
हर साल 29 अक्टूबर को दुनिया भर में ‘वर्ल्ड स्ट्रोक डे’ (World Stroke Day) मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को ब्रेन स्ट्रोक जैसी जानलेवा और अपंग बना देने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी के प्रति जागरूक करना है। बीते कुछ वर्षों में भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य में एक बेहद डरावना बदलाव देखा गया है। जो स्ट्रोक कभी 60 से 70 वर्ष की आयु के बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, आज वह दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई जैसे बड़े शहरों में 25 से 45 वर्ष के कामकाजी युवाओं को तेजी से अपना शिकार बना रहा है। आज की युवा पीढ़ी का अधिकांश समय ऑफिस में लैपटॉप की स्क्रीन के सामने और घर पर बिस्तर में लेटकर देर रात तक स्मार्टफोन पर रील्स या वेब सीरीज स्क्रॉल करते हुए बीतता है। ऐसे में स्वास्थ्य हलकों में एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या मोबाइल और लैपटॉप की नीली रोशनी या स्क्रीन का लंबे समय तक इस्तेमाल सीधे तौर पर दिमाग की नसों को ब्लॉक कर स्ट्रोक का कारण बन सकता है? इस सवाल की गहराई में जाने पर देश के शीर्ष न्यूरोलॉजिस्ट और ब्रेन एक्सपर्ट्स जो सच सामने लाते हैं, वह हर उस व्यक्ति की आंखें खोलने के लिए काफी है जो रोजाना 8 से 12 घंटे डिजिटल स्क्रीन्स के सामने बिता रहा है।
क्या स्क्रीन सीधे तौर पर ब्रेन स्ट्रोक लाती है? जानिए डॉक्टरों का वैज्ञानिक सच
सीधे और स्पष्ट मेडिकल शब्दों में कहें तो मोबाइल फोन या लैपटॉप स्क्रीन से निकलने वाला रेडिएशन या नीली रोशनी (Blue Light) सीधे तौर पर दिमाग की नस को फाड़ती या ब्लॉक नहीं करती है। यह धारणा कि फोन की तरंगें सीधे मस्तिष्क में थक्का बना देती हैं, पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं है। लेकिन असली खतरा इस स्क्रीन टाइम के कारण पैदा होने वाली ‘लाइफस्टाइल कैस्केड’ (Lifestyle Cascade) में छिपा हुआ है। न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, स्क्रीन अपने आप में स्ट्रोक नहीं लाती, लेकिन स्क्रीन देखने की लत उन तमाम जानलेवा मेडिकल ट्रिगर्स को एक साथ सक्रिय कर देती है जो स्ट्रोक के लिए 100% जिम्मेदार होते हैं। जब कोई व्यक्ति लगातार 8 से 10 घंटे बिना हिले-डुले लैपटॉप पर काम करता है, तो शरीर का ब्लड सर्कुलेशन बेहद धीमा हो जाता है। सुस्त जीवनशैली (Sedentary Behavior) खून को गाढ़ा बनाने और नसों में सूक्ष्म थक्के (Blood Clots) बनने की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है। यही थक्के जब मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं तक पहुंचते हैं, तो वे खून के बहाव को रोक देते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में ‘इस्कीमिक स्ट्रोक’ (Ischemic Stroke) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्रीन टाइम सीधे नहीं, बल्कि एक बेहद घातक साइलेंट एजेंट के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से स्ट्रोक का सबसे बड़ा उत्प्रेरक बन चुका है।
‘टेक नेक’ और घंटों झुकी हुई गर्दन: जब दिमाग को खून पहुंचाने वाली नस ही खिंच जाए
मोबाइल और लैपटॉप के अत्यधिक इस्तेमाल का सबसे खतरनाक और अनदेखा शारीरिक पहलू है गलत पोस्चर, जिसे मेडिकल साइंस में ‘टेक नेक’ (Tech Neck) कहा जाता है। जब आप स्मार्टफोन का उपयोग करते हुए अपनी गर्दन को 45 से 60 डिग्री के कोण पर नीचे की ओर झुकाते हैं, तो आपकी सर्वाइकल रीढ़ और गर्दन की मांसपेशियों पर लगभग 25 से 30 किलोग्राम का अतिरिक्त भार पड़ता है। गर्दन के पिछले और साइड के हिस्से से होकर दो बेहद अहम रक्त वाहिकाएं गुजरती हैं, जिन्हें ‘वर्टेब्रल आर्टरीज’ (Vertebral Arteries) और ‘कैरोटिड आर्टरीज’ कहा जाता है। ये धमनियां दिल से ताजा ऑक्सीजन युक्त खून सीधे दिमाग के पिछले हिस्से और ब्रेनस्टेम तक पहुंचाती हैं। घंटों एक ही असामान्य मुद्रा में गर्दन झुकाए रखने, अचानक गर्दन मटकाने या स्क्रीन पर काम करते हुए मांसपेशियों में खिंचाव आने से इन धमनियों की अंदरूनी परत में दरार आ सकती है, जिसे न्यूरोलॉजी में ‘वर्टेब्रल आर्टरी डिसेक्शन’ (Vertebral Artery Dissection) कहा जाता है। इस अंदरूनी चोट के कारण वहां तुरंत खून का थक्का बन जाता है, जो दिमाग की ओर खून का प्रवाह बंद कर देता है। भारत के कई प्रमुख अस्पतालों में 30 से 35 साल के ऐसे कई टेक प्रोफेशनल्स और गेमर्स के मामले सामने आए हैं, जिन्हें बिना किसी पुरानी बीमारी के केवल लगातार गलत पोस्चर में स्क्रीन देखने की वजह से अचानक पैरालिसिस या स्ट्रोक का सामना करना पड़ा।
देर रात रील्स की लत, अनिद्रा और ब्लड प्रेशर का जानलेवा कॉकटेल
स्क्रीन का दूसरा सबसे खतरनाक हमला इंसान के नर्वस सिस्टम और हार्मोनल संतुलन पर होता है। स्मार्टफोन और लैपटॉप की स्क्रीन्स से निकलने वाली हाई-एनर्जी विजिबल (HEV) ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को पूरी तरह दबा देती है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो हमारे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक (Circadian Rhythm) को नियंत्रित करता है और गहरी नींद लाने में मदद करता है। जब युवा रात 12 या 1 बजे तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो दिमाग धोखा खा जाता है और उसे लगता है कि अभी दिन ही है। इस वजह से नींद न आने की क्रोनिक समस्या (Insomnia) पैदा होती है। नींद की कमी से शरीर का सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम हर समय ‘फाइट ऑर फ्लाइट’ मोड में रहता है, जिससे स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल और एड्रेनालिन का स्तर लगातार हाई बना रहता है। यह स्थिति धमनियों को सिकोड़ देती है और ब्लड प्रेशर को अचानक स्पाइक कराती है। डॉक्टरों के अनुसार, रात के समय लगातार बना रहने वाला साइलेंट हाई ब्लड प्रेशर दिमाग की कमजोर नसों को फाड़ सकता है, जिसे ‘हेमरेजिक स्ट्रोक’ (Hemorrhagic Stroke) कहा जाता है। नींद की कमी और स्क्रीन के तनाव का यह कॉकटेल युवाओं की रक्त नलिकाओं को समय से पहले बूढ़ा और कठोर बना रहा है।
भारत के युवाओं में स्ट्रोक का बदलता ट्रेंड: आखिर क्यों बढ़ रहा है जोखिम?
भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक के कुल मामलों में से लगभग 15 से 20 प्रतिशत मरीज 40 साल से कम उम्र के हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान से लेकर दिल्ली और बेंगलुरु तक फैले कॉरपोरेट सेक्टर और वर्क-फ्रॉम-होम कल्चर ने युवाओं को पूरी तरह स्क्रीन-निर्भर बना दिया है। स्क्रीन देखते समय जंक फूड, अत्यधिक चाय-कॉफी या एनर्जी ड्रिंक्स का सेवन, सिगरेट या वेपिंग की लत और फिजिकल इनएक्टिविटी मिलकर शरीर में डिस्लिपिडेमिया (खराब कोलेस्ट्रॉल की अधिकता) और इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा करती है। युवा यह मानकर चलते हैं कि स्ट्रोक तो बुढ़ापे की बीमारी है, इसलिए वे सिरदर्द, आंखों में भारीपन और गर्दन की अकड़न जैसे प्राथमिक चेतावनी संकेतों को साधारण थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं। यही लापरवाही उन्हें सीधे आईसीयू तक पहुंचा देती है।
बी-फास्ट (BE-FAST) फॉर्मूला: स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण जिन्हें कतई न करें इग्नोर
ब्रेन स्ट्रोक एक ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है जिसमें हर एक सेकंड कीमती होता है। दिमाग में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुकते ही प्रति मिनट लगभग 19 लाख ब्रेन सेल्स (न्यूरॉन्स) हमेशा के लिए मर जाते हैं। इसलिए न्यूरोलॉजिस्ट्स आम जनता को ‘BE-FAST’ फॉर्मूला याद रखने की सलाह देते हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत पहचान की जा सके:
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B (Balance): अचानक शरीर का संतुलन बिगड़ना, चक्कर आना या चलते-चलते लड़खड़ाना।
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E (Eyes): आंखों के आगे अचानक धुंधलापन छा जाना, दोहरा दिखाई देना (Double Vision) या एक आंख से पूरी तरह दिखना बंद होना।
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F (Face Drooping): मुस्कुराने की कोशिश करने पर चेहरे का एक हिस्सा लटक जाना या मुंह टेढ़ा होना।
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A (Arm Weakness): एक हाथ या पैर में अचानक सुन्नता, कमजोरी या उसे ऊपर उठाने में असमर्थता।
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S (Speech Difficulty): बोलते समय जुबान का लड़खड़ाना, शब्दों का साफ न निकलना या दूसरों की बात समझने में भ्रम होना।
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T (Time to Call Ambulance): इनमें से एक भी लक्षण दिखते ही तुरंत बिना घरेलू नुस्खों में समय गंवाए मरीज को ऐसे अस्पताल ले जाएं जहां 24 घंटे सीटी स्कैन, एमआरआई और न्यूरो-आईसीयू की सुविधा हो। स्ट्रोक के पहले 4.5 घंटे को ‘गोल्डन ऑवर’ (Golden Hour) कहा जाता है। इस दौरान क्लॉट बस्टर इंजेक्शन (थ्रोम्बोलिसिस) देकर दिमाग की नस को दोबारा खोला जा सकता है और मरीज को स्थायी लकवे या मौत से बचाया जा सकता है।
स्क्रीन से दोस्ती भी रहे और दिमाग भी सेफ: न्यूरोलॉजिस्ट्स की 5 प्रैक्टिकल सलाह
चूंकि आधुनिक युग में मोबाइल और कंप्यूटर को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है, इसलिए न्यूरोलॉजिस्ट्स कुछ बुनियादी सावधानियों को अपनी दिनचर्या में शामिल करने पर जोर देते हैं। सबसे पहले हर 45 मिनट के काम के बाद अपनी कुर्सी से उठें और कम से कम 2 से 3 मिनट टहलें व गर्दन को क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज धीरे-धीरे घुमाएं। दूसरा, अपने लैपटॉप की स्क्रीन को आंखों के ठीक समानांतर रखें ताकि गर्दन को नीचे न झुकाना पड़े; इसके लिए लैपटॉप स्टैंड का इस्तेमाल करें। तीसरा, ’20-20-20′ नियम का पालन करें—हर 20 मिनट बाद 20 फीट दूर रखी किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखें। चौथा नियम है डिजिटल डिटॉक्स: सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी तरह की स्क्रीन बंद कर दें और मोबाइल को बेडरूम से दूर रखें। अंत में, दिनभर में पर्याप्त पानी पिएं ताकि खून गाढ़ा न हो और साल में कम से कम एक बार अपने ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफाइल की जांच अवश्य कराएं। डिजिटल दुनिया में अपनी प्रोडक्टिविटी बनाए रखने के साथ-साथ अपने दिमाग की हिफाजत करना ही इस वर्ल्ड स्ट्रोक डे का सबसे बड़ा संदेश है।
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