गोरखपुर से बनारस जाने वालों को रेलवे देगा बड़ा तोहफा, जल्द दौड़ेगी नॉन-स्टॉप मेमू; महज 4.5 घंटे में पूरा होगा सफर

पूर्वांचल के दो प्रमुख धार्मिक, व्यापारिक और शैक्षणिक केंद्रों—गोरखपुर और वाराणसी—के बीच दैनिक सफर करने वाले हजारों यात्रियों के लिए भारतीय रेलवे की ओर से बड़ी खुशखबरी सामने आई है। पूर्वोत्तर रेलवे (NER) के वाराणसी मंडल ने बनारस सिटी से गोरखपुर के बीच एक विशेष ‘नॉन-स्टॉप मेमू’ (Mainline Electric Multiple Unit – MEMU) ट्रेन चलाने का औपचारिक प्रस्ताव गोरखपुर स्थित जोन मुख्यालय को भेजा है। वर्तमान में इस व्यस्त रेलखंड पर ऐसी कोई ट्रेन उपलब्ध नहीं है, जिससे कोई यात्री सुबह गोरखपुर से चलकर बनारस पहुंचे, दिनभर अपने काम निपटाए और उसी रात वापस अपने घर लौट सके। इस बहुप्रतीक्षित नॉन-स्टॉप मेमू के संचालन से दोनों शहरों के बीच की लगभग 230 किलोमीटर की दूरी महज साढ़े चार घंटे में तय हो सकेगी, जिससे यात्रियों के समय और धन दोनों की भारी बचत होगी।

साढ़े चार घंटे में सफर पूरा: वाराणसी मंडल के प्रस्ताव पर मुख्यालय कर रहा विचार

वाराणसी मंडल द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव पर पूर्वोत्तर रेलवे का जोनल मुख्यालय गंभीरता से विचार कर रहा है। मुख्यालय ने परिचालन की व्यावहारिकता को परखने के लिए मंडल से इस रूट पर यात्रियों के दैनिक दबाव, वर्तमान ट्रेनों की ऑक्यूपेंसी, टाइम-टेबल स्लॉट और ट्रैक क्षमता से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। चूंकि यह ट्रेन रास्ते के छोटे स्टेशनों पर रुकने के बजाय नॉन-स्टॉप रफ्तार से चलेगी, इसलिए यह एक्सप्रेस ट्रेनों की तुलना में भी कम समय लेगी।

वर्तमान में गोरखपुर-वाराणसी रूट पर चलने वाली नियमित एक्सप्रेस और इंटरसिटी ट्रेनों को यह दूरी तय करने में अमूमन 5 से साढ़े 5 घंटे का समय लग जाता है। नॉन-स्टॉप मेमू का त्वरित एक्सेलेरेशन और डी-एक्सेलेरेशन इसे मात्र 4 घंटे 30 मिनट में अपने गंतव्य तक पहुंचा देगा, जिससे सुबह यात्रा शुरू करने वाले कामकाजी लोग, व्यापारी, छात्र और मरीज दोपहर तक बनारस पहुंच सकेंगे।

दक्षिण रेलवे के गुंटूर मॉडल की तर्ज पर तैयार हुई योजना

पूर्वोत्तर रेलवे ने इस नॉन-स्टॉप मेमू का खाका दक्षिण भारत में सफलतापूर्वक चल रहे एक मॉडल के आधार पर तैयार किया है। वर्तमान में दक्षिण रेलवे (Southern Railway) के तहत गुंटूर रेलखंड पर लगभग 190 किलोमीटर की दूरी के लिए बिना किसी ठहराव के नॉन-स्टॉप मेमू ट्रेन संचालित की जाती है, जो इस दूरी को महज 4 घंटे में पूरा कर लेती है। दक्षिण भारत में दैनिक यात्रियों, व्यापारियों और वकीलों के बीच यह सेवा बेहद लोकप्रिय और आर्थिक रूप से सफल साबित हुई है। इसी मॉडल को अपनाते हुए वाराणसी मंडल ने गोरखपुर-बनारस रेलखंड पर इस सेवा को लागू करने की पहल की है, ताकि लंबी दूरी की पैसेंजर ट्रेनों में लगने वाली भारी भीड़ और अनावश्यक देरी से निजात मिल सके।

वर्तमान में चल रहीं 6 ट्रेनें, लेकिन ‘सेम-डे रिटर्न’ का था अभाव

गोरखपुर और वाराणसी के बीच वर्तमान में गोरखनाथ, चौरीचौरा एक्सप्रेस, बनारस इंटरसिटी और कृषक एक्सप्रेस समेत करीब आधा दर्जन ट्रेनें संचालित होती हैं। हालांकि, इन सभी ट्रेनों की समय सारिणी ऐसी है कि गोरखपुर से सुबह रवाना होकर बनारस में काम निपटाने के बाद उसी दिन देर रात तक गोरखपुर लौटना मुसाफिरों के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता है।

इस कमी के चलते काशी विश्वनाथ मंदिर, काल भैरव और संकट मोचन के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और कबीरचौरा अस्पताल में इलाज के लिए जाने वाले मरीजों और बनारस के साड़ी व थोक कपड़ा बाजार से जुड़े कारोबारियों को मजबूरी में बनारस में रात का ठहराव करना पड़ता है, जिससे उनकी यात्रा काफी खर्चीली हो जाती है। नॉन-स्टॉप मेमू सेवा शुरू होने से इन सभी वर्गों को ‘उसी दिन वापसी’ (Same-Day Return) की सबसे बड़ी सहूलियत हासिल होगी।

1995 से शुरू हुआ मेमू का सफर, अब आधुनिक अवतार में भरेगी रफ्तार

मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट यानी मेमू ट्रेनों का इतिहास भारतीय रेल में तीन दशक पुराना है। देश में पहली बार मेमू ट्रेन का परिचालन वर्ष 1995 में आसनसोल-आद्रा खंड और खड़गपुर-टाटा खंड के बीच शुरू किया गया था। ओवरहेड बिजली तारों (OHE) से सीधे ऊर्जा लेकर चलने वाली इन ट्रेनों में दोनों तरफ ड्राइविंग कैब होती है, जिससे इंजन बदलने में समय बर्बाद नहीं होता।

आधुनिक 3-फेज मेमू रेक में आरामदायक सीटें, एलईडी डिस्प्ले, बायो-टॉयलेट्स, सीसीटीवी कैमरे और रीजेनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि मुख्यालय से हरी झंडी और रेलवे बोर्ड की अंतिम मंजूरी मिलते ही रैक आवंटन और समय-सारिणी (टाइम टेबल) की आधिकारिक घोषणा कर दी जाएगी।

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