नई दिल्ली/डिजिटल डेस्क: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता और सबरीमाला मामले की जटिल सुनवाई के दौरान एक बेहद दिलचस्प और समसामयिक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि वह विद्वानों और विचारकों के ज्ञान का सम्मान करती है, लेकिन ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ (WhatsApp University) से आने वाली अपुष्ट जानकारी के लिए अदालत में कोई जगह नहीं है।
9 जजों की संविधान पीठ और ऐतिहासिक संदर्भ
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय पीठ कर रही है। इस पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश सहित कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं। यह पीठ 2018 के सबरीमाला फैसले के बाद उपजे कानूनी सवालों और विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के व्यापक मुद्दों पर विचार कर रही है।
कोर्ट रूम ड्रामा: जब शशि थरूर का हुआ जिक्र
सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए कांग्रेस सांसद और प्रख्यात लेखक शशी थरूर के एक लेख का हवाला दिया।
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लेख का मुख्य बिंदु: थरूर ने अपने लेख में धार्मिक मामलों में ‘न्यायिक संयम’ (Judicial Restraint) की वकालत की थी, यानी अदालतों को धार्मिक प्रथाओं में दखल देने से बचना चाहिए।
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CJI की टिप्पणी: इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रख्यात हस्ती की राय, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंततः एक ‘व्यक्तिगत राय’ ही होती है और अदालत कानून के मापदंडों पर चलती है।
जस्टिस नागरत्ना का तंज: ‘WhatsApp यूनिवर्सिटी से बिल्कुल नहीं’
बहस के दौरान जब वकील कौल ने तर्क दिया कि “ज्ञान किसी भी स्रोत, देश या विश्वविद्यालय से आए, उसका स्वागत होना चाहिए,” तब जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली और कहा— “लेकिन व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से बिल्कुल नहीं।”
न्यायाधीश की इस टिप्पणी ने कोर्ट रूम में हलकी मुस्कुराहट बिखेर दी, लेकिन इसके पीछे एक गहरा संदेश था कि कानूनी साक्ष्यों और संवैधानिक व्याख्याओं के बीच सोशल मीडिया पर तैरने वाले भ्रामक ‘ज्ञान’ की कोई अहमियत नहीं है।
क्या है सबरीमाला विवाद की जड़?
यह पूरी कानूनी कवायद सितंबर 2018 के उस फैसले से उपजी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था।
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2018 का फैसला: 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से मंदिर की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था।
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9 जजों की पीठ की भूमिका: इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। साथ ही मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे मुद्दे भी जुड़ गए। अब बड़ी पीठ यह तय कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25) और समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अदालत की मुश्किल: क्या ‘अनिवार्य’ है और क्या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को यह भी स्वीकार किया कि किसी भी अदालत के लिए यह तय करना लगभग असंभव है कि किसी धर्म की कौन सी प्रथा ‘अनिवार्य’ (Essential Religious Practice) है। यह टिप्पणी दर्शाती है कि धार्मिक आस्था और संवैधानिक नैतिकता के बीच का रास्ता कितना संकरा है।
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