
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) के डॉक्टरों ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा दुर्लभ और अभूतपूर्व कारनामा कर दिखाया है, जिसकी चर्चा पूरे देश के मेडिकल जगत में हो रही है। कुशीनगर जिले के पडरौना अंतर्गत सिमरिया बाजार (हनुमानगंज) की रहने वाली 27 वर्षीय दिव्या वर्मा पिछले एक साल से पेट में लगातार बढ़ रही एक विशाल गांठ और असहनीय दर्द से जूझ रही थीं। परिवार ने गोरखपुर से लेकर लखनऊ तक कई बड़े सरकारी और निजी सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन हर जगह जांच के बाद डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। वजह यह थी कि युवती के पेट में लगभग 20 सेंटीमीटर का विशाल ट्यूमर बन चुका था, जो शरीर की सबसे प्रमुख और सबसे बड़ी नस ‘इंफीरियर वेना कावा’ (IVC) और दोनों किडनियों को खून पहुंचाने वाली रीनल नसों में बुरी तरह लिपटा हुआ था। डॉक्टरों का कहना था कि ऑपरेशन टेबल पर मरीज की मुख्य नस जरा सी भी कटी तो कुछ ही सेकंडों में इतना खून बह जाएगा कि जान बचाना नामुमकिन होगा। जब सभी दरवाज़े बंद हो चुके थे और परिवार पूरी तरह उम्मीद खो चुका था, तब मरीज को SGPGI के यूरोलॉजी विभाग लाया गया। संस्थान के यूरोलॉजिस्ट और किडनी ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ प्रो. संजय सुरेखा और उनकी मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम ने इस जानलेवा चुनौती को स्वीकार किया और न केवल करीब 2 किलोग्राम वजनी ट्यूमर को सुरक्षित बाहर निकाला, बल्कि बोवाइन पेरिकार्डियम यानी गाय के दिल की झिल्ली से शरीर की मुख्य नस को दोबारा बनाकर मरीज को नया जीवनदान दिया।
क्या है इंफीरियर वेना कावा और क्यों बेहद जानलेवा था यह ट्यूमर?
मानव शरीर के संवहनी तंत्र (Vascular System) में इंफीरियर वेना कावा (IVC) सबसे चौड़ी और मुख्य शिरा मानी जाती है। इसका मुख्य कार्य पैरों, कूल्हों, आंतों, लिवर और दोनों किडनियों से अशुद्ध रक्त को इकट्ठा करके वापस दिल के दाहिने हिस्से तक ले जाना होता है। दिव्या वर्मा के मामले में सीटी स्कैन और थ्री-डायमेंशनल वैस्कुलर इमेजिंग से पता चला कि पेट के दाहिने हिस्से में स्थित 20 सेमी का भारी-भरकम ट्यूमर आईवीसी को पूरी तरह दबाकर उससे चिपक चुका था और दोनों किडनियों की नसों को भी अपनी चपेट में ले चुका था। केवल ट्यूमर को छीलकर अलग करना शारीरिक संरचना के अनुसार संभव नहीं था, क्योंकि कैंसर के सूक्ष्म अंश छूटने या नस फटने का भारी जोखिम था। ऐसे में यूरोलॉजी और सीवीटीएस सर्जनों के सामने एकमात्र रास्ता यह था कि ट्यूमर के साथ-साथ शरीर की सबसे बड़ी नस (आईवीसी) का प्रभावित हिस्सा और किडनी की प्रभावित नसों को भी शरीर से काटकर अलग कर दिया जाए। लेकिन असली पहेली यह थी कि यदि शरीर की मुख्य नस ही काट दी जाए, तो निचले अंगों का खून दिल तक कैसे पहुंचेगा और दोनों किडनियों को फेल होने से कैसे बचाया जाएगा? यहीं पर डॉक्टरों ने वैश्विक स्तर पर चुनिंदा केंद्रों में अपनाई जाने वाली अत्याधुनिक तकनीक ‘बोवाइन पेरिकार्डियल ग्राफ्टिंग’ का इस्तेमाल करने का क्रांतिकारी निर्णय लिया।
गाय के दिल की झिल्ली (Bovine Pericardium) से कैसे बनी इंसान की नई नस?
बोवाइन पेरिकार्डियम दरअसल गाय के दिल को चारों तरफ से घेरने वाली एक प्राकृतिक, रेशेदार और बेहद मजबूत सुरक्षात्मक झिल्ली होती है। अंतरराष्ट्रीय बायोमेडिकल प्रयोगशालाओं में इस झिल्ली को विशेष वैज्ञानिक प्रक्रियाओं (ग्लाइकेशन और स्टेबलाइजेशन) से गुजारा जाता है, जिससे इसके सभी जीवित पशु-कोशिकाएं और एंटीजन पूरी तरह नष्ट कर दिए जाते हैं ताकि मानव शरीर इसे बाहरी तत्व समझकर रिजेक्ट (Graft Rejection) न करे। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका बेजोड़ लचीलापन, मजबूती और खून के थक्के न जमने देने की प्राकृतिक क्षमता है। कृत्रिम प्लास्टिक ग्राफ्ट्स (जैसे डैक्रॉन या पीटीएफई) की तुलना में जैविक झिल्ली में बैक्टीरिया और फंगल इन्फेक्शन होने का खतरा बहुत कम होता है। SGPGI के डॉक्टरों ने लगभग 50 हजार रुपये की लागत से विदेश में तैयार इस विशेष मेडिकल-ग्रेड बोवाइन पेरिकार्डियल शीट का इस्तेमाल किया। ऑपरेशन थिएटर के भीतर सर्जनों ने 8×4 सेंटीमीटर की इस आयताकार झिल्ली को बहुत ही महीन धागों से सिलकर एक खोखली नली यानी कृत्रिम रक्त नलिका का रूप दिया। इसके बाद मरीज के शरीर से काटे गए आईवीसी वाले हिस्से की जगह इस नई जैविक नस को रीढ़ की हड्डी के सामने प्रत्यारोपित किया गया। इसके साथ ही बाईं किडनी की नस को सीधे इस नई नस से जोड़ा गया और दाईं किडनी की नस को सुरक्षित रखने के लिए उसे गोनाडल वेन से सफलतापूर्वक कनेक्ट (Re-anastomosis) किया गया।
ऑपरेशन टेबल पर हाई-रिस्क ड्रामा: डॉक्टरों की टीम का सामूहिक पराक्रम
यह सर्जरी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी, जिसमें यूरोलॉजी, कार्डियोवैस्कुलर थोरेसिक सर्जरी (CVTS) और न्यूरो-एनेस्थीसिया के शीर्ष विशेषज्ञों की साझी भूमिका रही। सर्जरी का नेतृत्व कर रहे प्रो. संजय सुरेखा के साथ यूरोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अर्पण यादव, डॉ. आशीष रंजन, डॉ. प्रखर और डॉ. देवांशु ने ट्यूमर के जटिल विच्छेदन को अंजाम दिया। वहीं सीवीटीएस विभाग के विशेषज्ञ प्रो. शांतनु पांडे की टीम ने नई नस को आकार देने और बड़े वैस्कुलर कनेक्शन को जोड़ने में तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया। इस दौरान मरीज के ब्लड प्रेशर, दिल की गति और किडनी के यूरिन आउटपुट को नियंत्रित रखना सबसे बड़ा सिरदर्द था, जिसे एनेस्थीसिया विभाग के प्रो. तपस सिंह, प्रो. दिव्या और प्रो. संदीप साहू की अनुभवी टीम ने कुशलता से संभाला। यदि नस जोड़ने के दौरान रक्त प्रवाह में कोई रुकावट आती तो दोनों किडनियां हमेशा के लिए काम करना बंद कर सकती थीं, या फिर नई नस में थक्का बनकर फेफड़ों में पहुंच सकता था (पल्मोनरी एम्बोलिज्म), जिससे तत्काल मृत्यु हो सकती थी। यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. एम.एस. अंसारी ने बताया कि संस्थान के इतिहास में इस स्तर की पहली दुर्लभ सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हुई है और अब मरीज की दोनों किडनियां पूरी तरह सामान्य रूप से काम कर रही हैं।
पेट में दर्द और भारीपन को न समझें साधारण गैस, समय पर कराएं जांच
SGPGI के डॉक्टरों ने इस सफल ऑपरेशन के बाद आम जनता के लिए एक बेहद जरूरी स्वास्थ्य परामर्श भी जारी किया है। प्रो. सुरेखा के अनुसार, पेट के रेट्रोपेरिटोनियल हिस्से यानी आंतों के पीछे पनपने वाले ट्यूमर तब तक कोई तेज दर्द नहीं देते जब तक वे आकार में काफी बड़े न हो जाएं। मरीज अक्सर इसे सामान्य गैस, अपच या वजन बढ़ना समझकर नजरअंदाज करते रहते हैं, जिससे बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच जाती है। यदि किसी भी व्यक्ति को पेट में लगातार भारीपन, छूने पर कोई सख्त गांठ महसूस होना, भूख में अचानक कमी आना या बिना किसी कारण के वजन घटने की शिकायत हो, तो तुरंत एक साधारण एब्डॉमिनल अल्ट्रासाउंड और विशेषज्ञ की सलाह पर कंट्रास्ट सीटी स्कैन कराना चाहिए। शुरुआती स्तर पर बीमारी की पहचान होने से न केवल सामान्य सर्जरी से ट्यूमर निकाला जा सकता है, बल्कि शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को कटने से भी बचाया जा सकता है। फिलहाल पडरौना की दिव्या पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलने लगी हैं, और SGPGI के डॉक्टरों का यह साहसिक कदम भारतीय चिकित्सा इतिहास में जीवन बचाने की एक नई मिसाल बन चुका है।
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