतु जब वे रासमंडल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे, तो वहां पहरा दे रहीं ललिता और विशाखा सखियों ने उन्हें रोक दिया। गोपियों ने स्पष्ट कहा कि महारास में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कोई अन्य पुरुष प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि इस मंडल में केवल एक ही परम भोक्ता पुरुष हैं और शेष सभी आत्माएं प्रकृति स्वरूप गोपी हैं। यह सुनकर आशुतोष शिव व्याकुल हो उठे। महारास के रस में डूबने की उनकी लालसा इतनी प्रगाढ़ थी कि उन्होंने तनिक भी संकोच नहीं किया और यमुना महारानी के पास पहुंचे।
मान सरोवर में स्नान और ‘गोपीश्वर महादेव’ का प्राकट्य
माता यमुना के निर्देश पर भगवान शिव ने वृंदावन स्थित पवित्र मान सरोवर में डुबकी लगाई। जैसे ही वे जल से बाहर निकले, उनका स्वरूप पूर्णतः नारी रूप में परिवर्तित हो चुका था। सोलह शृंगार, नथुनी, कंगन, लहंगा और चुनरी ओढ़े देवाधिदेव पूरी तरह एक सुंदर ब्रज गोपी बन चुके थे। सखियों ने उन्हें रासमंडल में प्रवेश दे दिया और वे मंद-मंद मुस्कान के साथ महारास के आनंद में झूमने लगे। यद्यपि शिवजी ने अपने रूप को भली-भांति छिपाया था, परंतु अंतर्यामी श्रीकृष्ण से अपने आराध्य का यह स्वरूप भला कैसे छिपता। कन्हैया मुस्कुराते हुए उनके समीप आए और हाथ जोड़कर बोले, “पधारिए, गोपीश्वर महादेव!” श्रीकृष्ण के इन शब्दों के साथ ही सारा रहस्य उजागर हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं उस दिन शिवजी का वंदन किया और वरदान दिया कि वृंदावन की इस पावन धरा पर उनके इस गोपी स्वरूप की पूजा युगों-युगों तक होगी। आज भी वृंदावन में ‘गोपीश्वर महादेव’ का वह प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जहां दिन के समय भगवान शिव का शिवलिंग रूप में अभिषेक होता है और संध्या काल में उन्हें एक भव्य गोपी के रूप में अलंकृत किया जाता है।
काल चक्र का ठहर जाना और ब्रह्म रात्रि का विस्तार
पौराणिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि महारास की यह रात कोई साधारण रात नहीं थी। कामदेव ने श्रीकृष्ण को चुनौती दी थी कि वे संसार के प्रत्येक प्राणी को अपनी वासना के पाश में बांध सकते हैं। तब श्रीकृष्ण ने कामदेव के उस अहंकार को चूर करने के लिए शरद पूर्णिमा की चांदनी चुनी। पूर्ण रूप से वासना रहित, निष्कलंक और आत्मिक धरातल पर रचे गए इस महारास में कामदेव भी पराजित होकर नतमस्तक हो गया। भगवान ने अपनी योगमाया के प्रभाव से उस एक रात को ब्रह्मा जी की एक रात के बराबर लंबा कर दिया था, जो मानवीय गणना के अनुसार करोड़ों वर्षों के समान मानी जाती है। पृथ्वी पर समय स्थिर हो गया था, चंद्रमा अपनी शीतल किरणों से लगातार अमृत की वर्षा कर रहा था और पूरा ब्रह्मांड इस परम शांति और आनंद में लीन था। महारास की पूर्णाहुति के बाद सभी गोपियों ने यमुना स्नान किया और श्रीकृष्ण के चरणों में अपनी पूर्ण शरणागति समर्पित की।
निधिवन की मान्यता और आज भी शरद पूर्णिमा पर होने वाली लीला
आज भी मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का पर्व अत्यंत श्रद्धा और विस्मय के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से वृंदावन का निधिवन इस दिव्य घटना का जीवंत केंद्र माना जाता है। स्थानीय संतों और जनमानस की दृढ़ मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में आज भी भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराधा रानी और गोपियों संग इस वन में पधारते हैं और महारास रचाते हैं। यही कारण है कि सूर्यास्त होते ही निधिवन के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और वहां किसी भी मनुष्य अथवा पशु-पक्षी को रुकने की अनुमति नहीं होती। रंगमहल में आज भी शाम को माखन-मिश्री, पान का बीड़ा और शृंगार की वस्तुएं रखी जाती हैं और सुबह पट खुलने पर वे उपयोग की हुई मिलती हैं। शरद पूर्णिमा की रात ब्रजवासी अपने घरों की छतों पर खीर बनाकर चांदनी में रखते हैं, जिससे उसमें चंद्रमा द्वारा बरसाया गया औषधीय व आध्यात्मिक अमृत समाहित हो सके। यह रात केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक गाथा नहीं है, बल्कि ब्रज की हवाओं में बहने वाला वह शाश्वत सच है जो हर सच्चे साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर परमात्मा के अनन्य प्रेम की अनुभूति कराता है।
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