
सनातन परंपरा में संतान की लंबी आयु, आरोग्य और संकटों से रक्षा के लिए माताओं द्वारा रखे जाने वाले व्रतों में जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत को सबसे कठिन और महत्वपूर्ण माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह पावन पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के अलावा नेपाल और पूर्वांचल के सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। जितिया को जिउतिया या जीमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत में माताएं अपनी संतानों के कल्याण और खुशहाली के लिए लगभग 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला (बिना अन्न और जल के) उपवास रखती हैं। इस बार अष्टमी तिथि के दो दिन पड़ने के कारण व्रती महिलाओं और श्रद्धालुओं के बीच तारीख को लेकर गहरा असमंजस बना हुआ था कि व्रत 2 अक्टूबर को रखा जाए या 3 अक्टूबर को। पंचांगीय गणना और उदया तिथि के नियमों ने अब इस संशय को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
2 या 3 अक्टूबर: पंचांग और उदया तिथि के अनुसार कब रखा जाएगा जितिया व्रत?
हिंदू धर्म में तिथियों का निर्णय सूर्योदय कालीन उदया तिथि के आधार पर किया जाता है। पंचांग के स्पष्ट गणित के अनुसार, आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 03 अक्टूबर को सुबह 07 बजकर 59 मिनट पर शुरू हो रही है। यह अष्टमी तिथि अगले दिन यानी 4 अक्टूबर को सुबह 05 बजकर 51 मिनट तक प्रभावी रहेगी। चूंकि 3 अक्टूबर के दिन अष्टमी तिथि का सूर्योदय के बाद पूर्ण विस्तार हो रहा है और इसी दिन प्रदोष काल व शाम के समय अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदया तिथि और शास्त्रसम्मत नियमों के तहत जीवित्पुत्रिका का मुख्य निर्जला व्रत 3 अक्टूबर को ही रखा जाएगा। 2 अक्टूबर को केवल सप्तमी तिथि का नहाय-खाय संपन्न होगा, जबकि मुख्य उपवास का अनुष्ठान 3 अक्टूबर को संपन्न किया जाएगा।
तीन दिवसीय महापर्व का नियम: नहाय-खाय से लेकर पारण तक की पूरी प्रक्रिया
जितिया व्रत की प्रक्रिया बेहद कठोर और तीन दिनों तक चलने वाले नियमों से बंधी होती है, जिसे बड़े अनुशासन के साथ पूरा किया जाता है:
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पहला दिन (नहाय-खाय): इस महापर्व की शुरुआत सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के साथ होती है। व्रती महिलाएं सुबह पवित्र नदियों, तालाबों या घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद सात्विक भोजन तैयार किया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन मुख्य रूप से मड़ुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग, तोरी (नेनुआ) और कद्दू की सब्जी खाने का विशेष विधान है।
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दूसरा दिन (निर्जला व्रत): अष्टमी तिथि को पूरे दिन और रात अन्न व जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती। महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं। शाम के समय महिलाएं समूह में एकत्र होकर भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारिन की कुश या मिट्टी से बनी प्रतिमाएं स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं और जीवित्पुत्रिका व्रत की पावन कथा का श्रवण करती हैं।
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तीसरा दिन (व्रत का पारण): नवमी तिथि को सुबह सूर्योदय के पश्चात पूजा-अर्चना संपन्न कर व्रत का पारण किया जाता है। महिलाएं भगवान को भोग लगाने के बाद अन्न और जल ग्रहण करके अपने 24 घंटे से अधिक चले कठिन तप को पूर्ण करती हैं।
भगवान जीमूतवाहन के पूजन का शुभ मुहूर्त और चौघड़िया
जीवित्पुत्रिका व्रत में 3 अक्टूबर को भगवान जीमूतवाहन की आराधना, कथा श्रवण और अर्घ्य देने के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कई अत्यंत शुभ मुहूर्त बन रहे हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:38 बजे से सुबह 05:26 बजे तक
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प्रातः सन्ध्या: सुबह 05:02 बजे से सुबह 06:15 बजे तक
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अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक
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गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:05 बजे से शाम 07:18 बजे तक
शाम के समय गोधूलि वेला में प्रदोष काल के दौरान कथा सुनने और जीमूतवाहन देव को सरसों का तेल, खली और लाल-पीले धागे अर्पित करने का विशेष फल मिलता है।
जितिया व्रत का पारण मुहूर्त: कब और कैसे खोलें उपवास?
कठिन निर्जला व्रत के बाद पारण का समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर को नवमी तिथि में किया जाएगा। पंचांग के अनुसार 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद व्रत पारण का सबसे उत्तम और शुभ मुहूर्त सुबह 06 बजकर 23 मिनट के बाद प्रारंभ होगा। व्रती महिलाओं को सलाह दी जाती है कि वे सुबह स्नान-ध्यान कर सूर्य देव को अर्घ्य दें, भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करें और शुभ मुहूर्त के बाद ही नोनी का साग, मड़ुआ का आटा या सात्विक अन्न-जल ग्रहण कर व्रत का विधिवत समापन करें।
जीवित्पुत्रिका व्रत के आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ
धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस व्रत के प्रभाव से गंधर्व राजकुमार भगवान जीमूतवाहन प्रसन्न होकर व्रती माताओं की संतान की अकाल मृत्यु, गंभीर बीमारियों और हर प्रकार के बड़े संकटों से ढाल बनकर रक्षा करते हैं। इसके प्रभाव से बच्चों को विद्या, प्रखर बुद्धि, यश, दीर्घायु और करियर के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त होती है। जिन दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति में बाधाएं आ रही होती हैं, उन्हें भी इस व्रत के पुण्य प्रभाव से योग्य व संस्कारी संतान का वरदान मिलता है। साथ ही घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और गृह क्लेश से मुक्ति मिलती है।
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