
सनातन धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना गया है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए समर्पित होता है। इस दिन माताएं अहोई माता (देवी पार्वती के स्वरूप) की विधिवत पूजा-अर्चना करती हैं और शाम को आकाश में तारों को अर्घ्य देकर ही अपना उपवास पूर्ण करती हैं।
पंचांग गणनाओं के अनुसार, 1 नवंबर को अहोई अष्टमी के दिन कई शुभ ग्रहों की स्थिति और दुर्लभ नक्षत्रों का महासंयोग बन रहा है। इस पावन अवसर पर की गई पूजा-अर्चना का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि यदि इस दिन विधि-विधान से पूजा के साथ कुछ विशेष उपाय किए जाएं, तो संतान के जीवन में आ रही पढ़ाई, करियर, स्वास्थ्य या व्यवहार से जुड़ी सभी बाधाएं जड़ से समाप्त हो जाती हैं।
अहोई अष्टमी पर क्यों खास माना जाता है तारों को अर्घ्य देना?
करवा चौथ पर जिस प्रकार चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है, ठीक उसी तरह अहोई अष्टमी के दिन शाम के समय आकाश में तारों के दर्शन और अर्घ्य का विशेष विधान है। शास्त्रों में तारों को निरंतर चमकते रहने और अटल रहने का प्रतीक माना गया है। माताएं जब तांबे या कांसे के लोटे में जल, रोली और अक्षत लेकर तारों को अर्घ्य देती हैं, तो वे अपनी संतान के लिए तारों जैसी दीर्घायु, स्थिर बुद्धि और चमकते भविष्य की कामना करती हैं। तारों को अर्घ्य देने के बाद ही घर के बच्चों के हाथों से जल ग्रहण करके माताएं अपना व्रत संपन्न करती हैं।
संतान की तरक्की और उज्ज्वल भविष्य के लिए जरूर करें ये 2 अचूक उपाय
यदि आपकी संतान की शिक्षा में रुकावटें आ रही हैं, नौकरी या व्यवसाय में सफलता नहीं मिल पा रही है, या संतान का स्वास्थ्य बार-बार खराब रहता है, तो 1 नवंबर को अहोई अष्टमी के पावन अवसर पर ये दो उपाय अवश्य करें:
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चांदी की स्याहू माला और 8 गोमती चक्र का रक्षा कवच उपाय:
अहोई अष्टमी के दिन चांदी की स्याहू (चांदी के दो गोल मनके और अहोई माता का लॉकेट) की माला की पूजा करने का प्राचीन विधान है। इस दिन पूजा की थाली में चांदी की स्याहू के साथ 8 गोमती चक्र और 8 कौड़ियां रखें। इन पर रोली, अक्षत और केसर का तिलक लगाएं। इसके बाद अहोई माता के समक्ष ‘ॐ ह्रीं उमाये नमः’ अथवा ‘ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें। पूजा संपन्न होने के बाद इन गोमती चक्रों को लाल कपड़े में बांधकर संतान के अध्ययन कक्ष या तिजोरी में रख दें और स्याहू की माला को माताएं अपने गले में धारण करें। यह उपाय संतान को नजरदोष और बुरी संगति से बचाता है तथा करियर में तेजी से उन्नति दिलाता है।
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दूध-अक्षत का अर्घ्य और 7 प्रकार के अनाजों का गुप्त दान:
संतान के स्वास्थ्य और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए शाम के समय तारों के उदय होने पर लोटे में कच्चा गाय का दूध, गंगाजल, सफेद फूल और साबुत अक्षत मिलाएं। तारों को देखते हुए संतान का नाम और गोत्र बोलकर अर्घ्य अर्पित करें। इसके तुरंत बाद सात प्रकार के अनाज (सप्तधान्य—गेहूं, चावल, जौ, चना, मूंग, उड़द और तिल) को मिलाकर अहोई माता को अर्पित करें और अगले दिन सुबह किसी जरूरतमंद, निर्धन महिला या गौशाला में गाय को खिला दें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय से संतान के जीवन पर मंडरा रहे ग्रह दोष और अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए टल जाता है।
अहोई माता की पूजा की सही विधि और आवश्यक नियम
इस पावन व्रत का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त करने के लिए कुछ शास्त्रीय नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है:
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दीवार पर अहोई माता का अंकन: घर की उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार पर गेरू और चावल के घोल से अहोई माता, उनके सात पुत्रों और साही (स्याहू) का चित्र बनाएं या बाजार से उपलब्ध कैलेंडर स्थापित करें।
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करवे का पूजन: पूजा में करवा चौथ में इस्तेमाल किए गए करवे का उपयोग किया जा सकता है या नया मिट्टी का कलश स्थापित करें, जिसके मुख पर मौली बांधकर उस पर सिंघाड़े, फल और घर में बने आटे के मीठे पुए अर्पित करें।
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व्रत कथा का श्रवण: हाथ में गेहूं के सात दाने और दूर्वा घास लेकर अहोई माता की पारंपरिक सातों बेटों वाली कथा का शांत मन से श्रवण करें। कथा समाप्त होने के बाद गेहूं के दानों को अपनी साड़ी के पल्लू में बांध लें।
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नुकीली चीजों का त्याग: इस दिन व्रती माताओं को सुई, कैंची, चाकू जैसी नुकीली या धारदार वस्तुओं का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। साथ ही मिट्टी खोदने या पेड़ों की टहनी काटने जैसे कार्यों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए।
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