सायोनी घोष समेत TMC के 20 बागी सांसदों पर कब होगी कार्रवाई? लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने साफ किया रुख

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद सायोनी घोष समेत 20 बागी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। स्पीकर ने साफ किया कि संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्यता से जुड़ी एक तय संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया होती है, जिसका पालन करना अनिवार्य है। संबंधित 20 सांसदों से औपचारिक जवाब मांगा गया है और जैसे ही उनकी ओर से जवाब दाखिल हो जाएंगे, इस प्रक्रिया में तेजी लाकर नियमानुसार फैसला लिया जाएगा।

‘प्रक्रिया तो प्रक्रिया के हिसाब से चलेगी, कोर्ट में भी एक दिन में फैसले नहीं होते’

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मामले से जुड़े सवाल पर कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी है और एक ट्रिब्यूनल के तौर पर उनकी अदालत में भी विचाराधीन है। स्पीकर ने स्पष्ट करते हुए कहा, “प्रक्रिया तो प्रक्रिया के हिसाब से ही चलेगी। अदालत में भी सारे फैसले एक दिन में नहीं हो जाते हैं। हम दोनों पक्षों की दलीलें सुनेंगे और जैसे ही सदस्यों की ओर से औपचारिक जवाब आ जाएंगे, तुरंत कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाएगा।” उन्होंने जोर देकर कहा कि वे इस पूरे प्रकरण में पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से स्थापित नियमों के अनुरूप कार्रवाई करना चाहते हैं।

अभिषेक बनर्जी ने दायर की हैं 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं

यह पूरा कानूनी और राजनीतिक विवाद तब गहराया जब लोकसभा में टीएमसी के नेता अभिषेक बनर्जी ने अध्यक्ष के समक्ष 20 अलग-अलग याचिकाएं दायर कर इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की। टीएमसी का तर्क है कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर जीतकर आए थे और उन्होंने नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) समूह में शामिल होकर स्वेच्छा से टीएमसी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ दी है। इसलिए वे संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत संसद सदस्य बने रहने के अयोग्य हैं। अभिषेक बनर्जी ने यह भी मांग की है कि सदन के भीतर इस बागी समूह को अलग दल के तौर पर कोई विशेष दर्जा, अलग सीटिंग या संसदीय सुविधाएं न दी जाएं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और बागियों का ‘वैध विलय’ का दावा

कार्रवाई में कथित देरी का हवाला देते हुए टीएमसी नेतृत्व ने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया था। पिछले दिनों भारत के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि अदालत भले ही स्पीकर को सीधा निर्देश नहीं दे सकती, लेकिन वह अपेक्षा करती है कि लोकसभा अध्यक्ष इस मामले का जल्द से जल्द निपटारा करेंगे।

दूसरी तरफ, सायोनी घोष और अन्य बागी सांसदों के गुट का तर्क है कि सदन में उनके पास दो-तिहाई से अधिक संख्या बल है और उन्होंने नियमानुसार NCPI के साथ ‘वैध विलय’ किया है, जिस वजह से उन पर दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान लागू नहीं होते। अब सभी की निगाहें बागी सांसदों द्वारा दाखिल किए जाने वाले जवाब और उसके बाद लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लिए जाने वाले अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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