7 साल बाद मोदी-शी आमने-सामने: LAC, अरुणाचल और चीन के मेगा डैम पर क्या निकलेगा हल? जानिए भारत की सबसे बड़ी शर्तें

वर्ष 2019 के मामल्लापुरम (चेन्नई) अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के बाद, पिछले सात वर्षों में भारत और चीन के रिश्ते अपने सबसे तनावपूर्ण और नाजुक दौर से गुजरे हैं। 2020 की गलवान घाटी हिंसक झड़प ने दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के बीच दशकों से चले आ रहे रणनीतिक और व्यापारिक भरोसे को हिलाकर रख दिया था। इस लंबे कूटनीतिक गतिरोध और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर औपचारिक दूरी के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पूर्णकालिक आमने-सामने की द्विपक्षीय वार्ता की बिसात बिछ चुकी है।

हालांकि, इस ऐतिहासिक बैठक से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सात साल बाद की यह मुलाकात वास्तविक शांति का मार्ग प्रशस्त करेगी, या फिर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य तनाव, अरुणाचल प्रदेश पर चीन के अड़ियल दावों और ब्रह्मपुत्र नदी पर बीजिंग के विवादित ‘मेगा डैम’ जैसे ज्वलंत मुद्दों पर गतिरोध पहले की तरह ही बरकरार रहेगा?

1. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC): डेमचोक और देपसांग से पूर्ण डिसइंगेजमेंट की चुनौती

वार्ता की मेज पर भारत की सबसे पहली और गैर-बातचीत योग्य (Non-Negotiable) शर्त पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर स्थिति को अप्रैल 2020 से पूर्व की यथास्थिति में बहाल करना है।

  • देपसांग और डेमचोक में अटका पेंच: दोनों देशों के कोर कमांडरों के बीच 21 से अधिक दौर की सैन्य वार्ताओं के बावजूद पेंगोंग त्सो, गलवान और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे इलाकों में बफर जोन बनाकर सेनाएं पीछे तो हटी हैं, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देपसांग मैदान (Depsang Plains) और डेमचोक में गश्त अधिकारों (Patrolling Rights) को लेकर अभी भी पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है।

  • सैन्य जमावड़ा (De-escalation): एलएसी के दोनों ओर 50,000 से अधिक भारी हथियारों से लैस सैनिक, तोपखाने और एयर डिफेंस मिसाइलें तैनात हैं। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि जब तक सीमा पर शांति और सैन्य जमावड़े में कमी (De-escalation) नहीं होती, तब तक द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य नहीं माना जा सकता।

2. अरुणाचल प्रदेश पर बीजिंग की उकसावे वाली नीति और सीमावर्ती गांव

बैठक का दूसरा सबसे पेचीदा बिंदु पूर्वी सेक्टर यानी अरुणाचल प्रदेश से जुड़ा हुआ है:

  • नाम बदलने की चीनी चाल: पिछले कुछ वर्षों में चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानों, पहाड़ों और नदियों के नाम बदलकर उन्हें ‘जांगनान’ (Zangnan) का हिस्सा बताते हुए नए नक्शे जारी किए हैं। भारत ने हर बार इसे कड़े शब्दों में खारिज करते हुए दोहराया है कि अरुणाचल भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग था, है और रहेगा।

  • शियाओकांग मॉडल गांव: चीन ने एलएसी के ठीक पार सैकड़ों दोहरे उपयोग वाले ‘शियाओकांग’ (सीमावर्ती रक्षा गांव) बसा दिए हैं, जिनका उपयोग सैन्य निगरानी और लॉजिस्टिक्स के लिए किया जा सकता है। इसके जवाब में भारत ने ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के तहत अपने सीमावर्ती गांवों का तेजी से बुनियादी ढांचा मजबूत किया है। शिखर वार्ता में भारत चीन की इस एकतरफा भू-रणनीतिक पैंतरेबाजी पर कड़ा ऐतराज दर्ज कराएगा।

3. ब्रह्मपुत्र पर चीन का ‘सुपर डैम’: जल-बम या पारिस्थितिकीय आपदा?

रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एलएसी के बाद जो सबसे बड़ा भू-राजनीतिक संकट दोनों देशों के बीच उभर रहा है, वह है तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र नदी) के ‘ग्रेट बेंड’ पर चीन द्वारा बनाया जा रहा दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत महा-बांध (मेगा डैम)।

  • रणनीतिक खतरा: 60 गीगावाट की विशाल क्षमता वाला यह प्रस्तावित बांध भारत की सीमा (अरुणाचल प्रदेश) से महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर मेडोग काउंटी में स्थित है। यह बांध चीन के थ्री गॉर्जेस डैम से तीन गुना बड़ा होगा।

  • भारत की प्रमुख चिंताएं: भारत को आशंका है कि युद्ध या तनाव की स्थिति में चीन इस बांध के जरिए पानी को रोककर पूर्वोत्तर भारत में सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, या फिर अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़कर असम और अरुणाचल में विनाशकारी कृत्रिम बाढ़ ला सकता है। इसके अलावा भूकंपीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में इतने विशाल बांध का निर्माण पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है।

  • भारत की जवाबी तैयारी: भारत ने इस खतरे से निपटने के लिए अरुणाचल प्रदेश में 11,000 मेगावाट की ‘अपर सियांग बहुउद्देशीय परियोजना’ पर काम तेज कर दिया है, ताकि चीन की तरफ से आने वाले पानी के प्रभाव को बफर स्टोरेज के जरिए नियंत्रित किया जा सके। पीएम मोदी इस वार्ता में ट्रांसबाउंड्री नदियों को लेकर पारदर्शी डेटा साझा करने और अंतरराष्ट्रीय जल संधियों के सम्मान का मुद्दा मजबूती से उठाएंगे।

कूटनीतिक संतुलन: क्या निकलेगा ठोस समाधान?

अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति के वर्तमान समीकरणों को देखें तो दोनों ही देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित हैं। अमेरिकी टैरिफ, पश्चिमी प्रतिबंधों और आर्थिक सुस्ती के बीच चीन भारत के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को सहज बनाना चाहता है और भारतीय बाजार में चीनी एफडीआई (FDI) पर लगी पाबंदियों में ढील की उम्मीद कर रहा है।

दूसरी ओर, भारत ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि व्यापार और कूटनीति सीमा पर शांति से अलग नहीं हो सकते। यदि दोनों शीर्ष नेता एलएसी पर शेष फ्रिक्शन पॉइंट्स के समाधान के लिए एक ठोस समयसीमा तय करने और वास्तविक विश्वास-बहाली उपायों (Confidence Building Measures) पर सहमत होते हैं, तभी इस 7 साल बाद हो रही ऐतिहासिक मुलाकात को सफल माना जाएगा।

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