Karwa Chauth 2026: करवा चौथ की थाली में कोरी मिट्टी का करवा और आटे का चौमुखी दीपक क्यों है अनिवार्य? जानिए अखंड सौभाग्य, अन्नपूर्णा के आशीर्वाद

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाए जाने वाले करवा चौथ के पावन महापर्व में मिट्टी के करवे का महत्व सर्वोपरि माना गया है। सनातन संस्कृति में मिट्टी केवल एक भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि यह हमारे अस्तित्व का मूल आधार और पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का साक्षात संगम है। मिट्टी का करवा उस कुम्हार के चाक पर गढ़ा जाता है जो सीधे प्रकृति से जुड़ी ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। स्कंद पुराण और वामन पुराण में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि मिट्टी का कोरा पात्र किसी भी प्रकार के दोष, अशुद्धि या स्पर्श से परे होता है। धातु के बर्तन जैसे स्टील, एल्युमिनियम या प्लास्टिक में पूजा करने की शास्त्रों में सख्त मनाही है, जबकि पीतल या तांबे की तुलना में भी कोरी मिट्टी को अधिक सात्विक और प्राणवान माना गया है। मिट्टी में सोखने और शीतलता प्रदान करने का एक प्राकृतिक गुण होता है। जब इस करवे में गंगाजल मिश्रित शुद्ध जल भरा जाता है, तो यह जल की ऊर्जा को शुद्ध और शीतल बनाए रखता है। करवे की विशेष बनावट में लगी हुई चोंच यानी टोटी केवल जल गिराने का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवनदायिनी अमृत धारा का प्रतीक है। अर्घ्य देते समय इसी चोंच से बहने वाली पतली और अखंड जलधारा पति-पत्नी के रिश्ते में कभी न टूटने वाले अटूट विश्वास, समर्पण और प्रेम के सातत्य को दर्शाती है। इसलिए पीतल या चांदी के आधुनिक करवे उपलब्ध होने के बाद भी परंपरावादी परिवारों में आज भी मिट्टी के पारंपरिक करवे को ही पूजा की मुख्य धुरी माना जाता है।

मां अन्नपूर्णा का वास और चारों दिशाओं से सुरक्षा: आटे का चौमुखी दीपक ही क्यों जलाया जाता है?

करवा चौथ की पूजा की थाली सजाते समय साधारण मिट्टी के दीपक की जगह गूंथे हुए गेहूं के आटे का चौमुखी दीपक तैयार करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। शास्त्रों में अन्न को साक्षात ब्रह्म कहा गया है और गेहूं के आटे को मां अन्नपूर्णा तथा देवी महालक्ष्मी का प्रत्यक्ष स्वरूप माना जाता है। जब एक सुहागिन महिला बिना नमक डाले, शुद्ध जल और पवित्र भावना के साथ अपने हाथों से आटे को गूंथती है और उसे दीपक का आकार देती है, तो उसमें उसका ममत्व, मातृत्व और अपने परिवार के कल्याण का भाव स्वतः समाहित हो जाता है। आटे के दीपक में गाय का शुद्ध देसी घी भरा जाता है और उसमें चार अलग-अलग दिशाओं में मुख वाली चार बत्तियां लगाई जाती हैं। सनातन दर्शन में चार बत्तियां जीवन के चार मुख्य पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को संतुलित करने का आह्वान करती हैं। इसके साथ ही, यह चौमुखी लौ चारों दिशाओं के दिकपालों और नौ ग्रहों को शांत करने का महाकवच बनती है। जब यह दीपक रात के समय प्रज्वलित होता है, तो यह माना जाता है कि पति के जीवन पर चारों दिशाओं में से किसी भी ओर से आने वाले संकट, अकाल मृत्यु के योग, बीमारियां और नकारात्मक दृष्टि भस्म हो जाती हैं। गाय के घी और गेहूं के जलने से निकलने वाला धुआं वातावरण में मौजूद सूक्ष्म नकारात्मक तरंगों को नष्ट कर घर के भीतर सकारात्मक आभा मंडल का निर्माण करता है।

‘ले सुहागन करवा ले, दे सुहागन करवा दे’: करवा फेरने की रस्म और अखंड सौभाग्य का संकल्प

शाम के समय जब सभी सुहागिन महिलाएं एक साथ बैठकर करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनती हैं, तो कथा की समाप्ति के बाद ‘करवा फेरने’ की अत्यंत भावुक और आत्मीय परंपरा निभाई जाती है। इस विधान में दो सुहागिन महिलाएं आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे के हाथों में करवे का आदान-प्रदान करती हैं और इसे सात बार दोहराया जाता है। इस दौरान महिलाएं एक स्वर में लोकगीत गाती हैं, ‘ले सुहागन करवा ले, दे सुहागन करवा दे, वंद प्यारा करवा दे’। शास्त्रों में इस परंपरा को सौभाग्य का सांझा आदान-प्रदान कहा गया है। यह अनुष्ठान स्त्रियों के मन से ईर्ष्या, अहंकार, द्वेष और संकीर्णता को पूरी तरह समाप्त कर देता है और उनके भीतर परस्पर प्रेम, सामूहिक कल्याण और सौहार्द की भावना भरता है। पूजा में कुल दो करवे रखे जाते हैं—पहला करवा माता पार्वती (गौरी मां) के निमित्त होता है और दूसरा करवा स्वयं व्रती महिला का होता है। सात बार करवा फेरने के बाद, मां गौरी के निमित्त रखा गया करवा घर की वयोवृद्ध महिला, सास या ननद को चरण स्पर्श करके समर्पित किया जाता है, जिसके अंदर गेहूं के दाने, रोली, चावल, बताशे और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा रखी होती है। यह रस्म परिवार की बुजुर्ग महिलाओं के प्रति श्रद्धा, सम्मान और पारिवारिक मर्यादा को मजबूत करने का एक अनुपम सामाजिक माध्यम है।

छलनी, आटे की ज्योति और चंद्र दर्शन: अर्घ्य देने के अचूक नियम और पति दर्शन का भाव

चंद्रोदय के समय जब व्रती महिला अपनी पूजा की थाली लेकर छत या खुले आंगन में पहुंचती है, तो पूजा की मुख्य क्रिया संपन्न होती है। छलनी के ऊपर आटे का जलता हुआ चौमुखी दीपक रखा जाता है। महिला पहले दीपक की लौ के ठीक पीछे से चंद्रमा को देखती है और फिर बिना नजर हटाए उसी ज्योति के उजाले में अपने पति का मुख निहारती है। इसके पीछे गहरा मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विज्ञान छिपा हुआ है। चंद्रमा मन और भावनाओं का स्वामी है, जबकि अग्नि आत्मिक पवित्रता की प्रतीक है। छलनी के छिद्रों से जब चंद्रमा और दीपक का प्रकाश छनकर पति के मुख पर पड़ता है, तो वह दोनों के बीच वर्षभर में हुए किसी भी वैचारिक मतभेद, क्रोध या कलह को पूरी तरह जलाकर समाप्त कर देता है। इसके बाद मिट्टी के करवे की टोटी से चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। अर्घ्य देते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि जल की धारा बीच में टूटे नहीं और वह जल किसी के पैरों पर न पड़े, इसलिए नीचे कोई स्वच्छ थाली या गमला रख लिया जाता है। अर्घ्य अर्पित करते समय “ॐ सोमाय नमः” का मानसिक जप करते हुए परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है। इसके पश्चात पति अपनी पत्नी को उसी करवे से जल पिलाकर और मिष्ठान खिलाकर उसका निर्जला व्रत पूर्ण कराते हैं।

पूजा संपन्न होने के बाद आटे के दीपक और करवे का क्या करें? शास्त्रों में बताए गए जरूरी नियम

अक्सर महिलाएं पूजा और पारण के बाद इस असमंजस में पड़ जाती हैं कि पूजा में इस्तेमाल किए गए आटे के दीपक और मिट्टी के करवे का क्या किया जाए। धर्मशास्त्रों के अनुसार, आटे के दीपक को कभी भी सामान्य कचरे में या इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए क्योंकि इसमें मां अन्नपूर्णा और साक्षात अग्नि देव का वास होता है। व्रत पूर्ण होने और दीपक के स्वतः शांत हो जाने के बाद, उस आटे के दीये को सुबह किसी गाय को खिला देना चाहिए या फिर किसी पीपल के पेड़ के नीचे चींटियों और पक्षियों के आहार के लिए रख देना चाहिए। ऐसा करने से जातक को गोमाता का आशीर्वाद प्राप्त होता है और अन्न का किसी भी प्रकार से निरादर नहीं होता। वहीं दूसरी ओर, मिट्टी के करवे को भी पवित्र माना गया है। कई क्षेत्रों में इस करवे को सुरक्षित रख लिया जाता है और आने वाले अहोई अष्टमी या छठ पर्व की पूजा में जल रखने के काम में लिया जाता है। यदि इसे विसर्जित करना हो, तो किसी बहते हुए शुद्ध जल स्रोत, नदी या किसी पवित्र वृक्ष की जड़ के पास मिट्टी में विसर्जित कर देना चाहिए। जो महिलाएं इन पवित्र सामग्रियों का समुचित सम्मान करती हैं, उनके घर में कभी अन्न, धन और सौभाग्य की कमी नहीं होती।

दिल्ली, यूपी, राजस्थान, बिहार और पंजाब में करवे और दीपक की आंचलिक विविधताएं

भारत के विभिन्न राज्यों में करवा चौथ मनाने के रंग भले ही अलग-अलग हों, लेकिन करवे और आटे के दीपक का केंद्रीय भाव एक समान रहता है। पंजाब और हरियाणा में सुबह ब्रह्ममुहूर्त में सास द्वारा दी गई ‘सरगी’ खाकर व्रत की शुरुआत होती है और शाम को मिट्टी के करवे पर सुंदर गोटे और शीशे लगाकर उसे सजाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में करवे के ऊपर आटे से बने विशेष मीठे फरे या पूए रखे जाते हैं और आटे के चौमुखी दीये को घी के साथ-साथ सरसों के तेल से भी कुछ जगहों पर जलाने की लोक परंपरा है। राजस्थान में राजपूती और मारवाड़ी परंपरा के अनुसार करवे पर कुमकुम से स्वास्तिक और मांडने बनाए जाते हैं तथा मिट्टी के करवे के साथ-साथ चांदी के करवे से अर्घ्य देने का भी प्रचलन देखने को मिलता है। दिल्ली-एनसीआर जैसे आधुनिक मेट्रो शहरों में एकल परिवारों के बीच भी युवा पीढ़ी ने अपनी इस वैदिक विरासत को पूरे उत्साह के साथ सहेजा है। महिलाएं सोशल मीडिया और व्यस्त दिनचर्या के बावजूद कोरी मिट्टी के करवे और हाथों से गूंथे गए आटे के दीये की शुद्धता को ही प्राथमिकता दे रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की जड़ें आज भी अपने पारंपरिक और वैज्ञानिक आधारों पर पूरी मजबूती के साथ टिकी हुई हैं।

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