
उत्तर प्रदेश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने अपनी सक्रियता अचानक उन इलाकों में तेज कर दी है, जिन्हें पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर रुहेलखंड और पूर्वांचल तक—मुरादाबाद, संभल, रामपुर, आजमगढ़, मऊ और मेरठ जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ओवैसी की लगातार हो रही रैलियां और जनसभाएं किसी संयोग का हिस्सा नहीं हैं। राजनीतिक रणनीतिकारों के अनुसार, एआईएमआईएम ने जानबूझकर उन विधानसभा और संसदीय क्षेत्रों को चुना है जहां मुस्लिम आबादी 30 से 50 प्रतिशत के बीच है और जहां सपा लंबे समय से एकतरफा जीत दर्ज करती आई है। ओवैसी का यह सीधा दखल राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा के कोर वोट बैंक में सीधी सेंधमारी की स्पष्ट कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
‘हिस्सेदारी बनाम वोट बैंक’: अखिलेश यादव पर तीखे हमलों से गरमाया सियासी माहौल
सभाओं के मंच से असदुद्दीन ओवैसी का भाषण सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व और अखिलेश यादव को कटघरे में खड़ा कर रहा है। ओवैसी अपने भाषणों में लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि मुसलमानों ने दशकों तक सपा को एकतरफा वोट देकर सत्ता तक पहुँचाया, लेकिन जब समुदाय के हक, सुरक्षा या राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात आती है, तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खामोश रहता है। वे इसे ‘वोट बैंक की सियासत’ बनाम ‘सच्ची राजनीतिक हिस्सेदारी’ की लड़ाई बता रहे हैं। ओवैसी का यह आक्रामक नैरेटिव विशेष रूप से मुस्लिम युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है, जो मुख्यधारा की पार्टियों में अपनी अनदेखी महसूस करते हैं। यह सीधे तौर पर अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की सबसे मजबूत कड़ी यानी ‘अल्पसंख्यक’ आधार पर प्रहार है।
क्या अखिलेश यादव के लिए सचमुच बड़ा खतरा बन सकती है AIMIM?
इस सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के विश्लेषण में छिपा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी एआईएमआईएम ने करीब 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन पार्टी को कुल वोट शेयर का एक प्रतिशत भी हासिल नहीं हो सका था और अधिकांश सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उस वक्त अल्पसंख्यक मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए पूरी तरह सपा गठबंधन के पक्ष में रणनीतिक और एकजुट मतदान (Tactical Voting) किया था।
हालांकि, मौजूदा परिदृश्य में दो प्रमुख बातें अखिलेश यादव के लिए चिंता का सबब बन सकती हैं:
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त्रिकोणीय मुकाबले का नुकसान: कड़े मुकाबले वाली सीटों पर अगर एआईएमआईएम उम्मीदवार 5,000 से 15,000 वोट भी हासिल कर लेता है, तो यह सीधा नुकसान सपा प्रत्याशी को होता है और इसका सीधा फायदा सीधे तौर पर भाजपा को मिल जाता है।
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स्थानीय कद्दावर नेताओं की नाराजगी: कई सीटों पर सपा के टिकट से वंचित या स्थानीय स्तर पर नाराज प्रभावशाली मुस्लिम चेहरों को ओवैसी अपने पाले में लाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में सफल हो सकते हैं।
वोटों के बिखराव का डर और सपा की जवाबी रणनीति
सपा नेतृत्व ओवैसी की इन गतिविधियों को लेकर पूरी तरह सतर्क है। समाजवादी पार्टी के नेता सार्वजनिक मंचों पर एआईएमआईएम पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी की मदद करने के लिए चुनावी मैदान में उतरती है, ताकि धर्मनिरपेक्ष वोटों का विभाजन किया जा सके। अखिलेश यादव जमीनी स्तर पर मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और सामाजिक प्रभावशाली लोगों, उलेमाओं और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं ताकि यह संदेश दिया जा सके कि वोट बंटने से केवल और केवल सत्ताधारी दल को ही चुनावी बढ़त मिलेगी।
कुल मिलाकर, ओवैसी भले ही यूपी में अपने दम पर दर्जनों सीटें जीतने की स्थिति में न दिखें, लेकिन सपा के मजबूत किलों में उनकी रैलियां और बढ़ता प्रभाव अखिलेश यादव के चुनावी गणित को उलझाने और कई संवेदनशील सीटों पर नतीजों का रुख पलटने की पूरी ताकत रखता है।
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