अगरतला: फैमिली पेंशन (Family Pension) के हकदार कौन हैं, इसे लेकर त्रिपुरा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बेटी का तलाक उसके पिता की मृत्यु के बाद होता है, तो वह अपने पिता की फैमिली पेंशन पर दावा करने की पात्र नहीं होगी। भले ही वह महिला अपने पिता के जीवित रहते हुए लंबे समय से उन पर आश्रित रही हो, लेकिन कानूनी ‘स्टेटस’ (Status) ही इस मामले में निर्णायक होगा।
क्या है पूरा मामला?
यह याचिका एक ऐसी महिला द्वारा दायर की गई थी, जिसके पिता अगरतला म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में कर्मचारी थे।
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महिला की दलील: याचिकाकर्ता ने बताया कि शादी के कुछ ही समय बाद उसके पति ने उसे छोड़ दिया था और वह पिछले 40 वर्षों से अपने पिता के साथ रह रही थीं और पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर थीं।
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पिता की मृत्यु: उनके पिता की मृत्यु 2 दिसंबर 2018 को हुई।
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तलाक की तारीख: महिला को कानूनी रूप से तलाक साल 2021 में मिला।
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दावा: तलाक मिलने के बाद महिला ने म्युनिसिपल अथॉरिटी से फैमिली पेंशन की मांग की, जिसे अथॉरिटी ने खारिज कर दिया। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुँचा।
हाई कोर्ट का तर्क: नियमों के आगे बेबस भावनाएं
जस्टिस एस. दद्दा पुरकायस्थ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए त्रिपुरा स्टेट सिविल सर्विस रूल 2017 (नियम 8) का हवाला दिया। कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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निर्भरता बनाम स्टेटस: कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता अपने पिता की मृत्यु के समय उन पर आर्थिक रूप से निर्भर तो थी, लेकिन कानूनी तौर पर उसका स्टेटस ‘तलाकशुदा’ नहीं था। पिता की मृत्यु के समय वह ‘विवाहित’ श्रेणी में आती थी।
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मृत्यु के समय की स्थिति: नियम के अनुसार, फैमिली पेंशन का लाभ अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा बेटी को तभी मिलता है जब पिता की मृत्यु के समय उनका यह स्टेटस मौजूद हो। चूंकि इस मामले में तलाक पिता की मृत्यु के 3 साल बाद हुआ, इसलिए वह पात्र नहीं हैं।
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भेदभाव नहीं, नियम का पालन: अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला भेदभावपूर्ण नहीं है। कोर्ट अपनी तरफ से स्थापित सेवा नियमों (Service Rules) में बदलाव नहीं कर सकता।
फैमिली पेंशन के मौजूदा नियम क्या कहते हैं?
सामान्यतः सरकारी नियमों के तहत फैमिली पेंशन का लाभ परिवार के इन सदस्यों को प्राथमिकता के आधार पर मिलता है:
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पत्नी/पति: पहली प्राथमिकता।
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बच्चे (25 वर्ष की आयु तक): यदि वे आत्मनिर्भर नहीं हैं।
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अविवाहित/विधवा/तलाकशुदा बेटियां: बशर्ते वे पूरी तरह माता-पिता पर निर्भर हों और उनकी मृत्यु के समय उनका यह स्टेटस (Status) कानूनी रूप से मान्य हो।
निष्कर्ष: कानूनी अड़चन और सबक
यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी और सीख है जो पारिवारिक विवादों के चलते अलग तो रहते हैं, लेकिन कानूनी तलाक की प्रक्रिया में देरी करते हैं। त्रिपुरा हाई कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि सरकारी लाभों के लिए ‘वास्तविक स्थिति’ (अलग रहना) से ज्यादा ‘कानूनी स्थिति’ (तलाकशुदा होना) मायने रखती है।
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