
भारत और चीन के बीच वर्षों से चले आ रहे सीमा विवाद और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव को समाप्त करने की दिशा में कूटनीतिक और रणनीतिक हलचलें एक बार फिर तेज हो गई हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल दोनों देशों के बीच विशेष प्रतिनिधि (Special Representatives – SR) स्तर की 25वें दौर की महत्वपूर्ण सीमा वार्ता के लिए बीजिंग पहुंचे हैं। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अगले महीने नई दिल्ली में आयोजित होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आने की प्रबल संभावनाएं जताई जा रही हैं। यदि यह यात्रा औपचारिक रूप से संपन्न होती है, तो पिछले सात वर्षों में शी जिनपिंग का यह पहला भारत दौरा होगा। इस रणनीतिक बैठक से जुड़े घटनाक्रम का विस्तृत ब्योरा The Times of India की रिपोर्ट और Navbharat Times के विश्लेषण में भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है।
25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि (SR) वार्ता: डोभाल और वांग यी के बीच क्या है एजेंडा?
भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा के स्थायी समाधान के लिए साल 2003 में विशेष प्रतिनिधि तंत्र (SR Mechanism) की स्थापना की गई थी। अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी अपने-अपने देशों के अधिकृत विशेष प्रतिनिधि हैं। साल 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई सैन्य झड़प के बाद यह वार्ता प्रक्रिया कई वर्षों तक लगभग ठप पड़ी रही थी।
अक्टूबर 2024 में लद्दाख सेक्टर में सैनिकों के पीछे हटने (Disengagement) पर बनी सहमति के बाद दोनों देशों ने इस वार्ता तंत्र को पुनर्जीवित किया था। बीजिंग में आयोजित हो रहे इस 25वें दौर की बैठक का मुख्य एजेंडा केवल सीमा पर गश्त बहाल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों की सेनाओं के भारी जमावड़े को पीछे हटाने (De-escalation), सीमा का वैज्ञानिक सीमांकन (Delimitation) और भविष्य में किसी भी आकस्मिक टकराव को रोकने के लिए एक मजबूत बॉर्डर मैनेजमेंट फ्रेमवर्क तैयार करना है। इस कूटनीतिक प्रगति पर Hindustan Times की रिपोर्ट में भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे गए हैं।
7 साल बाद शी जिनपिंग की भारत यात्रा की तैयारी: ब्रिक्स समिट से पहले जमीन तैयार करने की कोशिश
राजनयिक हलकों में डोभाल के इस बीजिंग दौरे को सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित द्विपक्षीय शिखर बैठक की जमीन तैयार करने के रूप में देखा जा रहा है। भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है, जिसमें चीनी राष्ट्रपति के शामिल होने की मजबूत उम्मीद है।
2019 के महाबलीपुरम अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के बाद शी जिनपिंग ने भारत का दौरा नहीं किया है। भारत की स्पष्ट कूटनीतिक नीति रही है कि जब तक सीमाओं पर शांति और स्थिरता नहीं होगी, तब तक शीर्ष नेतृत्व के बीच किसी भी बड़े द्विपक्षीय समझौते को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। ऐसे में अजीत डोभाल का काम यह सुनिश्चित करना है कि बीजing वार्ता में सीमा पर तनाव कम करने के ठोस परिणाम निकलें, ताकि आगामी ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं के बीच सार्थक और सकारात्मक संवाद का माहौल तैयार हो सके।
‘बॉर्डर पर शांति के बिना रिश्ते सामान्य नहीं’: विदेश मंत्री एस. जयशंकर का कड़ा संदेश
बीजिंग में डोभाल-वांग यी वार्ता शुरू होने से ठीक पहले भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने एक बार फिर नई दिल्ली के रुख को पूरी दुनिया के सामने दोहराया है। नई दिल्ली में आयोजित इकोनॉमिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम में बोलते हुए जयशंकर ने स्पष्ट किया कि 2020 की गर्मियों से लेकर 2024 तक दोनों देशों ने अपने संबंधों का सबसे खराब दौर देखा है, जो सीधे तौर पर सीमावर्ती इलाकों में चीन की आक्रामक गतिविधियों का परिणाम था।
विदेश मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि सीमा की स्थिति ही समग्र भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेगी। जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में पूर्ण शांति और अमन-चैन बहाल नहीं होता, तब तक व्यापार, कूटनीति और जन-जन के संपर्क को स्वाभाविक रूप से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इस सख्त संदेश के साथ डोभाल का बीजिंग पहुंचना यह दर्शाता है कि भारत राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर किसी भी प्रकार का समझौता किए बिना ही बातचीत की मेज पर बैठा है। इस बयान के कूटनीतिक संदर्भ India Today की रिपोर्ट में भी रेखांकित किए गए हैं।
अरुणाचल प्रदेश और ‘चिकन नेक’ की सुरक्षा: डोभाल डॉक्ट्रिन का सामरिक रुख
अजीत डोभाल की रणनीतिक कार्यशैली, जिसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ कहते हैं, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के कड़े संतुलन पर आधारित है। हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी सेक्टर में चीनी सैनिकों की गतिविधियों और चीन द्वारा भारतीय स्थानों के नाम बदलने की बेतुकी कोशिशों पर भारत ने कड़ा ऐतराज जताया है। डोभाल की बातचीत में पूर्वी सेक्टर की संवेदनशीलता शीर्ष प्राथमिकता पर है।
इसके अलावा, रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के समीप डोकलाम ट्राई-जंक्शन और भूटान सीमा के आसपास चीन के बुनियादी ढांचे के निर्माण पर भी भारत अपनी गहरी सुरक्षा चिंताएं दर्ज करा रहा है। यह संकरा गलियारा भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। डोभाल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ट्राई-जंक्शन बिंदुओं पर किसी भी यथास्थिति (Status Quo) में एकतरफा बदलाव भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कतई स्वीकार्य नहीं होगा।
3,488 किमी लंबी एलएसी पर डी-एस्केलेशन और बफर जोन की समीक्षा
पूर्वी लद्दाख में डेमचोक और देपसांग जैसे विवादास्पद बिंदुओं पर सेनाओं के पीछे हटने के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती दोनों ओर तैनात 50,000 से अधिक सैनिकों, तोपों, मिसाइल सिस्टम और भारी बख्तरबंद वाहनों की पूर्ण वापसी (De-escalation) की है। जब तक भारी सैन्य साजो-सामान वास्तविक अग्रिम चौकियों से पीछे नहीं हटता, तब तक सीमा पर आकस्मिक टकराव का खतरा बना रहता है।
इस वार्ता में दोनों पक्षों द्वारा गठित ‘वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन ऑन इंडिया-चाइना बॉर्डर अफेयर्स’ (WMCC) की सिफारिशों पर अमल की समीक्षा की जा रही है। भारत का प्रयास है कि वेस्टर्न (लद्दाख), मिडिल (उत्तराखंड-हिमाचल) और ईस्टर्न (अरुणाचल-सिक्किम) तीनों सेक्टरों में स्पष्ट प्रोटोकॉल, हॉटलाइन संपर्क और फ्लैग मीटिंग्स की नियमित व्यवस्था बनाई जाए ताकि गश्ती दलों के बीच किसी भी प्रकार के भ्रम या टकराव को मौके पर ही सुलझाया जा सके।
सीधी उड़ानों, वीजा नियमों और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भी चर्चा संभव
सीमा पर यदि सकारात्मक प्रगति दर्ज होती है, तो यह वार्ता दोनों देशों के बीच नागरिक और आर्थिक संपर्कों को दोबारा पटरी पर लाने का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है। गलवान गतिरोध के बाद से भारत और चीन के बीच सीधी यात्री उड़ानें निलंबित हैं, चीनी नागरिकों के लिए वीजा प्रक्रियाओं में अतिरिक्त सुरक्षा जांच लागू है और पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा भी बाधित रही है।
राजनयिक सूत्रों के मुताबिक, यदि बीजिंग में सीमा प्रबंधन और शांति बहाली पर ठोस सहमति बनती है, तो आगामी महीनों में कैलाश मानसरोवर यात्रा को दोबारा शुरू करने, सीधी उड़ानों की बहाली और व्यापारिक व तकनीकी वीजा नियमों में चरणबद्ध ढील देने की औपचारिक घोषणाएं की जा सकती हैं। हालांकि, भारतीय रणनीतिकारों ने स्पष्ट कर दिया है कि इन सभी नागरिक और व्यापारिक सहूलियतों की गति पूरी तरह से जमीनी स्तर पर सीमा शांति की प्रगति से बंधी रहेगी।
वैश्विक भू-राजनीति और एशिया की दो महाशक्तियों के संबंधों का भविष्य
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व का तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक खींचतान जारी है, भारत और चीन के बीच स्थिरता पूरे एशियाई क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देशों का सहयोग वैश्विक संतुलन के लिए आवश्यक है।
अजीत डोभाल का यह बीजिंग मिशन केवल एक नियमित सीमा वार्ता नहीं है, बल्कि यह इस बात की अग्निपरीक्षा है कि क्या बीजिंग और नई दिल्ली आपसी मतभेदों को विवाद में बदलने से रोक सकते हैं। आने वाले 48 घंटे यह तय करेंगे कि क्या दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देश अपने कड़वे अतीत को पीछे छोड़कर एक स्थिर, संतुलित और सम्मानजनक रिश्ते की नई शुरुआत कर पाएंगे या नहीं।
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