
त्योहारी सीजन शुरू होते ही हर भारतीय घर में दिवाली की गहरी साफ-सफाई का दौर जोर-शोर से शुरू हो जाता है। सालभर से बंद पड़े पंखे, अलमारियों के ऊपर रखी पुरानी पेटियां, दीवान के भीतर दबे रजाई-गद्दे और खिड़कियों के भारी पर्दे जब बाहर निकाले जाते हैं, तो अचानक घर के सदस्यों को लगातार छींकें, सूखी खांसी, गले में खराश और आंखों से पानी आने की गंभीर समस्या घेर लेती है। ज्यादातर लोग इसे साधारण धूल का उड़ना मानकर नजरअंदाज कर देते हैं और सोचते हैं कि झाड़ू-पोंछा खत्म होने के कुछ घंटों बाद यह अपने आप शांत हो जाएगा। लेकिन मेडिकल साइंस और इम्यूनोलॉजी के अनुसार यह केवल धूल के मोटे कणों की वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) की तीव्र एलर्जिक प्रतिक्रिया काम कर रही होती है। जब हम धूल के संपर्क में आते हैं, तो हमारा शरीर उसमें मौजूद अदृश्य एलर्जेंस को कोई खतरनाक वायरस या बैक्टीरिया समझ बैठता है। इस खतरे से निपटने के लिए इम्यून सिस्टम तुरंत इम्यूनोग्लोबुलिन ई (IgE) नामक एंटीबॉडीज का भारी मात्रा में उत्पादन शुरू कर देता है। ये एंटीबॉडीज हमारे श्वसन तंत्र की मास्ट कोशिकाओं (Mast Cells) को सक्रिय करती हैं, जिससे हिस्टामाइन (Histamine) नामक केमिकल खून में रिलीज होता है। हिस्टामाइन निकलते ही नाक की अंदरूनी झिल्ली में तेज सूजन आ जाती है, खून की नलिकाएं फैल जाती हैं और शरीर बाहरी कणों को बाहर फेंकने के लिए एक के बाद एक लगातार छींकों की झड़ी लगा देता है। यही कारण है कि सफाई बंद होने के बाद भी कई दिनों तक सांस नली में जलन और खांसी का दौर बना रहता है।
डस्ट माइट्स और मोल्ड: नंगी आंखों से न दिखने वाले वो जहरीले जीव जो बनते हैं असली आफत
धूल को हम जो बेजान गर्द-गुबार समझते हैं, वास्तव में वह सूक्ष्मजीवों की एक पूरी दुनिया होती है। चिकित्सा विज्ञान में डस्ट एलर्जी का सबसे बड़ा गुनहगार ‘हाउस डस्ट माइट्स’ (Dermatophagoides) को माना जाता है। ये 0.2 से 0.3 मिलीमीटर आकार के आठ पैरों वाले इतने छोटे कीड़े होते हैं, जिन्हें नंगी आंखों से बिल्कुल नहीं देखा जा सकता। ये सूक्ष्मजीव इंसानी त्वचा से रोजाना झड़ने वाली मृत कोशिकाओं (Dead Skin Cells) को खाकर जिंदा रहते हैं। चूँकि एक इंसान दिनभर में लाखों डेड स्किन सेल्स छोड़ता है, इसलिए हमारे गद्दे, तकिए, सोफे और कंबलों में लाखों-करोड़ों की संख्या में डस्ट माइट्स डेरा जमाए रहते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि एलर्जी माइट्स के काटने से नहीं होती, बल्कि उनके मल (Fecal Pellets) और मृत शरीर में मौजूद ‘Der p 1’ नामक प्रोटीन से होती है। सालभर जब बक्से या अलमारियां बंद रहती हैं, तो वहां नमी और अंधेरे के कारण फफूंद यानी मोल्ड (Mold Spores) भी तेजी से पनपते हैं। जैसे ही आप सूखे झाड़ू या कपड़े से इन चीजों को झाड़ते हैं, ये सूक्ष्म कण हवा में तैरने लगते हैं। सांस लेते ही ये सीधे हमारे नथुनों से होते हुए फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं। जिन लोगों की श्वसन नली संवेदनशील होती है, उनके लिए यह अदृश्य जहर एलर्जिक राइनाइटिस और ब्रोंकाइटिस को भड़का देता है, जिससे सांस फूलने और छाती में सीटी जैसी आवाज (Wheezing) की नौबत आ जाती है।
साधारण छींक बनाम एलर्जिक राइनाइटिस: कब खांसी बदल जाती है गंभीर ब्रोंकोस्पाज्म में?
सफाई के दौरान नाक में धूल जाने पर एक या दो बार छींक आना स्वाभाविक शारीरिक सुरक्षा प्रक्रिया है, जो बाहरी कचरे को बाहर निकालती है। लेकिन यदि सफाई पूरी होने के बाद भी लगातार 15-20 छींकें आ रही हों, नाक से बिल्कुल पानी जैसा पतला स्राव बह रहा हो, तालू और कान के भीतर तेज खुजली हो रही हो, तो यह एलर्जिक राइनाइटिस (Allergic Rhinitis) का स्पष्ट संकेत है। कई लोगों में यह एलर्जी केवल ऊपरी श्वसन नली तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नीचे उतरकर श्वास नलियों (Bronchial Tubes) पर हमला कर देती है। जब एलर्जिक कण श्वास नलियों की अंदरूनी परत को उत्तेजित करते हैं, तो फेफड़ों की मांसपेशियां अचानक सिकुड़ जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में ‘ब्रोंकोस्पाज्म’ (Bronchospasm) कहा जाता है। इसके कारण फेफड़ों में ऑक्सीजन की आवाजाही का रास्ता संकरा हो जाता है और मरीज को लगातार बिना बलगम वाली सूखी खांसी उठने लगती है, जो विशेष रूप से रात में सोने के समय और बढ़ जाती है। जिन लोगों को बचपन में अस्थमा रहा हो या जिनकी फैमिली हिस्ट्री में सांस की तकलीफ रही हो, उनके लिए दिवाली की यह धूल एक गंभीर एक्यूट अस्थमा अटैक का रूप ले सकती है। इसके अलावा, धूल में मौजूद टॉक्सिन्स आंखों की कंजंक्टिवा परत को भी बुरी तरह प्रभावित करते हैं, जिससे आंखें लाल होना, पलकों में सूजन और रेत चुभने जैसा अहसास होने लगता है जिसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस कहते हैं।
बंद संदूक और रजाई-कंबल: सालभर की नमी कैसे बन जाती है सांसों का फंदा?
दिवाली का समय भारत में मौसम के बदलाव का भी समय होता है। इसी दौरान गर्मी खत्म हो रही होती है और गुलाबी ठंड दस्तक देती है। घरों में सफाई के साथ-साथ जाड़े के भारी कपड़े, रजाई, कंबल और जैकेट निकाले जाते हैं जो पिछले आठ-नौ महीनों से बंद दीवानों या प्लास्टिक की थैलियों में सीलबंद पड़े थे। बंद जगहों पर हवा की आवाजाही न होने से वहां उमस और सीलन का माहौल बन जाता है। यह माहौल फंगस और डस्ट माइट्स के प्रजनन के लिए स्वर्ग जैसा होता है। जब लोग इन रजाई-गद्दों को बिना धोए या बिना धूप दिखाए सीधे झाड़कर इस्तेमाल करने लगते हैं, तो लाखों की संख्या में एरोसोलाइज्ड एलर्जी कण कमरे की हवा में भर जाते हैं। रात को जब व्यक्ति उसी तकिए पर सिर रखकर सोता है, तो पूरी रात वह लगातार माइट्स के प्रोटीन को सांस के जरिए अपने फेफड़ों में खींचता रहता है। नतीजतन, सुबह उठते ही सिर में भारीपन, गले में कफ जमने जैसा अहसास और सांस टूटने की समस्या सामने आती है। इसके अतिरिक्त, सफाई में इस्तेमाल होने वाले केमिकल युक्त फ्लोर क्लीनर, एसिड, फिनाइल और पेंट की गंध हवा में मौजूद धूल के साथ मिलकर एक घातक मिश्रण बनाती है, जो फेफड़ों की म्यूकोसा परत को छीलकर रख देती है और शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को पूरी तरह पंगु बना देती है।
सफाई के दौरान बरतें ये सावधानियां और जानिए डस्ट एलर्जी से तुरंत राहत के असरदार उपाय
यदि आप हर साल दिवाली की सफाई के बाद इस तकलीफ से गुजरते हैं, तो सबसे पहला नियम यह है कि सूखी झाड़ू और सूखे कपड़े से धूल उड़ाना पूरी तरह बंद कर दें। हमेशा गीले कपड़े से डस्टिंग करें और फर्श पर सीधे झाड़ू लगाने के बजाय पहले पानी का हल्का छिड़काव करें या गीला पोंछा लगाएं। सफाई करते समय साधारण कपड़े का मास्क पहनने के बजाय अच्छी गुणवत्ता वाला N95 या N99 रेस्पिरेटर मास्क पहनें, जो 0.3 माइक्रोन तक के सूक्ष्म कणों को नाक में जाने से रोकता है। जाड़े के कपड़ों, रजाई के कवर और पर्दों को निकालने के बाद सीधे कमरे में रखने के बजाय उन्हें कम से कम 60 डिग्री सेल्सियस गर्म पानी में धोएं और पूरे दिन की तेज धूप में अच्छी तरह सुखाएं; सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें डस्ट माइट्स और फंगल स्पोर्स को पूरी तरह खत्म कर देती हैं। सफाई करते समय अपनी आंखों की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्टिव चश्मा पहनें और सिर को स्कार्फ से ढककर रखें ताकि सिर के बालों में धूल न अटके। यदि सफाई के बाद छींक और खांसी शुरू हो चुकी है, तो तुरंत चेहरे को ताजे पानी से धोएं और सेलाइन नेजल स्प्रे (Saline Nasal Spray) से अपनी नाक के दोनों नथुनों को अच्छी तरह फ्लश करें ताकि अंदर फंसे एलर्जेंस बहकर बाहर निकल जाएं। इसके बाद दिन में दो बार सादे पानी की भाप (Steam Inhalation) लें जिससे श्वसन मार्ग की सूजन शांत होती है। एलर्जी ज्यादा होने पर डॉक्टर की सलाह से एंटीहिस्टामाइन दवाएं या नेजल कॉर्टिकोस्टेरॉइड स्प्रे का सीमित उपयोग किया जा सकता है। याद रखें कि दिवाली के उत्सव का आनंद तभी है जब आपकी सांसें स्वस्थ और सुरक्षित रहें, इसलिए सफाई के जोश में सुरक्षा और वैज्ञानिक सावधानियों को कभी न भूलें।
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