नई दिल्ली: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर देश की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। मोदी सरकार 2034 के बजाय 2029 के लोकसभा चुनावों से ही महिला आरक्षण लागू करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। मंगलवार को विपक्षी दलों की बैठक और मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा संसदीय कार्य मंत्री को लिखे गए पत्र के बाद अब चर्चा है कि सरकार इस ऐतिहासिक संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए विशेष सत्र (Special Session) बुला सकती है।
आखिर इतनी ‘जल्दबाजी’ में क्यों है सरकार?
सरकार के इस ‘शॉर्टकट’ के पीछे एक बड़ा रणनीतिक और तकनीकी कारण है। मार्च 2026 बीत रहा है और 2029 के चुनावों में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।
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परिसीमन का लंबा वक्त: सीटों की संख्या बढ़ाने और आरक्षण लागू करने के लिए परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया अनिवार्य है। चुनाव आयोग को इस पूरी मशक्कत के लिए कम से कम दो साल का समय चाहिए।
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डेडलाइन का दबाव: यदि अगले कुछ महीनों में बिल को मंजूरी नहीं मिली, तो 2029 की समय सीमा चूक सकती है। सरकार चाहती है कि चुनाव से पहले पर्याप्त बफर टाइम रहे ताकि कोई कानूनी या प्रशासनिक बाधा न आए।
दक्षिण भारत के राज्यों की ‘चिंता’ और मोदी सरकार का मास्टरप्लान
महिला आरक्षण और सीटों की संख्या बढ़ने को लेकर दक्षिण भारत के राज्य (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) डरे हुए थे। एम.के. स्टालिन से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक का तर्क था कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण किया, उन्हें कम सीटें देकर सजा क्यों दी जा रही है?
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2011 की जनगणना का आधार: सरकार ने इस विवाद को सुलझाने के लिए 2011 की जनगणना को ही आधार मानने का फैसला किया है। इससे सीटों का अनुपात नहीं बिगड़ेगा और दक्षिण के राज्य जैसे टीडीपी, वाईएसआरसीपी और डीएमके का समर्थन मिलना आसान हो जाएगा।
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सीटों का नया गणित: सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा की सीटों को 50% तक बढ़ाया जा सकता है। इससे कुल सीटें 816 होने का अनुमान है।
राज्यवार सीटों का संभावित बदलाव:
| राज्य | वर्तमान सीटें | अनुमानित नई सीटें |
| उत्तर प्रदेश | 80 | 120 |
| महाराष्ट्र | 48 | 72 |
| पश्चिम बंगाल | 42 | 63 |
| बिहार | 40 | 60 |
शाह ने संभाली कमान, विपक्ष ने मांगी ‘डिटेल’
गृह मंत्री अमित शाह खुद कांग्रेस समेत प्रमुख विपक्षी दलों को साधने में जुटे हैं। हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार से पूछा है कि आप आखिर बदलाव क्या करना चाहते हैं? विपक्ष का कहना है कि जब तक संशोधन का पूरा ड्राफ्ट नहीं मिलता, वे समर्थन पर फैसला नहीं ले पाएंगे।
सरकार के पास फिलहाल तीन विकल्प हैं:
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मौजूदा सत्र को बढ़ाकर बिल पास कराया जाए।
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विशेष सत्र बुलाया जाए।
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मानसून सत्र तक इंतजार किया जाए (जिसमें देरी होने का जोखिम है)।
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