CJP ने मुंबई में बुलाई थी ‘लहराओ तिरंगा’ रैली, 50 समर्थक भी नहीं पहुंचे; आजाद मैदान में प्रदर्शनकारी नदारद, क्या शुरू हुआ युवाओं का मोहभंग?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर अभियान चला रही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को मुंबई में बड़ा झटका लगा है। दिल्ली में तिहाड़ जेल में बंद अपने संस्थापक नेताओं आशुतोष रांका और सौरभ दास की गिरफ्तारी के विरोध में CJP ने शुक्रवार को मुंबई के ऐतिहासिक आजाद मैदान में ‘लहराओ तिरंगा’ मार्च और रैली का आह्वान किया था। जहां दिल्ली में प्रशासन ने धारा 163 लगाकर प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी, वहीं मुंबई पुलिस ने आजाद मैदान में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन की औपचारिक मंजूरी दी थी। हालांकि, पुलिस की खुली छूट के बावजूद रैली पूरी तरह से बेअसर और फीकी साबित हुई। पूरे मैदान में 50 लोग भी इकट्ठा नहीं हो सके, जिसके बाद राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं कि क्या CJP के जमीनी आंदोलन और उसकी कार्यशैली से युवाओं का मोहभंग होने लगा है?

प्रदर्शनकारियों से दस गुना ज्यादा थी पुलिस, दोपहर 3 बजे तक मैदान रहा वीरान

मुंबई के आजाद मैदान और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) मेट्रो स्टेशन के आसपास किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए मुंबई पुलिस ने कड़े सुरक्षा बंदोबस्त किए थे।

  • भारी पुलिस बल: कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर लगभग 500 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

  • दोपहर तक सन्नाटा: अनुमति सुबह 10 बजे से थी, लेकिन दोपहर 3 बजे तक मैदान में सन्नाटा पसरा रहा। दोपहर बाद कुछ युवा हाथों में तिरंगा लिए पहुंचे, लेकिन उनकी कुल संख्या 40 से 50 से अधिक नहीं पहुंच पाई।

  • शाम होते ही खाली हुआ मैदान: शाम 5 बजे की समय सीमा समाप्त होते ही बचे-खुचे लोग भी वहां से निकल गए और मैदान पूरी तरह खाली हो गया।

न दिशा, न रणनीति: मौके से CJP के बड़े नेता भी रहे नदारद

प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे इक्का-दुक्का कार्यकर्ताओं और छात्रों ने संगठन के शीर्ष नेतृत्व और समन्वय पर अपनी भड़ास निकाली। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े कैंपेन चलाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस योजना नहीं है।

  • मुंबई कोऑर्डिनेटर तक गायब: हैरानी की बात यह रही कि मुंबई में रैली की कमान संभालने वाले CJP के स्थानीय कोऑर्डिनेटर प्रणव अहीरे भी खुद आजाद मैदान में मौजूद नहीं थे।

  • सूचना का अभाव: प्रदर्शन में शामिल होने आए छात्रों ने बताया कि रैली का आधिकारिक संदेश इतनी देर से जारी किया गया कि लोगों को यह तक स्पष्ट नहीं था कि आजाद मैदान के किस गेट पर पहुंचना है और विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा क्या होगी।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का खौफ या मुद्दों को लेकर असमंजस?

मुंबई में रहने वाले कार्यकर्ताओं ने माना कि दिल्ली में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई सख्त कानूनी कार्रवाइयों और प्रमुख चेहरों (अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका) की गिरफ्तारी के बाद कई युवाओं में डिटेंशन का डर बैठ गया है। लोगों को आशंका थी कि मुंबई पुलिस भी दिल्ली की तरह सख्त रवैया अपना सकती है, जिसके चलते लोग घरों से नहीं निकले।

वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया पर मीम्स, हैशटैग और डिजिटल एक्टिविज्म के जरिए माहौल बनाना आसान होता है, लेकिन जब बात सड़क पर उतरकर एक स्पष्ट राजनीतिक या संवैधानिक लड़ाई लड़ने की आती है, तो बिना सांगठनिक ढांचे के आंदोलन बिखरने लगता है। इसके अलावा, हाल के दिनों में नेहा बोरा के बयानों और शीर्ष नेताओं के बीच आपसी खींचतान के चलते भी समर्थकों के बीच भ्रम की स्थिति बनी है।

‘इंडिया’ गठबंधन के समर्थन के बावजूद भीड़ जुटाने में नाकामी

CJP के आंदोलन को कांग्रेस, वामपंथी छात्र संगठनों (AISA, SFI) और ‘इंडिया’ गठबंधन के कई दलों का नैतिक समर्थन प्राप्त है। इसके बावजूद देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में, जहां किसी भी राजनीतिक मुद्दे पर हजारों लोग जुटते हैं, 50 की संख्या भी पार न कर पाना इस बात का संकेत है कि युवाओं का शुरुआती आकर्षण अब धीमा पड़ता दिख रहा है। नेतृत्वहीनता और स्पष्ट संदेश के अभाव में CJP की यह ‘तिरंगा रैली’ आंदोलन के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर गई है।

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