
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ने वाला अहोई अष्टमी का व्रत सनातन धर्म में मातृत्व, समर्पण और संतान की दीर्घायु का सबसे बड़ा अनुष्ठान माना जाता है। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपोत्सव से ठीक आठ दिन पहले आने वाले इस महापर्व को लेकर इस वर्ष माताओं के बीच तारीख को लेकर गहरा संशय पैदा हो गया है। पंचांगों में तिथियों के उतार-चढ़ाव और दो दिनों तक अष्टमी तिथि के स्पर्श के कारण श्रद्धालु महिलाएं यह तय नहीं कर पा रही हैं कि व्रत 1 नवंबर को रखा जाए या फिर 2 नवंबर को। उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार में इस व्रत की व्यापक मान्यता है। चूंकि यह व्रत दिनभर निर्जला रहकर शाम को गोधूलि बेला में अहोई माता की पूजा और रात को आकाश में तारों के दर्शन व अर्घ्य के बाद खोला जाता है, इसलिए इसमें तिथि के संध्या कालीन प्रभाव को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। किसी भी भ्रम से बचने के लिए वैदिक पंचांग के गणित और धर्मशास्त्रों के नियमों को समझना अनिवार्य है ताकि व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त हो सके।
पंचांगीय गणना: कब शुरू और कब समाप्त होगी कार्तिक मास की कृष्ण अष्टमी तिथि?
वैदिक ज्योतिषीय पंचांग और काल-गणना के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का शुभारंभ 1 नवंबर 2026, रविवार की दोपहर बाद हो रहा है। अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर लगभग 03 बजकर 15 मिनट से प्रारंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 2 नवंबर 2026, सोमवार की शाम लगभग 05 बजकर 10 मिनट पर हो जाएगा। इसके बाद नवमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। हिंदू धर्म में अधिकांश व्रत उदयातिथि यानी सूर्योदय के समय मौजूद तिथि के अनुसार मनाए जाते हैं, किंतु अहोई अष्टमी, करवा चौथ, महालक्ष्मी पूजन और प्रदोष जैसे व्रतों के नियम बिल्कुल अलग हैं। इन विशिष्ट पर्वों में वह समय देखा जाता है जिस पहर में मुख्य पूजा और अर्घ्य का विधान शास्त्रों में वर्णित है। अहोई अष्टमी का संपूर्ण विधान प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के समय पर आधारित होता है, इसलिए केवल उदयातिथि को देखकर निर्णय लेना शास्त्र सम्मत नहीं माना जा सकता।
प्रदोष व्यापिनी तिथि का नियम: 1 नवंबर या 2 नवंबर, किस दिन व्रत रखना शास्त्रसम्मत?
धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और हेमाद्रि जैसे प्रामाणिक धर्मग्रंथों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि अहोई अष्टमी का व्रत उसी दिन रखा जाना चाहिए जिस दिन प्रदोष काल और रात्रि में तारे निकलने के समय अष्टमी तिथि विद्यमान हो। यदि हम 2 नवंबर की स्थिति का विश्लेषण करें, तो 2 नवंबर को सूर्योदय के समय यद्यपि अष्टमी तिथि रहेगी, लेकिन शाम को सूर्यास्त होने से पहले ही शाम 05 बजकर 10 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त हो जाएगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि 2 नवंबर को जब शाम ढलेगी और आकाश में तारे निकलेंगे, उस समय नवमी तिथि लग चुकी होगी। वहीं दूसरी ओर, 1 नवंबर को दोपहर से ही अष्टमी तिथि लग रही है और यह पूरी शाम, प्रदोष काल और तारों के निकलने के समय पूर्ण रूप से व्याप्त रहेगी। अतः शास्त्रोक्त दृष्टि और पंचांगीय सम्मति से अहोई अष्टमी का निर्जला व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार को ही रखा जाना सर्वथा उचित, धर्मसम्मत और फलदायी है। जो महिलाएं उदयातिथि के भ्रम में 2 नवंबर को व्रत रखेंगी, उनकी शाम की पूजा और तारों का अर्घ्य नवमी तिथि में चला जाएगा, जो अहोई व्रत के मूल विधान के विपरीत है।
अहोई माता पूजन का शुभ मुहूर्त और प्रदोष काल की चौघड़िया
अहोई अष्टमी के दिन माताएं अपनी संतानों के कल्याण, आरोग्य और सुरक्षा के लिए अहोई माता यानी देवी पार्वती के स्वरूप की पूजा करती हैं। 1 नवंबर 2026 को अहोई माता की पूजा के लिए सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी प्रदोष काल का समय शाम 05 बजकर 38 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को कुल 1 घंटा 18 मिनट की यह पावन अवधि प्राप्त होगी, जिसके भीतर अहोई माता का चित्र दीवार पर अंकित कर अथवा पोस्टर स्थापित कर रोली, अक्षत, दूध, सात्विक हलवा और आठ मीठी पूरियों का भोग अर्पित करना चाहिए। यदि चौघड़िया मुहूर्त की बात करें, तो शाम को अमृत और चर चौघड़िया के संयोग में की गई पूजा परिवार में अक्षय सुख और सौभाग्य की वृद्धि करती है। इस दौरान चांदी की स्याहू माला की विधिवत पूजा कर उसे अहोई माता के समक्ष अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में माताएं अपनी संतानों के रक्षा कवच के रूप में धारण करती हैं।
तारों को अर्घ्य देने का समय: गोधूलि बेला के बाद कब दिखेंगे पहले तारे?
अहोई अष्टमी के व्रत का सबसे संवेदनशील और बहुप्रतीक्षित क्षण वह होता है जब माताएं आकाश में तारों को देखकर करवे के जल से अर्घ्य देती हैं। करवा चौथ की तरह इस व्रत में चंद्रमा का इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि तारों के उदय होते ही व्रत का संकल्प पूरा हो जाता है। 1 नवंबर 2026 को उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में तारों के निकलने का संभावित समय शाम 06 बजकर 12 मिनट से 06 बजकर 28 मिनट के बीच रहेगा। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर और जयपुर में शाम लगभग 06 बजकर 15 मिनट पर आकाश में तारे स्पष्ट टिमटिमाते नजर आने लगेंगे। माताओं को चाहिए कि वे पूजा के करवे में रखे शुद्ध जल में थोड़ा सा गाय का कच्चा दूध, रोली और अक्षत मिला लें। इसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके तारों की ओर दृष्टि रखते हुए अत्यंत विनम्र भाव से तीन बार अर्घ्य समर्पित करें। अर्घ्य देते समय अपनी संतान का नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए अहोई माता से उसकी समस्त व्याधियों और संकटों से रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है।
चंद्रोदय का समय: जो महिलाएं चंद्रमा को देती हैं अर्घ्य, उनके लिए विशेष समय-सारणी
यद्यपि अहोई अष्टमी का मुख्य पारण तारों को अर्घ्य देकर ही किया जाता है, किंतु देश के कई पारंपरिक परिवारों और कुछ विशिष्ट समुदायों में अहोई अष्टमी पर भी चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करने की कुल-परंपरा होती है। जो व्रती महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करके ही व्रत खोलती हैं, उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि अष्टमी तिथि को चंद्रमा काफी देर से उदित होता है। 1 नवंबर 2026 की रात्रि को चंद्रोदय का समय लगभग 11 बजकर 45 मिनट से 12 बजकर 10 मिनट के मध्य रहेगा। भौगोलिक स्थिति के अनुसार पर्वतीय और पूर्वी क्षेत्रों में चंद्रमा कुछ मिनट पहले दिखाई दे सकता है, जबकि पश्चिमी भारत में यह मध्यरात्रि के करीब नजर आएगा। ऐसे में बुजुर्ग, अस्वस्थ या गर्भवती महिलाओं के लिए चंद्रमा का इंतजार करना शारीरिक रूप से कठिन हो सकता है। शास्त्रों ने स्पष्ट छूट दी है कि अहोई अष्टमी मूलतः ‘तारों का पर्व’ है, इसलिए गोधूलि बेला के उपरांत तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करना पूरी तरह शास्त्रसम्मत और मान्य है।
व्रत के कड़े नियम, पारण की प्रामाणिक विधि और संतान सुरक्षा का महासंकल्प
अहोई अष्टमी के दिन व्रत का संकल्प जितना कठोर होता है, उसके नियमों का पालन भी उतनी ही निष्ठा से करना आवश्यक है। इस दिन व्रती माताओं को किसी भी प्रकार की नुकीली या धारदार वस्तु जैसे चाकू, कैंची, दरांती या सुई का प्रयोग करने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस दिन जमीन की खुदाई करना या मिट्टी से जुड़े काम करना पूर्णतः वर्जित होता है। रसोई में ऐसा कोई भोजन न बनाएं जिसे चाकू से काटकर बनाया गया हो; इसके स्थान पर हाथ से तोड़ी जाने वाली सब्जियां और सात्विक अन्न ही पकाया जाता है। शाम को तारों को अर्घ्य देने के पश्चात घर की सबसे बुजुर्ग महिला, विशेष रूप से सास या जेठानी के चरण स्पर्श कर उन्हें बायना (वस्त्र, सुहाग सामग्री, फल, पूड़ी-हलवा और दक्षिणा) भेंट करें। इसके बाद अहोई माता के समक्ष रखे दूध-भात या हलवे के पहले निवाले से अपना व्रत खोलें। पूर्ण भक्ति भाव, नियमों के अनुशासन और 1 नवंबर की संध्या को सही मुहूर्त में संपन्न किया गया यह अनुष्ठान अहोई माता की असीम अनुकंपा बरसाता है और संतान को दीर्घायु, विद्या, सुबुद्धि व जीवन के हर मोड़ पर अटूट सफलता का वरदान सुनिश्चित करता है।
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