
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच पाकिस्तान का दोहरा और अवसरवादी रुख एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। सऊदी अरब की वायु रक्षा प्रणाली द्वारा पवित्र शहर मक्का के पास एक हूती ड्रोन को मार गिराए जाने के दावे के तुरंत बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने त्रिपक्षीय ‘मक्का रक्षा समझौते’ (Mecca Agreement) को लेकर बड़ा बयान दिया है। कभी मुश्किल वक्त में सऊदी अरब की ओर से मांगी गई सैन्य मदद पर मुंह फेरने वाला पाकिस्तान अब खुद को रियाद का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने बयान दिया है कि मक्का पैक्ट को लागू करने में कोई अस्पष्टता नहीं है और जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान सऊदी की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देगा। हालांकि, रक्षा जानकारों का मानना है कि इस्लामाबाद का यह नया पैंतरा खाड़ी देशों से आर्थिक पैकेज और कर्ज ऐंठने के साथ-साथ ईरान और सऊदी के बीच अपना कूटनीतिक प्रभाव जमाने की महज एक चाल है।
क्या है मक्का समझौता और ख्वाजा आसिफ का ताजा बयान?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हाल ही में एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौता हुआ है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार ‘इस्लामिक नाटो’ की संज्ञा दे रहे हैं। इस समझौते की प्रमुख शर्त यह है कि यदि तीनों में से किसी भी एक सदस्य देश की संप्रभुता या सीमाओं पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा।
जियो न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि सऊदी अरब पर हुए ताजा ड्रोन हमले के बाद मक्का समझौते को लागू करने की नौबत आ चुकी है। आसिफ ने दावा किया कि पवित्र स्थल मक्का की रक्षा के लिए पाकिस्तान को किसी कागजी समझौते की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि यह उनका धार्मिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि यदि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता खतरे में आती है, तो पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारियां निभाने से पीछे नहीं हटेगा।
पुराना इतिहास: जब जरूरत के समय सऊदी अरब को दिया था दगा
ख्वाजा आसिफ का यह जोशीला बयान भले ही सऊदी अरब के प्रति निष्ठा दिखाने की कोशिश लग रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि पाकिस्तान अतीत में कई बार रियाद के भरोसे को तोड़ चुका है। साल 2015 में जब यमन युद्ध अपने चरम पर था और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान से अपने सैनिकों और लड़ाकू विमानों की मांग की थी, तब तत्कालीन पाकिस्तानी संसद ने एकतरफा प्रस्ताव पारित कर सऊदी की मदद करने से साफ इनकार कर दिया था। उस वक्त पाकिस्तान के इस धोखे से सऊदी अरब के शाही परिवार को गहरा धक्का लगा था। अब जब सऊदी अरब ने अपनी सीमाओं को खुद सुरक्षित करने के लिए आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर लिए हैं, तब पाकिस्तान अपनी ‘फौज’ भेजने और नाटो जैसे समझौते की दुहाई देकर सऊदी के सामने अपनी अहमियत साबित करने का नाटक कर रहा है।
ईरान और सऊदी के बीच दोतरफा दांव, बिचौलिया बनने की फिराक
ख्वाजा आसिफ के इस बयान के पीछे का असली खेल तब उजागर हुआ जब उन्होंने सऊदी अरब के साथ खड़े होने का दावा करते हुए ईरान का भी बचाव करना शुरू कर दिया। आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब का संदेश ईरान तक पहुंचाया है और उन्हें नहीं लगता कि एक राष्ट्र के तौर पर ईरान कोई नया मोर्चा खोलेगा। पाकिस्तान का यह रुख दिखाता है कि वह एक तरफ सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा का झांसा देकर अपने पाले में रखना चाहता है, तो दूसरी तरफ अपनी सीमा से सटे ईरान को भी नाराज नहीं करना चाहता। इस दोतरफा रणनीति के जरिए पाकिस्तान खुद को इस पूरे विवाद का मुख्य मध्यस्थ बनाकर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपनी साख बचाना चाहता है।
आर्थिक तंगी और तेल राहत: पाक की कथनी और करनी का अंतर
विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तानी हुकूमत और उसकी सेना का यह नया रुख किसी रणनीतिक मजबूती से ज्यादा उनकी आर्थिक लाचारी से प्रेरित है। पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था लगातार विदेशी कर्जों, सऊदी सेंट्रल बैंक में रखे जाने वाले डिपॉजिट और रियायती दरों पर मिलने वाले कच्चे तेल पर टिकी है। जब भी पाकिस्तान को रियाद से अरबों डॉलर के नए वित्तीय पैकेज या कर्ज रोलओवर की जरूरत होती है, इस्लामाबाद अपने रक्षा समझौते और सुरक्षा की गारंटी का ढोल पीटने लगता है। जब पत्रकारों ने ख्वाजा आसिफ और पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय से पूछा कि क्या पाकिस्तान वास्तव में हूतियों के खिलाफ जमीनी स्तर पर सेना तैनात करेगा, तो उन्होंने इसे ‘ऑपरेशनल गोपनीयता’ कहकर टाल दिया। यह साफ दर्शाता है कि पाकिस्तान की यह तैयारी केवल बयानों और गीदड़भभकियों तक सीमित है, ताकि खाड़ी देशों से रियायतें हासिल की जा सकें।
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