
नई दिल्ली। भोजन का आनंद लेते समय या किसी से बात करते हुए अचानक दांतों के बीच जीभ का आ जाना और तेज दर्द के साथ खून निकलना एक बेहद आम अनुभव है। आमतौर पर लोग इसे जल्दबाजी में खाना चबाने, ध्यान भटकने या साधारण चूक मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। चोट लगने पर दो-चार दिन दर्द सहने के बाद घाव भर जाता है और बात वहीं खत्म हो जाती है। लेकिन अगर यह वाकया आपके साथ आए दिन दोहराया जा रहा है और खाना चबाते वक्त जुबान बार-बार दांतों के नीचे आकर जख्मी हो रही है, तो सावधान हो जाने की जरूरत है। मेडिकल साइंस के अनुसार, बार-बार जीभ का कटना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि मुंह की बनावट से लेकर तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) से जुड़ी किसी गंभीर शारीरिक समस्या का चेतावनी भरा संकेत हो सकता है।
दंत चिकित्सकों, मैक्सिलोफेशियल सर्जनों और न्यूरोलॉजिस्ट्स का मानना है कि सामान्य परिस्थितियों में हमारे मस्तिष्क और चबाने वाली मांसपेशियों के बीच एक सटीक सामंजस्य होता है। जब भी हम भोजन चबाते हैं, दिमाग जीभ की मांसपेशियों को दांतों के रास्ते से दूर रहने का त्वरित सिग्नल भेजता रहता है। यदि यह चक्र बार-बार टूट रहा है और जीभ लगातार दांतों के बीच फंस रही है, तो इसका अर्थ है कि मौखिक संरचना या न्यूरोलॉजिकल तालमेल में कहीं कोई आंतरिक गड़बड़ी पैदा हो चुकी है।
दांतों का गलत अलाइनमेंट और मैलोक्लूजन की समस्या
बार-बार जुबान कटने की सबसे प्रमुख और आम वजहों में से एक है ‘मैलोक्लूजन’ (Malocclusion), जिसे साधारण भाषा में दांतों का गलत अलाइनमेंट या टेढ़ा-मेढ़ा होना कहा जाता है। सामान्य स्थिति में जब हम मुंह बंद करते हैं, तो ऊपर के दांत नीचे के दांतों के ऊपर एक संतुलित ग्रिड की तरह बैठते हैं, जिससे जीभ को अंदर की ओर सुरक्षित जगह मिलती है।
जब किसी व्यक्ति के दांत बाहर की तरफ निकले हों, अंदर की ओर मुड़े हों, आपस में बहुत घने हों (क्रॉउडिंग) या ऊपरी और निचले जबड़े का तालमेल सही न हो, तो चबाते समय जीभ को घूमने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती। विशेष रूप से जब दाढ़ (मोलर्स) के किनारे सामान्य से अधिक नुकीले या बाहर की तरफ झुके होते हैं, तो हर बार निवाला चबाते समय जीभ का कोई न कोई हिस्सा अनजाने में उन नुकीले सिरों के बीच दब जाता है। डेंटिस्ट के पास जाकर ऑर्थोडोंटिक जांच कराने पर ब्रेसिज़ या अलाइनर्स के जरिए इस समस्या का स्थायी समाधान संभव होता है।
टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट विकार जबड़े के जोड़ की खराबी
हमारे निचले जबड़े को खोपड़ी की हड्डी से जोड़ने वाले जोड़ को टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट (TMJ) कहा जाता है। यह जोड़ हमें बात करने, खाना चबाने, जम्हाई लेने और मुंह को दायें-बायें हिलाने की सुविधा देता है। जब इस जोड़ में किसी चोट, गठिया, तनाव या कार्टिलेज के खिसकने से सूजन आ जाती है, तो इसे टीएमजे डिसऑर्डर (TMJ Disorder) कहा जाता है।
टीएमजे विकार से पीड़ित व्यक्ति का जबड़ा चबाते समय एक समान गति में काम नहीं करता। कई बार मुंह खोलते या बंद करते समय जबड़े से ‘क्लिक’ या ‘पॉप’ की आवाज आती है। जोड़ के इस असामान्य खिंचाव के कारण चबाने की सामान्य लय बिगड़ जाती है। इस असमय खिंचाव के चलते जबड़ा अचानक उस दिशा में बंद हो जाता है जहां जीभ मौजूद होती है, जिसके कारण जुबान दांतों के बीच जोर से दबकर कट जाती है। इसके साथ चेहरे, गर्दन और कानों के पास लगातार हल्का या तेज दर्द भी बना रहता है।
ब्रुक्सिज्म यानी दांत पीसने और जबड़ा भींचने की आदत
दिनभर की मानसिक चिंता, ऑफिस का तनाव या नींद संबंधी विकारों के कारण कई लोगों में अनजाने में दांत किटकटाने या जबड़ा भींचने की आदत विकसित हो जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘ब्रुक्सिज्म’ (Bruxism) कहा जाता है। हालांकि यह समस्या ज्यादातर रात को सोते समय होती है, लेकिन कुछ लोग तनाव की स्थिति में दिन में काम करते समय या खाना खाते वक्त भी अनजाने में जबड़े पर जरूरत से ज्यादा दबाव डालते हैं।
दांत पीसने की यह निरंतर आदत दांतों की ऊपरी सुरक्षात्मक परत (इनेमल) को घिस देती है और उनके किनारों को धारदार बना देती है। इसके अलावा जबड़े की मांसपेशियां लगातार तनाव में रहने के कारण अकड़ जाती हैं। इस मांसपेशियों की थकान और अनियंत्रित तनाव के चलते जब व्यक्ति भोजन करता है, तो मांसपेशियों का नियंत्रण खो जाता है और जीभ कटने की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं।
मैक्रोग्लोसिया और पोषक तत्वों की कमी से जीभ में सूजन
कई बार समस्या दांतों या जबड़े में नहीं, बल्कि खुद जीभ के आकार में होती है। जब किसी व्यक्ति की जीभ सामान्य आकार से काफी बड़ी, मोटी या सूजी हुई हो जाती है, तो इस चिकित्सीय स्थिति को ‘मैक्रोग्लोसिया’ (Macroglossia) कहा जाता है।
जीभ में यह सूजन कई कारणों से आ सकती है, जिनमें शरीर में विटामिन बी12, आयरन, फोलेट या जिंक की गंभीर कमी सबसे आम है। पोषण की कमी से जीभ में सूजन (ग्लॉसिटिस) आ जाती है, जिससे उसका फैलाव बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त थायरॉयड ग्रंथि की धीमी कार्यप्रणाली यानी हाइपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism), एमाइलॉयडोसिस, एक्रोमेगाली या गंभीर एलर्जी के चलते भी जीभ मोटी हो जाती है। जब जीभ का आकार मुंह की गुहा (ओरल कैविटी) के अनुपात में बड़ा हो जाता है, तो चबाने के दौरान उसके किनारे लगातार दांतों की चपेट में आते रहते हैं।
नर्व डैमेज और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का शुरुआती खतरा
बार-बार जीभ का कटना किसी गहरे न्यूरोलॉजिकल विकार का संकेत भी हो सकता है। हमारी जीभ की गति को नियंत्रित करने वाली क्रेनियल नसों (विशेष रूप से हाइपोग्लोसल नर्व और लिंगुअल नर्व) में यदि किसी कारणवश चोट, सूजन या दबाव आ जाए, तो जीभ का मोटर कंट्रोल बिगड़ जाता है।
स्ट्रोक (मस्तिष्क का दौरा), मिनी स्ट्रोक (TIA), मल्टीपल स्केलेरोसिस या पार्किंसंस रोग जैसी स्थितियों में मस्तिष्क से मुंह की मांसपेशियों तक पहुंचने वाले विद्युत संदेश धीमे या बाधित हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति जब भोजन चबा रहा होता है, तो जीभ समय पर पीछे हटने में असमर्थ हो जाती है। इसके अलावा ‘नोक्टर्नल एपिलेप्सी’ (रात के समय आने वाले मिर्गी के दौरे) के मरीजों में अक्सर रात को नींद के दौरान या सुबह उठने पर जीभ कटी हुई मिलती है, जिसका मरीज को दौरे के समय खुद पता नहीं चलता।
टूटे हुए दांत या खराब फिटिंग वाले डेंचर और कैप
दंत चिकित्सा के दौरान लगाए गए कृत्रिम दांत, क्राउन (कैप), ब्रिज या डेंचर यदि सही नाप के न हों, तो वे भी इस समस्या की बड़ी वजह बनते हैं। यदि किसी कैप का सिरा थोड़ा भी बाहर निकला हुआ है या भराव (फिलिंग) का कोई कोना नुकीला रह गया है, तो वह चबाने के दौरान जीभ के ऊतकों को लगातार छीलने लगता है।
इसी तरह अगर किसी व्यक्ति का कोई प्राकृतिक दांत आधा टूट गया है और उसका सिरा आरी की तरह नुकीला हो चुका है, तो वह हर निवाले के साथ जीभ के किनारे को खरोंचता रहेगा। लगातार एक ही जगह पर दांत लगने से बनने वाला पुराना घाव आगे चलकर नॉन-हीलिंग अल्सर का रूप ले सकता है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज करना ओरल प्री-कैंसरस लीजन के जोखिम को बढ़ा सकता है।
इस समस्या से बचाव के लिए जरूरी कदम और चिकित्सकीय जांच
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तुरंत प्राथमिक उपचार: जीभ कटने पर तुरंत मुंह को ठंडे पानी से साफ करें और घाव वाली जगह पर बर्फ का टुकड़ा या साफ कॉटन से हल्का दबाव बनाएं ताकि खून का रिसाव तुरंत रुक जाए। किसी भी तरह के गर्म या तीखे खाने से परहेज करें।
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डेंटल चेकअप: यदि हफ्ते में दो या तीन बार से अधिक यह समस्या हो रही है, तो सबसे पहले किसी योग्य डेंटिस्ट से संपर्क करें। डॉक्टर नुकीले दांतों की स्मूथिंग (इनेमलोप्लास्टी) कर सकते हैं या गलत अलाइनमेंट को ठीक करने की सलाह दे सकते हैं।
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विटामिन और थायरॉयड की जांच: डॉक्टर के परामर्श पर सीबीसी, विटामिन बी12, फेरिटिन और थायरॉयड प्रोफाइल (TSH) की जांच कराएं ताकि जीभ की आंतरिक सूजन का कारण स्पष्ट हो सके।
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न्यूरोलॉजिकल परामर्श: यदि दांतों और जबड़े में कोई खराबी नहीं पाई जाती है, लेकिन फिर भी जीभ कट रही है, चेहरे के एक हिस्से में सुन्नता महसूस होती है या बोलने में लड़खड़ाहट आती है, तो बिना देर किए न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें ताकि किसी संभावित तंत्रिका संबंधी विकार का समय पर निदान हो सके।
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