
प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर सस्पेंस और साइकोलॉजिकल ड्रामा से भरपूर नई वेब सीरीज ‘शक: ट्रस्ट नो वन’ (Shaque: Trust No One) दर्शकों के बीच दस्तक दे चुकी है। बॉलीवुड अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा की मुख्य भूमिका और जाने-माने निर्देशक रेंसिल डी’सिल्वा के निर्देशन में बनी यह सीरीज सीधे तौर पर एक मां के दर्द, पारिवारिक रहस्यों और गहरी साजिशों के ताने-बाने को पर्दे पर उकेरती है। यदि आप भी इस वीकेंड घर बैठे किसी रहस्यमयी कहानी को बिंज-वॉच करने की योजना बना रहे हैं, तो यह विस्तृत समीक्षा आपको यह तय करने में मदद करेगी कि क्या यह सात कड़ियों वाली मिस्ट्री थ्रिलर आपके कीमती समय पर खरी उतरती है या नहीं।
9 साल की अनवरत तलाश और टूटती मां की मार्मिक दास्तान
सीरीज की मूल कहानी अन्विका (परिणीति चोपड़ा) और उसकी नवजात बच्ची अपेक्षा के इर्द-गिर्द घूमती है। अस्पताल में जन्म लेने के कुछ ही पलों के भीतर नवजात बच्ची अचानक संदिग्ध परिस्थितियों में अगवा हो जाती है। इसके बाद शुरू होता है एक मां का 9 वर्षों तक चलने वाला अंतहीन और पीड़ादायी संघर्ष। समय बीतने के साथ अन्विका के जीवन में दूसरी बेटी का आगमन होता है, लेकिन एक नई संतान की किलकारियां भी उसके दिल से पहली बेटी के वजूद और उसकी जुदाई की टीस को मिटा नहीं पाती हैं।
अन्विका अपनी बच्ची को खोजने की जिद में इस कदर डूब जाती है कि समाज, रिश्तेदार और यहां तक कि उसका अपना परिवार भी उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त यानी पागल करार देने लगता है। जैसे-जैसे कहानी की परतें खुलती हैं, अन्विका के परिवार से जुड़े कई काले, असहज और चौंकाने वाले सच सामने आते हैं। शुरुआती कड़ियों में ये खुलासे दर्शकों को सीट से बांधे रखते हैं, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, पटकथा की गति धीमी पड़ने लगती है और यह अहसास होने लगता है कि कथानक को जबरन लंबा खींचा जा रहा है।
सस्पेंस की रफ्तार: कहां बंधी पकड़ और कहां भटका ट्रैक
निर्देशक रेंसिल डी’सिल्वा ने सीरीज की शुरुआत बेहद सधी हुई और रोमांचक रखी है। पहले कुछ एपिसोड्स को देखकर ऐसा लगता है कि यह सीरीज दर्शक को आखिरी पल तक गहरे सस्पेंस के भंवर में उलझाए रखेगी। हालांकि, थ्रिलर विधा के अनुभवी दर्शकों के लिए यह राज ज्यादा देर तक छिपा नहीं रह पाता और कुछ ही एपिसोड्स के बाद यह अनुमान लगाना आसान हो जाता है कि अन्विका की खोई हुई बेटी वास्तव में कहां और किसके पास है।
सीरीज की सबसे बड़ी राहत इसका क्लाइमेक्स है। बच्ची कहां है यह पहले भले समझ आ जाए, लेकिन उस मासूम का अपहरण आखिर किस गहरी रंजिश या वजह से किया गया था, यह राज पूरी तरह से फिनाले एपिसोड में ही खुलता है। यही अंतिम मोड़ दर्शकों की उत्सुकता को बचाए रखने में कामयाब होता है।
गैर-जरूरी सब-प्लॉट्स और भटकाव पैदा करता काला जादू का एंगल
लेखन के स्तर पर सीरीज में कुछ ऐसी कड़ियां जोड़ी गई हैं जो अनावश्यक रूप से समय खींचती नजर आती हैं। दर्शकों का ध्यान भटकाने और कहानी में रहस्य की अतिरिक्त चाशनी घोलने के लिए जादू-टोने (काला जादू) और अंधविश्वास के एंगल को शामिल किया गया था। शुरुआत में लगता है कि यह तंत्र-मंत्र का पहलू कहानी में कोई बड़ा और डरावना मोड़ लेकर आएगा, लेकिन जैसे-जैसे एपिसोड आगे बढ़ते हैं, यह पूरा ट्रैक दिशाहीन साबित होता है और मुख्य कथानक से पूरी तरह कट जाता है। इस तरह के गैर-जरूरी भटकाव थ्रिलर के मूल प्रभाव को कमजोर कर देते हैं।
परिणीति का संजीदा अभिनय, जेनिफर का खौफनाक रूप और अनूप सोनी की मजबूती
अभिनय के मोर्चे पर यह सीरीज काफी हद तक अपने कलाकारों के कंधों पर टिकी है। परिणीति चोपड़ा ने अन्विका के किरदार में जान फूंक दी है। एक बेबस, हर तरफ से नकारी गई लेकिन उम्मीद न छोड़ने वाली मां के दर्द और आंखों के सूनेपन को उन्होंने बेहद मार्मिकता से पर्दे पर जिया है।
वहीं जेनिफर विंगेट ने एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है। यदि आपने टीवी पर उनका चर्चित शो ‘बेहद’ देखा है, तो आपको उनके अभिनय में वही खौफनाक और जुनूनी पागलपन फिर से महसूस होगा। हालांकि, अफसोस इस बात का रहता है कि जेनिफर के इस प्रचंड रूप को देखने के लिए दर्शकों को आखिरी एपिसोड तक इंतजार करना पड़ता है। मेकर्स चाहते तो उनके स्क्रीन-टाइम और किरदार को शुरुआत से ही ज्यादा धारदार बना सकते थे।
वरिष्ठ अभिनेता अनूप सोनी ने पुलिस इंस्पेक्टर खुराना के रूप में एक बार फिर अपनी छाप छोड़ी है। पहले एपिसोड से लेकर सातवें एपिसोड तक उनका संजीदा, कानूनी मर्यादा में बंधा और जांच को दिशा देने वाला अंदाज काफी विश्वसनीय लगता है। इनके साथ सोनी राजदान, ताहिर राज भसीन, हरलीन सेठी और सुमित व्यास ने भी अपने-अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाया है।
फैसला: क्या वीकेंड पर देखने लायक है ‘शक: ट्रस्ट नो वन’?
अगर आप वीकेंड पर फैमिली ड्रामा और मर्डर मिस्ट्री का मिला-जुला फ्लेवर देखना चाहते हैं, तो 7 एपिसोड वाली इस सीरीज को एक बार देखा जा सकता है। बीच के कुछ एपिसोड्स में खिंचाव और अनुमान लगाने योग्य सस्पेंस के बावजूद, कलाकारों की सधी हुई अदाकारी, अपहरण के पीछे का अंतिम मकसद और आखिरी एपिसोड में जेनिफर विंगेट का विस्फोटक अंदाज इसे एक औसत से बेहतर ‘वन-टाइम वॉच’ मिस्ट्री थ्रिलर बना देता है।
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