
मानव शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) बाहरी तत्वों, वायरस और बैक्टीरिया से शरीर की रक्षा के लिए एंटीबॉडीज तैयार करता है। जब किसी मरीज को असंगत (इनकम्पैटिबल) यानी गलत ब्लड ग्रुप का खून चढ़ा दिया जाता है, तो शरीर उस नए खून को जीवन रक्षक मानने के बजाय खतरनाक विदेशी हमलावर समझ लेता है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में एक्यूट हेमोलिटिक ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन (AHTR) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि ब्लड ग्रुप ‘A’ वाले व्यक्ति को ‘B’ ग्रुप का खून चढ़ा दिया जाए, तो मरीज के शरीर में पहले से मौजूद एंटी-B एंटीबॉडीज उस नए खून की लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) पर तुरंत हमला बोल देती हैं। यह प्रक्रिया खून चढ़ना शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर शरीर में एक बड़े रासायनिक और जैविक संकट को जन्म दे देती है।
लाल रक्त कोशिकाओं का टूटना: नसों में क्लॉटिंग और गिरता ब्लड प्रेशर
इम्यून सिस्टम के इस भयंकर हमले के कारण चढ़ाई गई नई लाल रक्त कोशिकाएं खून की नलियों के भीतर ही तेजी से फटने (लाइसिस) लगती हैं। कोशिकाओं के बड़े पैमाने पर फटने से उनके अंदर मौजूद हीमोग्लोबिन और अन्य टॉक्सिक तत्व सीधे रक्तप्रवाह में बहने लगते हैं। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप शरीर में अनियंत्रित रूप से खून के थक्के जमने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसे ‘डिसएमिनेटेड इंट्रावास्कुलर कोएगुलेशन’ (DIC) कहा जाता है। एक तरफ जहां बारीक धमनियों में छोटे-छोटे थक्के बनने से महत्वपूर्ण अंगों में रक्त संचार बाधित होता है, वहीं दूसरी तरफ मरीज का ब्लड प्रेशर अचानक खतरनाक स्तर तक नीचे गिर जाता है, जिससे मरीज हाइपोवोलेमिक या एनाफिलेक्टिक शॉक की स्थिति में पहुंच जाता है।
शुरुआती लक्षण: बेचैनी से लेकर पीठ और सीने में तेज दर्द
गलत खून चढ़ते ही मरीज का शरीर तत्काल चेतावनी संकेत देने लगता है। शुरुआती 10 से 15 मिनट के भीतर मरीज को तेज कंपकंपी के साथ तेज बुखार, अत्यधिक पसीना, त्वचा पर लाल चकत्ते (पित्ती) और घबराहट महसूस होने लगती है। इसका सबसे स्पष्ट और क्लासिक लक्षण मरीज की पीठ के निचले हिस्से (कमर) और सीने में अचानक असहनीय दर्द उठना है। इसके साथ ही सांस लेने में भारी तकलीफ, दिल की धड़कनों का बहुत तेज होना और सिर में तेज भारीपन महसूस होता है। यदि मरीज पहले से बेहोश या सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया में है, तो उसके ब्लड प्रेशर में तेज गिरावट और यूरिनरी कैथेटर में लाल रंग का पेशाब आना डॉक्टरों के लिए इस आपात स्थिति का प्राथमिक संकेत होता है।
किडनी फेलियर और बहु-अंग विफलता का सबसे बड़ा खतरा
रक्तप्रवाह में घुला मुक्त हीमोग्लोबिन रक्त नलिकाओं से होकर किडनी (गुर्दे) की बारीक छन्नी यानी नेफ्रॉन्स में पहुंचता है। अत्यधिक मात्रा में हीमोग्लोबिन जमा होने से किडनी की नलिकाएं ब्लॉक हो जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में एक्यूट ट्यूबलर नेक्रोसिस कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप मरीज का पेशाब गहरा भूरा या लाल (हीमोग्लोबिन्यूरिया) हो जाता है और कुछ ही घंटों में पेशाब का बनना पूरी तरह बंद (एन्यूरिया) हो सकता है। यह स्थिति तीव्र रीनल फेलियर (गुर्दे की विफलता) की ओर ले जाती है। यदि तुरंत प्रभाव से शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर न निकाला जाए और अंगों को ऑक्सीजन न मिले, तो फेफड़े, लिवर और दिल एक के बाद एक काम करना बंद कर देते हैं, जिससे स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है।
आपातकालीन मेडिकल प्रोटोकॉल: जान बचाने के लिए तुरंत क्या किया जाता है?
जैसे ही किसी ट्रांसफ्यूजन रिएक्शन का हल्का सा भी संदेह होता है, डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का सबसे पहला कदम खून चढ़ाने की प्रक्रिया को उसी सेकंड रोक देना होता है। ड्रिप को तुरंत हटाकर नई लाइन से मरीज को भारी मात्रा में आईवी फ्लुइड्स (सेलाइन) दिए जाते हैं, ताकि ब्लड प्रेशर को स्थिर रखा जा सके और किडनी को हीमोग्लोबिन के जहर से बचाने के लिए यूरिन आउटपुट बढ़ाया जा सके। इसके बाद एलर्जी और सूजन को दबाने के लिए आपातकालीन दवाएं जैसे एंटीहिस्टामाइन, स्टेरॉयड और एपिनेफ्रीन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। गंभीर मामलों में जहां किडनी काम करना बंद कर देती है या खून में एसिड का स्तर बढ़ जाता है, मरीज को तुरंत आईसीयू में शिफ्ट कर डायलिसिस और प्लाज्मा एक्सचेंज का सहारा लेना पड़ता है।
आधुनिक ब्लड बैंकों की सुरक्षा दीवार और ‘क्रॉस-मैचिंग’ का महत्व
ऐसी घातक गलतियों को शून्य करने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में अत्यंत कठोर सुरक्षा नियम तय किए गए हैं। केवल एबीओ (ABO) और आरएच (Rh) ग्रुप का मिलान ही काफी नहीं होता, बल्कि खून चढ़ाने से ठीक पहले लैब में मरीज के सीरम और डोनर की कोशिकाओं का प्रत्यक्ष ‘क्रॉस-मैचिंग’ परीक्षण किया जाता है। अस्पताल के वार्ड में खून की थैली को मरीज से जोड़ने से पहले दो अलग-अलग स्वास्थ्यकर्मी मरीज के नाम, यूनिक हॉस्पिटल आईडी नंबर, ब्लड बैग नंबर और एक्सपायरी डेट का बारकोड स्कैनिंग के जरिए कड़ा मिलान करते हैं। सख्त वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण आधुनिक चिकित्सा में मिसमैच्ड ट्रांसफ्यूजन की घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं, लेकिन यदि मानवीय भूल से ऐसा हो जाए, तो त्वरित मेडिकल हस्तक्षेप ही मरीज की जान बचा सकता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया