
लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा उपाय और निर्वाचित विधानसभा की मांग को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई अहम बातचीत बेनतीजा समाप्त हो गई है। दोनों पक्षों के बीच सहमति न बनने और रुख में बड़ा अंतर सामने आने के बाद मशहूर पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का गुस्सा फूट पड़ा है। एक वीडियो संदेश जारी कर वांगचुक ने केंद्र सरकार पर सीधे तौर पर ‘वादाखिलाफी’ का आरोप लगाया। उन्होंने प्राचीन भारतीय मूल्यों का हवाला देते हुए सरकार से तीखा सवाल किया कि “यह कैसा राम राज्य है, जहां दिए गए वचनों को ही भुला दिया जाता है?” इस दौरान उन्होंने लद्दाख के मुद्दे पर चीन की बयानबाजी को खारिज करते हुए आईना दिखाया, लेकिन दिल्ली में हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता अभिजीत दीपके के मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की।
‘प्राण जाए पर वचन न जाए का आदर्श कहां गया?’: गृह मंत्रालय से बातचीत फेल होने पर वांगचुक
सोनम वांगचुक ने बताया कि लद्दाख के प्रतिनिधियों को उम्मीद थी कि वार्ता के दौरान कुछ छोटे-मोटे मतभेदों का समाधान निकाल लिया जाएगा, लेकिन केंद्र सरकार और प्रतिनिधियों के बीच का फासला अप्रत्याशित रूप से बहुत बड़ा निकला।
वांगचुक ने आरोप लगाया कि:
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विधानसभा के अधिकारों पर असहमति: गृह मंत्रालय के साथ बातचीत में सबसे बड़ा विवाद प्रस्तावित निर्वाचित विधानसभा के अधिकारों को लेकर रहा। वांगचुक के अनुसार, मई में हुई बातचीत में प्रशासनिक तंत्र और मुख्य सचिव को चुनी हुई विधानसभा के अधीन रखने का भरोसा दिया गया था, लेकिन अब सरकार कह रही है कि विधानसभा का दायरा सीमित होगा और मुख्य सचिव उसके अधीन नहीं होंगे।
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अनुच्छेद 371 से मुकरने का आरोप: वांगचुक ने दावा किया कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 371 के तहत विशेष सुरक्षा उपाय देने के अपने वादे से भी पीछे हट गई है।
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राम राज्य पर सवाल: वांगचुक ने कहा, “हम किस राम राज्य की बात कर रहे हैं? वह आदर्श कहां चला गया कि रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई? जब देश के लिए हर युद्ध में सीमा पर खड़े रहने वाले लद्दाखियों के साथ ऐसा सलूक होगा, तो लोग कहां जाएंगे?”
‘चीन को कोई हक नहीं, तिब्बत है हमारा पड़ोसी’: बीजिंग को दो टूक जवाब
लद्दाख के रणनीतिक महत्व और सीमा विवाद को लेकर चीन द्वारा की गई हालिया टिप्पणियों पर भी सोनम वांगचुक ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि लद्दाख को लेकर चीन की बयानबाजी को किसी भी तरह की विश्वसनीयता नहीं दी जानी चाहिए।
वांगचुक ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
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लद्दाख के लोग और उनके नेता चीन के इस तरह के बयानों की पहले ही कड़ी निंदा कर चुके हैं।
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लद्दाख भारत का अभिन्न अंग है, वहां के नागरिक भारत के साथ खुश हैं और आगे भी देश के साथ ही मजबूती से खड़े रहेंगे।
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चीन को भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने से पहले तिब्बत को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भारत का वास्तविक पड़ोसी देश तिब्बत रहा है, चीन नहीं।
उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि विडंबना यह है कि लद्दाखियों द्वारा चीन की बयानबाजी की निंदा करने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें अपने ही देश के गृह मंत्रालय में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए निराशा का सामना करना पड़ा।
अभिजीत दीपके की गिरफ्तारी पर क्यों साधी चुप्पी?
राजनीतिक और छात्र गलियारों में इस बात की भी खासी चर्चा रही कि दिल्ली में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए CJP संस्थापक अभिजीत दीपके पर सोनम वांगचुक ने कोई बयान नहीं दिया।
विश्लेषकों के मुताबिक, इस चुप्पी के पीछे मुख्य वजहें हैं:
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आंदोलन को अराजनीतिक रखना: सोनम वांगचुक शुरुआत से ही यह दोहराते रहे हैं कि लद्दाख का आंदोलन पूरी तरह से गैर-राजनीतिक और क्षेत्रीय हितों पर केंद्रित है। वे इसे किसी राष्ट्रीय राजनीतिक विवाद या अन्य दलों के एजेंडे से जोड़ने से बचते रहे हैं।
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स्थानीय प्राथमिकताओं पर फोकस: वांगचुक का पूरा ध्यान इस समय लद्दाख की संवैधानिक सुरक्षा, पर्यावरण और छठी अनुसूची को लेकर केंद्र से चल रही वार्ता पर केंद्रित है, जिसके चलते उन्होंने दिल्ली के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों से दूरी बनाए रखी है।
लद्दाख के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच बातचीत के इस दौर के बेनतीजा रहने के बाद अब सीमांत क्षेत्र में एक बार फिर असंतोष और विरोध प्रदर्शन तेज होने की आशंका जताई जा रही है।
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