
सनातन धर्म में शक्ति उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्रि अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में अंतिम तीन तिथियां—महासप्तमी, महाअष्टमी (दुर्गा अष्टमी) और महानवमी—सर्वाधिक पुण्यदायी और महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। तंत्र-मंत्र साधना, हवन, संधि पूजा और कन्या पूजन के लिए इन तिथियों का सटीक ज्ञान होना अनिवार्य है। पंचांग और उदयातिथि के भेद के कारण अक्सर श्रद्धालुओं के मन में अष्टमी और नवमी की सही तिथि को लेकर असमंजस रहता है। ज्योतिर्विद गणना के अनुसार इन तीनों तिथियों का सही काल निर्धारण इस प्रकार है:
महासप्तमी: मां कालरात्रि की पूजा
नवरात्रि की सातवीं अधिष्ठात्री देवी मां कालरात्रि हैं। मां कालरात्रि का स्वरूप घने अंधकार की तरह काला है और वे दुष्टों व नकारात्मक ऊर्जाओं का संहार करने वाली मानी जाती हैं।
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महत्व: सप्तमी तिथि को देवी के नेत्र खुलने (नवपत्रिका प्रवेश व चक्षु-दान) का विधान है।
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साधना: इस दिन तंत्र-मंत्र के साधक रात्रि के समय निशा पूजा और विशेष अनुष्ठान करते हैं। मां कालरात्रि को गुड़ का नैवेद्य अत्यंत प्रिय है।
महाअष्टमी (दुर्गा अष्टमी): मां महागौरी पूजन और संधि पूजा
आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि को महाअष्टमी या दुर्गा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन मां के आठवें स्वरूप देवी महागौरी को समर्पित है, जो शांति, पवित्रता और सौभाग्य की प्रतीक हैं।
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संधि पूजा का काल: अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभिक 24 मिनट के संगम को ‘संधिकाल’ कहा जाता है। इस 48 मिनट की अवधि में मां चामुंडा ने चंड और मुंड का संहार किया था, इसलिए संधि पूजा का विशेष तांत्रिक व आध्यात्मिक महत्व है।
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कन्या पूजन: कई परिवारों में कुलाचार परंपरा के अनुसार अष्टमी के दिन ही 2 से 10 वर्ष की कन्याओं का पाद-प्रक्षालन कर उन्हें हलवा, पूरी और काले चने का भोग लगाकर कन्या पूजन किया जाता है।
महानवमी: मां सिद्धिदात्री आराधना और पूर्णाहुति हवन
नवरात्रि का नौवां दिन देवी सिद्धिदात्री को समर्पित है, जो भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां, रिद्धियां और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।
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हवन और पूर्णाहुति: महानवमी के दिन नवरात्रि के अखंड दीप और घटस्थापना के अनुष्ठान की पूर्णाहुति के लिए महाहवन किया जाता है। नवचंडी पाठ, दुर्गा सप्तशती और वैदिक मंत्रों की आहुति देकर सभी नौ देवियों की कृपा प्राप्त की जाती है।
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कन्या पूजन व पारण: जो श्रद्धालु अष्टमी को कन्या पूजन नहीं करते, वे नवमी तिथि को नौ कन्याओं और एक बटुक (भैरव रूप) का विधिवत पूजन कर उन्हें उपहार व दक्षिणा भेंट करते हैं। नवमी तिथि के समाप्त होने और दशमी के आगमन पर ही नौ दिनों के कठिन उपवास का पारण किया जाता है।
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