
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच चल रहा गतिरोध अब और अधिक तीखा हो गया है। दिल्ली में हिरासत में लिए गए छात्र नेता अभिजीत दीपके और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के आंदोलन को अब दक्षिण भारत के बड़े राजनीतिक दल द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) का सीधा और औपचारिक समर्थन मिल गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग की है। इसके लिए स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात का औपचारिक समय मांगा है, जहां वे विपक्षी प्रतिनिधिमंडल के साथ ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक विस्तृत ज्ञापन और शिकायत पत्र सौंपेंगे।
चेन्नई में बैठक के बाद स्टालिन का बड़ा ऐलान: CJP के मुद्दों को मिला क्षेत्रीय दलों का बल
चेन्नई स्थित पार्टी मुख्यालय ‘अन्ना अरिवालयम’ में डीएमके सांसदों की आपात बैठक के बाद पार्टी ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपने तेवर कड़े कर दिए हैं। स्टालिन ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के राजनीतिक दुरुपयोग के खिलाफ युवाओं और छात्रों द्वारा छेड़ा गया आंदोलन अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा।
डीएमके के इस कदम की मुख्य बातें:
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संवैधानिक मर्यादा का सवाल: स्टालिन ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष अंपायर की भूमिका निभाने के बजाय एकतरफा काम कर रहा है।
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राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग: संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया का हवाला देते हुए डीएमके राष्ट्रपति से इस मामले में संज्ञान लेने और निष्पक्ष जांच कराने की मांग करेगी।
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अभिजीत दीपके पर कार्रवाई का विरोध: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और CJP नेताओं (अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरभ दास) के खिलाफ दर्ज मुकदमों और पुलिसिया कार्रवाई को असंवैधानिक करार देते हुए डीएमके ने उनकी तुरंत रिहाई की मांग का समर्थन किया है।
किन आरोपों को लेकर निशाने पर हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार?
डीएमके और विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ने ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल को लेकर कई गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं:
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SIR प्रक्रिया में विसंगतियां: विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर लक्षित तरीके से वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने का अंदेशा है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
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20 महीनों में बड़े पैमाने पर तबादले: ज्ञानेश कुमार के 20 महीने के कार्यकाल के दौरान राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 20 मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) को बदला गया, जिसे प्रशासनिक स्थिरता और चुनावी निष्पक्षता के खिलाफ बताया जा रहा है।
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विपक्षी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार: हाल ही में जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ज्ञापन सौंपने पहुंचा था, तो प्रशासनिक आधार पर हुई बेरुखी को लेकर भी विपक्षी दल नाराज हैं।
परिसीमन और दक्षिण की आशंकाओं के बीच नई राजनीतिक गोलबंदी
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डीएमके द्वारा CJP के आंदोलन का समर्थन करना केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसद के संभावित विशेष सत्र और परिसीमन (Delimitation) बिल को लेकर बनाई जा रही व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
तमिलनाडु सरकार लंबे समय से यह चिंता जता रही है कि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में जनसंख्या नियंत्रण के मानकों को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों का अनुपात कम हो सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर डीएमके केंद्र सरकार पर दोहरा नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।
क्या कहता है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का संवैधानिक नियम?
भारतीय संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना बेहद जटिल प्रक्रिया है। संविधान के अनुच्छेद 324 के प्रावधानों के मुताबिक:
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मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी आधार और उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है (यानी संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करके)।
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हालांकि, राष्ट्रपति को सौंपे जाने वाले ज्ञापन के जरिए विपक्षी दल इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी निगरानी के केंद्र में लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
राष्ट्रपति भवन से समय मिलने के बाद एमके स्टालिन के नेतृत्व में विपक्षी दलों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल दिल्ली जाकर राष्ट्रपति को अपनी शिकायतें सौंपेगा, जिसके बाद इस राजनीतिक विवाद के और तेज होने के पूरे आसार हैं।
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