
सनातन धर्म और हिंदू पूजा-पद्धति में हर छोटे-बड़े अनुष्ठान के पीछे गहरा आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक आधार छुपा होता है। अक्सर देखा जाता है कि लोग पूरी तरह स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान की पूजा करने बैठते हैं, लेकिन आसन ग्रहण करते ही पंडित जी या घर के बड़े सबसे पहले हाथ में कुश या दूर्वा देकर अपने शरीर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कने को कहते हैं। कई लोगों के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब तन को जल से अच्छी तरह धोकर पूरी तरह स्नान कर लिया गया है, तो फिर से पूजा की चौकी पर बैठते ही जल का प्रोक्षण (छिड़काव) क्यों किया जाता है? धर्मशास्त्रों के अनुसार, केवल पानी से शरीर धो लेना ही वास्तविक शुद्धि नहीं है; पूजा में प्रवेश करने के लिए बाह्य शुद्धि के साथ-साथ ‘अंतःशुद्धि’ यानी मन, आत्मा और चेतना का पवित्र होना अनिवार्य होता है।
बाह्य शुद्धि बनाम अंतःशुद्धि: शरीर केवल साधन है, पूजा मन से होती है
शास्त्रों में शुद्धि के दो मुख्य प्रकार बताए गए हैं—बाह्य शुद्धि और आभ्यंतर (आंतरिक) शुद्धि। साधारण स्नान से केवल चमड़ी, धूल-मिट्टी और बाहरी पसीने की निवृत्ति होती है, जिसे बाह्य शुद्धि कहा जाता है। परंतु जैसे ही व्यक्ति स्नानघर से निकलकर पूजा स्थल तक आता है, उसका मन सांसारिक चिंताओं, घर-परिवार के विचारों, क्रोध, लोभ या दैनिक कार्यों की उधेड़बुन में उलझ जाता है। मानसिक विकार और चंचल वृत्तियां आत्मा को मलिन कर देती हैं। पूजा के समय परमात्मा के साथ एकाकार होने के लिए चित्त का शांत और पवित्र होना जरूरी है। जल के छींटे शरीर की सूक्ष्म इंद्रियों को स्पर्श करके चेतना को यह संकेत देते हैं कि अब समस्त सांसारिक विचारों को त्यागकर पूरी तरह ईश्वरीय साधना में लीन होना है।
‘अपवित्रः पवित्रो वा’ मंत्र का महात्म्य और पुंडरीकाक्ष का ध्यान
पूजा के आरंभ में जब जल का छिड़काव किया जाता है, तो कर्मकांड में एक अत्यंत शक्तिशाली वैदिक मंत्र का उच्चारण किया जाता है:
“अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥”
इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य चाहे किसी भी अवस्था में हो—पवित्र हो अथवा अपवित्र, शुभ स्थिति में हो या अशुभ—जैसे ही वह कमल नयन भगवान विष्णु (पुंडरीकाक्ष) का स्मरण कर अपने ऊपर अभिमंत्रित जल का प्रोक्षण करता है, वह बाहर और भीतर दोनों से तत्काल परम पवित्र हो जाता है। यहां जल केवल पानी की बूंदें नहीं रह जाता, बल्कि वह भगवान नारायण के पावन स्मरण से अभिमंत्रित होकर ‘संस्कारित जल’ बन जाता है, जो साधक के सूक्ष्म शरीर (Aura) को शुद्ध कर देता है।
पंचतत्वों का संतुलन और नकारात्मक ऊर्जा का निवारण
वैज्ञानिक और प्राणिक ऊर्जा के दृष्टिकोण से देखें तो मानव शरीर पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) से बना है, जिसमें जल तत्व की प्रधानता सर्वाधिक होती है। जब हम पूजा वेदी पर बैठते हैं, तो आसपास के वातावरण में मौजूद विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएं हमारे आभामंडल को प्रभावित करती हैं। दूर्वा (घास) या तांबे के पात्र से जब तुलसी और गंगाजल मिश्रित जल का छिड़काव किया जाता है, तो जल के सूक्ष्म कण विद्युत-चुंबकीय तरंगों की तरह काम करते हैं। इससे व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा (Protective Energy Shield) तैयार हो जाता है, जो किसी भी नकारात्मक विचार या आसुरी प्रभाव को पूजा के दौरान मन में प्रवेश करने से रोकता है।
आचमन और पवित्रीकरण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
पूजा से ठीक पहले तीन बार आचमन करने (हथेली से जल पीने) और शिखा व मस्तक पर जल लगाने का सीधा संबंध तंत्रिका तंत्र से है। हाथ की हथेली के ‘ब्राह्म तीर्थ’ से जब जल गले से नीचे उतरता है, तो वह कंठ की ग्रंथियों को सक्रिय करता है और सुषुम्ना नाड़ी को जागृत करता है। मस्तक और चेहरे पर जल छिड़कने से चेहरे की नसें शांत होती हैं, रक्तचाप नियंत्रित होता है और मस्तिष्क में अल्फा तरंगें सक्रिय होती हैं, जिससे ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने पूजा से पहले पवित्र जल के मार्जन को एक अनिवार्य धार्मिक नियम बनाया ताकि भक्त का संपूर्ण अस्तित्व एकाग्र होकर प्रभु आराधना में समर्पित हो सके।
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