इस्तीफा देने के बाद भी लिस्ट में क्यों है जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम? जानें क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 217

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट के गलियारों में इन दिनों एक तकनीकी और संवैधानिक सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है। भारी विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद इस्तीफा देने वाले जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम अब भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के आधिकारिक पोर्टल पर जजों की वरिष्ठता सूची (Seniority List) में तीसरे स्थान पर बरकरार है। जबकि उन्होंने 9 अप्रैल को ही राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा ‘तत्काल प्रभाव’ से भेज दिया था। इस स्थिति ने संवैधानिक प्रावधानों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच के सामंजस्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पोर्ट्ल पर स्थिति: अब भी शीर्ष जजों में शामिल

इलाहाबाद हाई कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, इलाहाबाद स्थित जजों की सूची में जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम जस्टिस एम.सी. त्रिपाठी और जस्टिस अरिंदम सिन्हा के ठीक बाद तीसरे नंबर पर है।

  • लखनऊ और इलाहाबाद की स्थिति: हाई कोर्ट में जजों की तैनाती दो जगह है—लखनऊ खंडपीठ में 28 और मुख्य पीठ इलाहाबाद में 79 जज तैनात हैं।

  • हैरानी की बात: इस्तीफा देने के करीब एक महीने बाद भी वरिष्ठता क्रम में उनका नाम हटना तो दूर, यथावत बना हुआ है, जिससे कानूनी हलकों में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

क्या कहता है संविधान: अनुच्छेद 217 (1) का प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 (1) (ए) के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के इस्तीफे की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है। इसके अनुसार:

  • कोई भी जज राष्ट्रपति को अपने हाथ से लिखा हुआ त्यागपत्र सौंपकर पद छोड़ सकता है।

  • यदि न्यायाधीश ने अपने पत्र में ‘तत्काल प्रभाव’ शब्द का प्रयोग किया है, तो नियमतः उसी समय से पद रिक्त माना जाना चाहिए।

  • सुप्रीम कोर्ट का नजीर: 15 फरवरी, 1978 को जस्टिस गोपाल चंद्र मिश्रा के मामले में 5 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि जज द्वारा तय की गई तारीख से ही इस्तीफा प्रभावी माना जाएगा। जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल को लिखे पत्र में तत्काल इस्तीफे की बात कही थी, जिससे संवैधानिक रूप से उनका पद उसी दिन से रिक्त माना जा सकता है।

क्यों अटका है फैसला?

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला केवल एक साधारण इस्तीफे का नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट में रहने के दौरान उनके आवास पर छापेमारी में भारी मात्रा में नकद बरामद हुआ था, जिसके बाद उनका तबादला इलाहाबाद कर दिया गया था।

  • महाभियोग की चर्चा: उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने पर भी विचार हुआ था।

  • संजीव खन्ना बेंच का आदेश: पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की बेंच ने उनकी फाइल को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री कार्यालय भेजते हुए उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का सुझाव दिया था।

जानकारों का मानना है कि चूंकि मामला बेहद संवेदनशील है और उनके खिलाफ जांच लंबित हो सकती है, इसलिए राष्ट्रपति भवन से औपचारिक स्वीकृति या प्रशासनिक आदेश जारी होने में देरी हो रही है। इसी तकनीकी कारण से शायद हाई कोर्ट प्रशासन ने अभी तक पोर्टल से उनका नाम नहीं हटाया है।

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