रात में सोते समय हाथ सुन्न होने के पीछे हो सकती हैं ये 5 बड़ी वजहें, भूलकर भी न करें नजरअंदाज

रात को गहरी नींद में अचानक आंख खुले और महसूस हो कि आपका एक हाथ बिल्कुल बेजान पड़ चुका है, उसमें चींटियां काटने जैसी झनझनाहट हो रही है या वह पूरी तरह सुन्न हो चुका है, तो यह अनुभव काफी डरावना हो सकता है। आमतौर पर लोग इसे यह कहकर टाल देते हैं कि शायद हाथ दब गया होगा या गलत करवट सोने से खून का दौरा रुक गया होगा। बेशक, कई मामलों में सिर के नीचे हाथ रखकर सोने या अजीब स्थिति में लेटने से नसों पर अस्थायी दबाव पड़ता है, जिससे कुछ पलों के लिए हाथ भारी या सुन्न महसूस होता है और थोड़ा हिलाने-डुलाने पर स्थिति सामान्य हो जाती है। लेकिन जब यह समस्या अक्सर होने लगे, हर दूसरी-तीसरी रात आपकी नींद हाथ के सुन्नपन से टूटने लगे या सुबह उठने के बाद भी उंगलियों में कमजोरी महसूस हो, तो इसे महज एक सामान्य बात मानकर छोड़ देना सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ हो सकता है। हमारे शरीर का तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) बेहद संवेदनशील होता है और अंगों का बार-बार सुन्न होना इस बात का सीधा संकेत है कि शरीर के भीतर नसों के संचार या रक्त प्रवाह में कोई गंभीर रुकावट आ रही है।

कार्पल टनल सिंड्रोम और नसों पर बढ़ता दबाव

रात में हाथ सुन्न होने की सबसे आम चिकित्सीय वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम। हमारी कलाई में एक संकरी नली जैसी संरचना होती है जिसे कार्पल टनल कहा जाता है, जिससे होकर मीडियन नर्व यानी मुख्य नस गुजरती है। यह नस अंगूठे और पहली तीन उंगलियों को गति और संवेदना प्रदान करती है। जब दिनभर कंप्यूटर पर कीबोर्ड और माउस का अत्यधिक इस्तेमाल, स्मार्टफोन का लगातार उपयोग, सिलाई-कढ़ाई, ड्राइविंग या भारी वजन उठाने जैसे दोहराव वाले काम किए जाते हैं, तो कलाई के टेंडन में सूजन आ जाती है। रात को सोते समय अधिकांश लोगों की कलाई अनजाने में अंदर की ओर मुड़ जाती है, जिससे इस संकरी टनल में मीडियन नर्व पर जबरदस्त दबाव पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप रात के समय हाथ, हथेली और उंगलियों में तीखा दर्द, जलन, सुन्नपन और झनझनाहट शुरू हो जाती है। अगर समय रहते फिजियोथेरेपी, रिस्ट स्प्लिंट या जीवनशैली में बदलाव के जरिए इसका इलाज न किया जाए, तो यह नसों को स्थायी रूप से कमजोर कर सकता है, जिससे हाथों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है और छोटी-छोटी चीजें भी हाथ से छूटने लगती हैं।

सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस और रीढ़ की हड्डी से जुड़ा कनेक्शन

कई बार समस्या हाथ या कलाई में नहीं, बल्कि आपकी गर्दन और रीढ़ की हड्डी में छिपी होती है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, घंटों झुककर मोबाइल स्क्रीन देखना और गलत मुद्रा में बैठकर काम करने से सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस की समस्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। हमारी गर्दन की रीढ़ की हड्डियों (सर्वाइकल वर्टिब्रा) के बीच की डिस्क जब घिसने लगती है या अपनी जगह से खिसक जाती है, जिसे स्लिप डिस्क या हर्नियेटेड डिस्क कहा जाता है, तो वह गर्दन से हाथों की ओर जाने वाली नसों को दबाने लगती है। चिकित्सा विज्ञान में इसे सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी कहा जाता है। जब आप रात को बहुत मोटा तकिया लगाते हैं या बिना तकिए के असहज स्थिति में सोते हैं, तो गर्दन की नसों पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है। इसका असर सीधे आपके कंधों से होता हुआ कोहनी, कलाई और हाथों की उंगलियों तक पहुंचता है। इसमें हाथ सुन्न होने के साथ-साथ गर्दन में अकड़न, कंधों में भारीपन और कभी-कभी सिर के पिछले हिस्से में तेज खिंचाव भी महसूस होता है।

शरीर में विटामिन बी12 की कमी और तंत्रिका तंत्र की कमजोरी

हाथ-पैरों में अचानक सुन्नपन और झनझनाहट का एक बहुत बड़ा और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला कारण पोषण की कमी है, विशेष रूप से विटामिन बी12 की कमी। विटामिन बी12 हमारे शरीर में नसों की सुरक्षात्मक परत यानी माइलिन शीथ को स्वस्थ बनाए रखने और लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। जब शरीर में इस जरूरी विटामिन का स्तर गिरने लगता है, तो नसों की बाहरी सुरक्षा परत कमजोर होने लगती है और तंत्रिकाएं मस्तिष्क तक सही संदेश नहीं पहुंचा पाती हैं। भारत में शाकाहारी आबादी अधिक होने के कारण विटामिन बी12 की कमी एक आम स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है, क्योंकि यह विटामिन मुख्य रूप से डेयरी उत्पादों या मांसाहारी भोजन में पाया जाता है। विटामिन बी12 की भारी कमी के कारण रात में आराम करते समय भी हाथ और पैर सो जाते हैं, मांसपेशियों में अकारण थकान रहती है, याददाश्त कमजोर महसूस होती है और मानसिक एकाग्रता में कमी आने लगती है। केवल एक साधारण ब्लड टेस्ट के जरिए इसकी पहचान की जा सकती है और डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट्स या डाइट में बदलाव कर इसे सुधारा जा सकता है।

डायबिटीज और पेरिफेरल न्यूरोपैथी का छिपा हुआ खतरा

अगर आपको पहले से डायबिटीज है या आपके शरीर में ब्लड शुगर का स्तर लगातार अनियंत्रित बना रहता है, तो रात में हाथों और पैरों का सुन्न होना पेरिफेरल न्यूरोपैथी का शुरुआती लक्षण हो सकता है। खून में ग्लूकोज की अत्यधिक मात्रा शरीर की सबसे छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जो नसों तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाती हैं। पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण हाथ और पैरों के अंतिम छोर की नसें धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। पेरिफेरल न्यूरोपैथी के मामलों में मरीज को अक्सर रात के सन्नाटे में हाथों-पैरों में सुइयों के चुभने जैसा अहसास, तेज जलन या फिर बिल्कुल सुन्नपन महसूस होता है। स्थिति बिगड़ने पर त्वचा की छूने की संवेदनशीलता खत्म होने लगती है, जिससे कभी चोट या कट लगने पर भी दर्द का तुरंत अहसास नहीं होता। इसके अलावा, हाइपोथायरायडिज्म यानी थायराइड ग्रंथि का धीमा काम करना भी शरीर में फ्लूइड रिटेंशन को बढ़ाता है, जो जोड़ों और नसों के आसपास दबाव डालकर रात के समय सुन्नपन की समस्या को जन्म दे सकता है।

कब हो सकता है यह दिल या स्ट्रोक से जुड़ा आपातकालीन लक्षण

यद्यपि हर बार हाथ का सुन्न होना जानलेवा नहीं होता, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह मेडिकल इमरजेंसी का संकेत भी हो सकता है। यदि आपका बायां हाथ अचानक पूरी तरह सुन्न हो जाए और उसके साथ सीने में भारीपन, दबाव, सांस लेने में तकलीफ, जबड़े या पीठ में दर्द और पसीना आने की समस्या शुरू हो जाए, तो यह हृदय संबंधी समस्या यानी हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है। वहीं, अगर सुन्नपन शरीर के केवल एक तरफ के हिस्से में हो, चेहरे का एक हिस्सा लटकने लगे, बोलने में जुबान लड़खड़ाए या हाथ उठाने में असमर्थता हो, तो यह मस्तिष्क में रक्त संचार बाधित होने यानी ब्रेन स्ट्रोक का गंभीर संकेत है। ऐसी स्थिति में एक मिनट का भी विलंब किए बिना तत्काल नजदीकी आपातकालीन चिकित्सा केंद्र या अस्पताल पहुंचना जरूरी होता है। इसके अलावा, यदि सुन्नपन कई घंटों तक बना रहे, दिन में भी सामान्य काम करते समय हाथ कांपें या अंगूठे में कमजोरी के कारण कप और पेन पकड़ना मुश्किल हो जाए, तो न्यूरोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से तुरंत जांच करानी चाहिए।

बचाव के आसान उपाय और जीवनशैली में जरूरी बदलाव

रात को हाथ सुन्न होने की समस्या से बचने के लिए सबसे पहले अपनी सोने की मुद्रा यानी स्लीपिंग पोस्चर में सुधार करना बेहद आवश्यक है। सोते समय हाथों को छाती पर मोड़ने या सिर के नीचे दबाकर सोने के बजाय उन्हें सीधा और रिलैक्स रखने की आदत डालें। बहुत ऊंचा, सख्त या बहुत पतला तकिया इस्तेमाल करने के बजाय ऐसा ऑर्थोपेडिक या मेमोरी फोम तकिया चुनें जो आपकी गर्दन और रीढ़ को एक सीध में रखे। यदि आप दिनभर डेस्क जॉब करते हैं या लंबे समय तक लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं, तो हर घंटे बाद कलाई, उंगलियों और गर्दन की हल्की स्ट्रेचिंग करें। काम के दौरान कलाई को न्यूट्रल पोजीशन में रखने के लिए एर्गोनॉमिक कीबोर्ड और माउस पैड का इस्तेमाल फायदेमंद रहता है। अपनी दैनिक डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही, पनीर, दालें, नट्स, चिया सीड्स और चिकित्सक की सलाह से विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स शामिल करें। नियमित रूप से प्राणायाम, योग और टहलने की आदत बनाएं ताकि पूरे शरीर में रक्त संचार बेहतर बना रहे। समय पर की गई पहचान और साधारण जीवनशैली सुधार आपको नसों से जुड़ी बड़ी और स्थायी समस्याओं से सुरक्षित रख सकते हैं।

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