
बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद उपजे राजनीतिक और सामाजिक संकट के बीच देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक बड़ा और भावुक बयान जारी किया है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि बड़े दुख और भारी मन से यह कहना पड़ रहा है कि इस साल का पावन दुर्गा उत्सव ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में सनातन धर्म के अनुयायियों समेत सभी धार्मिक व जातीय अल्पसंख्यकों के बीच खौफ और असुरक्षा की गहरी भावना हावी है। शेख हसीना ने बेहद कड़े शब्दों में रेखांकित किया कि 5 अगस्त के सत्ता परिवर्तन के बाद से मुल्क भर में अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। हत्याओं, शारीरिक उत्पीड़न, पूजा स्थलों में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की तोड़फोड़, मंदिरों और हिंदू परिवारों के घरों पर संगठित हमलों की अनगिनत घटनाएं सामने आई हैं। यह दुखद स्थिति अब सिर्फ मुल्क की आंतरिक समस्या नहीं रही, बल्कि इसने वैश्विक पटल पर भी गंभीर चिंता और आक्रोश पैदा कर दिया है।
मोहम्मद यूनुस के अंतरिम प्रशासन पर संरक्षण देने और कानून व्यवस्था ध्वस्त करने का आरोप
शेख हसीना ने नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली मौजूदा अंतरिम सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि अंतरिम प्रशासन ने मुल्क में ऐसा अराजक और लचर माहौल बनने दिया है जिसमें कट्टरपंथी और उपद्रवी तत्व खुलेआम मनमानी कर रहे हैं। हसीना ने कहा कि जिन ताकतों ने अल्पसंख्यकों, राजनीतिक विरोधियों और आम बेकसूर नागरिकों के खिलाफ हिंसा की आग भड़काई, उन्हें सजा देने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाय सरकारी तंत्र अपराधियों को संरक्षण देने में लगा हुआ है। कानून का इकबाल पूरी तरह से खत्म हो चुका है और इसी प्रशासनिक नाकामी ने दंगाइयों के हौसले बुलंद किए हैं। उन्होंने चिंता जताई कि राज्य की संवैधानिक और सुरक्षा संस्थाओं में जनता का भरोसा तेजी से टूटा है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय खुद को पूरी तरह असहाय और डरा हुआ महसूस कर रहे हैं।
‘धर्म व्यक्तिगत आस्था है, पर त्योहार सबके’: शेख हसीना ने याद दिलाए 1971 के आदर्श
अपने संबोधन में पूर्व प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश के ऐतिहासिक सांप्रदायिक सौहार्द और मुक्ति संग्राम (1971) के मूल सिद्धांतों को याद किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान ने जिस बांग्लादेश का सपना देखा था, वह ऐसा मुल्क था जहां हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई सभी मजहबों के नागरिक समान अधिकार, सम्मान और पूरी सुरक्षा के साथ जी सकें। हसीना ने दोहराया कि उनका हमेशा से यह दृढ़ विश्वास रहा है कि “धर्म प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है, लेकिन त्योहार सबके होते हैं”। उन्होंने कहा कि जिस संविधान की नींव धर्मनिरपेक्षता, समानता, मानवीय गरिमा और हर नागरिक को अपनी आस्था का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता पर रखी गई थी, आज उस लोकतांत्रिक आत्मा को तार-तार किया जा रहा है।
मंदिरों में तोड़फोड़, फिरौती और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं से वैश्विक आक्रोश
शेख हसीना ने हाल के दिनों में सामने आई खौफनाक जमीनी हकीकत का ब्योरा देते हुए बताया कि किस तरह पूजा पंडालों, ऐतिहासिक मंदिरों और हिंदू बाहुल्य बस्तियों में सुनियोजित तरीके से दहशत फैलाई जा रही है। संपत्ति जब्ती, जबरन वसूली, फिरौती मांगने और महिलाओं को डराने-धमकाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि उत्सव के माहौल में भी पूजा पंडालों को सेना और पुलिस की भारी तैनाती के साए में संचालित करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जो यह साबित करता है कि जमीनी हकीकत कितनी भयावह है। मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी इन घटनाओं पर बार-बार आपत्ति जताई है। पूर्व प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मुल्क के विवेकशील नागरिकों से आह्वान किया कि वे मजहबी नफरत और कट्टरपंथ के खिलाफ एकजुट हों और अल्पसंख्यकों के जीवन, संपत्ति और मान-सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करें।
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