RSS प्रमुख मोहन भागवत का ‘रिजिम चेंज’ पर बड़ा प्रहार, बोले- ‘सत्ता के स्वार्थी कर रहे देशद्रोहियों की मदद’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वार्षिक विजयादशमी उत्सव के मंच से सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने को लेकर बेहद गंभीर और बड़ा बयान दिया है। महाराष्ट्र के नागपुर स्थित रेशिमबाग मैदान में आयोजित संघ के शताब्दी वर्ष के ऐतिहासिक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया में ऐसी कई विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैं जो भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और तेज विकास से घबराई हुई हैं। ये ताकतें सीधे मुकाबले में असमर्थ होने के कारण अब देश के भीतर अस्थिरता फैलाने और ‘रिजिम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन के हिंसक हथकंडे) की रणनीति पर काम कर रही हैं। संघ प्रमुख ने कड़े लहजे में आगाह किया कि जो लोग भारत को खंडित और कमजोर देखना चाहते हैं, दुर्भाग्य से अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए देश के कुछ सत्ता के स्वार्थी तत्व भी उनकी कठपुतली बनकर उनका साथ देने से नहीं हिचकिचा रहे हैं।

आंदोलनों की आड़ में अराजकता फैलाने की साजिश: ‘समस्या का हल हो, न कि समाज में नफरत’

डॉ. मोहन भागवत ने अपने संबोधन में देश के अलग-अलग हिस्सों में उभरने वाले हिंसक विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों की प्रकृति पर तीखा विश्लेषण पेश किया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्याओं को लेकर आंदोलन होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी जन-आंदोलन का अंतिम उद्देश्य समस्या का समाधान निकालना होना चाहिए, न कि अखंड समाज में नफरत, अविश्वास और विभाजन के बीज बोना। उन्होंने चेताया कि कई बार बाहरी और राष्ट्रविरोधी ताकतों द्वारा इन प्रदर्शनों को हाईजैक कर लिया जाता है और वे केवल राजनीति चमकाने तथा हिंसा भड़काने का जरिया बनकर रह जाते हैं। संघ प्रमुख ने बांग्लादेश, पश्चिम एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों में हुए हालिया राजनीतिक उथल-पुथल का परोक्ष संदर्भ देते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन से कभी भी बुनियादी परिस्थितियों में सुधार नहीं आता, बल्कि यह भ्रम फैलाकर केवल अपने पिट्ठू लोगों को सत्ता में बैठाने का पश्चिमी खेल है।

जातियों और वर्गों में समाज को बांटने का खेल: संकीर्ण स्वार्थ में फंसी राजनीति पर बरसे संघ प्रमुख

देश की आंतरिक राजनीति के तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए भागवत ने कहा कि जब चुनावी फायदे के लिए समाज को जाति, भाषा, प्रांत और धर्म के आधार पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया जाता है, तो इससे सीधे तौर पर भारत विरोधी ताकतों के मंसूबे पूरे होते हैं। उन्होंने कहा कि सत्ता हासिल करना किसी भी राजनीतिक दल का लक्ष्य हो सकता है, लेकिन राष्ट्रहित की कीमत पर सत्ता की भूख देश के लिए सबसे बड़ा आत्मघाती कदम है। इतिहास का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया था, तो जनता की एकजुटता ने उसे वापस लेने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन 1947 में विभाजन इसलिए नहीं रुका क्योंकि समाज के एक हिस्से के मन में अलगाव की भावना घर कर गई थी। आज एक बार फिर ‘डीप स्टेट’ और सांस्कृतिक मार्क्सवाद जैसी विचारधाराएं हमारी जड़ों पर हमला कर रही हैं और स्वार्थी राजनेता उनकी मदद कर रहे हैं।

टेक्नोलॉजी, पर्यावरण और वैश्विक नेतृत्व: भारत की दृष्टि में ही दुनिया का समाधान

आरएसएस प्रमुख ने केवल आंतरिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौतियों पर भी भारत की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच का खाका प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, आर्थिक असमानता और हिंसक टकरावों से जूझ रही है, तब पश्चिमी मॉडल पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। भारत का सनातन दर्शन विकास का ऐसा प्रारूप देता है जिसमें अर्थव्यवस्था (Economy), पर्यावरण (Ecology) और नैतिकता (Ethics) तीनों का संतुलन होता है। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक के अंधाधुंध इस्तेमाल पर भी चेतावनी देते हुए कहा कि तकनीक का विकास होना चाहिए, लेकिन इसके विवेकपूर्ण और नैतिक उपयोग की समझ भी विकसित करनी होगी ताकि मानवीय संवेदनाएं बची रहें।

आत्मनिर्भर और एकजुट समाज ही बनेगा भारत की ढाल

संबोधन के अंत में डॉ. भागवत ने देश के नागरिकों से अपने छोटे-छोटे अहंकार, व्यक्तिगत मतभेद और जातिगत सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बंधने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब तक समाज स्वयं जागरूक, संगठित और सक्रिय नहीं होगा, तब तक केवल कानून या नेताओं के भरोसे देश को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। जो ताकतें भारत को तोड़ने का सपना देख रही हैं, उनका मुकाबला केवल हथियारों से नहीं बल्कि सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और देशप्रेम की अटूट दीवार से ही किया जा सकता है। नागपुर के इस ऐतिहासिक संबोधन को देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिहाज से एक निर्णायक वैचारिक दिशा माना जा रहा है।

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