पश्चिम बंगाल में ‘पशु वध नियंत्रण कानून’ को लेकर सियासी पारा सातवें आसमान पर है। राज्य सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने एक कड़ा बयान देते हुए आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक हुमायूं कबीर को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कर दिया है कि राज्य में अब कानून का शासन चलेगा और परंपरा के नाम पर नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
1950 का कानून और वोट बैंक की राजनीति
मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए नए दिशा-निर्देश कोई नए कानून नहीं, बल्कि ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ का हिस्सा हैं। उन्होंने पिछली सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि वोट बैंक की राजनीति के कारण दशकों तक इन नियमों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, लेकिन अब इन्हें सख्ती से लागू किया जा रहा है।
हुमायूं कबीर ने इस कानून का विरोध करते हुए कहा था कि कुर्बानी 1,400 साल पुरानी परंपरा है और इसे जारी रखा जाएगा। इस पर पलटवार करते हुए मंत्री पॉल ने कहा, “हुमायूं कबीर, अगर आपको बंगाल में रहना है, तो यहां के नियमों का पालन करना होगा। अगर आपको लगता है कि आप राज्य के कानूनों को नहीं मान सकते, तो आप किसी ऐसे दूसरे राज्य या देश में जाने के लिए आजाद हैं जहां आपको इसकी अनुमति हो।”
क्या हैं नए दिशा-निर्देश और शर्तें?
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के तहत मवेशियों के वध के लिए कड़े नियम तय किए गए हैं:
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अनिवार्य फिटनेस सर्टिफिकेट: पशु का वध तभी संभव है जब नगरपालिका अध्यक्ष/पंचायत समिति प्रमुख और एक सरकारी पशु चिकित्सक लिखित में सहमति दें।
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वध की पात्रता: सर्टिफिकेट तभी जारी होगा जब पशु 14 साल से अधिक का हो, शारीरिक रूप से अक्षम हो, चोटिल हो या किसी असाध्य रोग से पीड़ित हो।
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स्थान का निर्धारण: सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध पर पूरी तरह प्रतिबंध है। वध केवल निर्धारित बूचड़खानों में ही किया जा सकेगा।
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सजा का प्रावधान: नियमों का उल्लंघन करने पर 6 महीने तक की जेल और 1,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
हाई कोर्ट का रुख और जारी गतिरोध
इस कानून को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार के आदेश पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने ईद-उज-ज़ुहा के मौके पर भी बिना अनिवार्य फिटनेस सर्टिफिकेट के पशु वध पर प्रतिबंध को दोहराया है।
यह विवाद एक तरफ जहां धार्मिक मान्यताओं और कानूनी प्रावधानों के बीच संघर्ष को दिखाता है, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नियमों के पालन’ बनाम ‘वोट बैंक’ की बहस को और तेज कर दिया है। सरकार का रुख साफ है कि अब बंगाल में प्रशासनिक नियमों से ऊपर कोई परंपरा नहीं होगी।
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