
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में विजयादशमी यानी दशहरे के समापन के बाद पड़ने वाली एकादशी को सनातन परंपरा में ‘पापांकुशा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। सामान्यतः जनमानस में यह धारणा रहती है कि दशमी तिथि के अगले ही दिन एकादशी का उपवास रखा जाता है। लेकिन इस वर्ष तिथियों की खगोलीय गणना और सूर्योदयकालीन उदयातिथि के सिद्धांत के कारण कई श्रद्धालुओं के मन में तारीख को लेकर गहरा असमंजस बना हुआ है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, दशहरे के तुरंत अगले दिन एकादशी का व्रत नहीं रखा जाएगा। धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश है कि एकादशी का उपवास हमेशा सूर्योदय व्यापिनी शुद्ध तिथि और वैष्णव नियमों के आधार पर ही मान्य होता है। यदि आप भी जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की कृपा पाने के लिए पापांकुशा एकादशी का पावन व्रत रखने की तैयारी कर रहे हैं, तो सही तिथि और पारण के समय की सटीक जानकारी होना अनिवार्य है।
पापांकुशा एकादशी 2026: कब शुरू और समाप्त होगी तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रवेश 21 अक्टूबर 2026 (बुधवार) को दोपहर 02 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है। यह एकादशी तिथि अगले दिन यानी 22 अक्टूबर 2026 (गुरुवार) को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट तक प्रभावी रहेगी।
स्मृति ग्रंथों और धर्मसिंधु के नियमों के मुताबिक, जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान होती है, उसी दिन गृहस्थों और वैष्णवों द्वारा उपवास का संकल्प लिया जाता है। 21 अक्टूबर को सूर्योदय के समय दशमी तिथि मौजूद रहेगी और एकादशी दोपहर बाद लगेगी, जिसे शास्त्रों में ‘विद्धा एकादशी’ कहा जाता है और इसका उपवास करना वर्जित माना गया है। वहीं, 22 अक्टूबर को सूर्योदय एकादशी तिथि में होगा, जिससे यह पूर्णतया शुद्ध और फलदायी उदयातिथि बन रही है। अतः पापांकुशा एकादशी का निर्जला या फलाहार व्रत 22 अक्टूबर 2026 (गुरुवार) को ही रखा जाएगा।
पापांकुशा एकादशी व्रत का शुभ मुहूर्त और पारण का समय
एकादशी व्रत का संपूर्ण पुण्य फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर और हरि वासर समाप्त होने के बाद शास्त्रसम्मत समय पर किया जाए।
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एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 अक्टूबर 2026, दोपहर 02:11 बजे
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एकादशी तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2026, दोपहर 03:44 बजे
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पापांकुशा एकादशी व्रत दिवस: 22 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)
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व्रत पारण का शुभ समय (द्वादशी तिथि): 23 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार), प्रात: 06:28 बजे से सुबह 08:44 बजे तक
(पारण के दिन सुबह स्नानादि के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें, किसी सुपात्र ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न-जल और दक्षिणा भेंट करें और फिर तुलसी दल युक्त जल या सात्विक भोजन से व्रत खोलें।)
क्यों खास है पापांकुशा एकादशी: अंकुश की तरह कट जाते हैं पाप
पद्म पुराण में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को पापांकुशा एकादशी की महिमा बताते हुए कहा है कि यह एकादशी मनुष्य के समस्त संचित पापों को उसी प्रकार नियंत्रित और नष्ट कर देती है, जैसे महावत का एक छोटा सा ‘अंकुश’ मतवाले और विशाल हाथी को वश में कर लेता है। इसी कारण इसे ‘पाप-अंकुश’ यानी पापांकुशा कहा गया है।
मान्यता है कि जो जातक इस पावन दिन पर सोने, तिल, जल, अन्न, छत्र (छाता) या पादुका (जूते-चप्पल) का दान करता है, उसे यमराज के दूतों का भय कभी नहीं सताता। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के मातृ पक्ष, पितृ पक्ष और ससुराल पक्ष की कई पीढ़ियों के पितरों को सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो लोग कठोर तपस्या या तीर्थ यात्राएं करने में असमर्थ हैं, वे केवल इस एक एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर वाजपेय और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य अर्जित कर सकते हैं।
पापांकुशा एकादशी की सरल एवं शास्त्रसम्मत पूजा विधि
इस दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें या घर में ही नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर सूर्यदेव को अर्घ्य दें और व्रत का संकल्प लें।
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चौकी स्थापना: पूजा घर में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप अथवा शयन मुद्रा वाले पद्मनाभ स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
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पंचामृत अभिषेक: भगवान शालिग्राम या विष्णु जी की मूर्ति को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं।
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पीले उपचार: श्रीहरि को पीले चंदन, अक्षत, पीले गेंदे के फूल और तुलसी दल की माला अर्पित करें। ध्यान रखें कि भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है।
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धूप-दीप व नैवेद्य: गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। मौसमी फल जैसे सिंघाड़ा, केला, पपीता और घर में बने बेसन के लड्डू या खीर का भोग लगाएं।
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मंत्र जाप: पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा “ॐ विष्णवे नमः” का कम से कम 108 बार तुलसी की माला से जाप करें।
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कथा व आरती: दिन के समय पापांकुशा एकादशी की पावन व्रत कथा सुनें या पढ़ें और शाम को सपरिवार कपूर से आरती उतारें। रात्रि में जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करना विशेष फलदायी माना जाता है।
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